उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव 2027 में भले ही अभी समय शेष हो, लेकिन राज्य के दो प्रमुख सियासी दलों भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच वैचारिक और प्रतीकात्मक टकराव बेहद तेज हो चुका है। मेरठ में आयोजित भाजपा के शक्ति केंद्र सम्मेलन के मंच से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्षी दलों पर प्रहार करते हुए बाबर और बजरंगी का जिक्र किया। इस तीखे राजनीतिक हमले के तुरंत बाद लखनऊ में समाजवादी पार्टी के राज्य मुख्यालय के बाहर पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का एक नया होर्डिंग सामने आ गया, जिसमें वह भगवान हनुमान के समक्ष नतमस्तक दिखाई दे रहे हैं। दोनों खेमों के इस आमने-सामने के रुख से यह साफ संकेत मिलने लगा है कि आने वाले चुनाव का राजनीतिक नैरेटिव किन मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहने वाला है।
मेरठ के सुभारती विश्वविद्यालय में मुख्यमंत्री का संबोधन
सोमवार को मेरठ स्थित सुभारती विश्वविद्यालय में भाजपा कार्यकर्ताओं और युवाओं की एक सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर सीधा निशाना साधा था। अपने संबोधन में उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों को भगवान श्रीराम के नाम से गहरी चिढ़ है। मुख्यमंत्री ने पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल का हवाला देते हुए कहा कि उस दौर में भारत की सनातन विरासत को कोसने का सिलसिला चलता था। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि विपक्ष को श्रीराम का नाम सुनने पर वैसी ही आपत्ति और बेचैनी महसूस होती थी, जैसी कभी आक्रांता बाबर को हुआ करती थी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने वक्तव्य में कड़े शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा,
"बाबर के अनुयायियों का जवाब केवल और केवल बजरंगी के भक्त ही दे सकते हैं।"अपने इस बयान के साथ उन्होंने पूर्ववर्ती सपा सरकार की नीतियों पर कांवड़ यात्रा और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जैसे आयोजनों को बाधित करने तथा राज्य के विकास कार्यों पर रोक लगाने का गंभीर आरोप लगाया। उनके इस बयान ने राज्य की सियासत में एक बार फिर वैचारिक ध्रुवीकरण की बहस को हवा दे दी।
लखनऊ स्थित सपा कार्यालय के बाहर लगा ‘विजय भवः 2027’ पोस्टर
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा दिए गए इस बयान के कुछ ही घंटों बाद लखनऊ में समाजवादी पार्टी के प्रदेश कार्यालय के बाहर एक विशाल होर्डिंग लगाया गया, जिसने राजधानी के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी। इस पोस्टर में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव दोनों हाथ जोड़कर भगवान हनुमान के सामने पूरी श्रद्धा के साथ समर्पित मुद्रा में खड़े दिखाई दे रहे हैं। पोस्टर पर बड़े अक्षरों में 'विजय भवः 2027' का नारा अंकित किया गया है।
सपा कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए इस पोस्टर के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि भगवान हनुमान का आशीर्वाद अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के साथ बना हुआ है। इस कदम के जरिए समाजवादी पार्टी यह स्पष्ट करना चाहती है कि सनातन परंपरा या भगवान हनुमान की भक्ति पर केवल भारतीय जनता पार्टी का कोई एकाधिकार नहीं है। यह पोस्टर सीधे तौर पर भाजपा के उस आक्रामक प्रचार का जवाब माना जा रहा है जिसमें विपक्ष को सनातन विरोधी दिखाने की कोशिश की जाती रही है।
धार्मिक प्रतीकों और ऐतिहासिक संदर्भों के पीछे की चुनावी रणनीति
उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से जातीय समीकरणों और नारों का प्रभाव रहा है, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों प्रमुख दलों द्वारा धार्मिक और ऐतिहासिक प्रतीकों को प्रमुखता से आगे लाने के पीछे सोची-समझी रणनीतियां काम कर रही हैं। भाजपा जहां अपने चुनावी नैरेटिव को सांस्कृतिक अस्मिता, विरासत के संरक्षण और धार्मिक ध्रुवीकरण पर केंद्रित रखना चाहती है, वहीं समाजवादी पार्टी अपने सामाजिक समीकरणों को बिखरने से बचाने की जुगत में लगी है।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले ने उल्लेखनीय असर दिखाते हुए भाजपा के पारंपरिक जनाधार में सेंध लगाई थी। भाजपा रणनीतिकारों का आकलन है कि यदि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस हिंदू मतदाताओं को जातिगत आधार पर विभाजित करने में कामयाब रहते हैं, तो सत्ताधारी दल के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो सकती है। ऐसे में सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को मुख्य विमर्श बनाकर चुनावी मुकाबले को 'धार्मिक अस्मिता बनाम तुष्टीकरण' की दिशा में मोड़ने से हिंदू मतदाताओं का एकजुट ध्रुवीकरण आसान हो जाता है।
सॉफ्ट हिंदुत्व और सर्वजन संदेश के सहारे सपा की काट
भाजपा के इस नैरेटिव से निपटने के लिए अखिलेश यादव लगातार सॉफ्ट हिंदुत्व और सर्वजन हिताय का रास्ता अपना रहे हैं। सपा नेतृत्व लंबे समय से भाजपा के उस प्रचार को निष्प्रभावी करने के प्रयास में है, जिसके तहत भाजपा खुद को सनातन और हिंदुओं का एकमात्र रक्षक बताती है। इससे पहले भी समाजवादी पार्टी भगवान परशुराम के मंदिरों के निर्माण और ब्राह्मण सम्मेलनों जैसे आयोजनों से जुड़कर अपनी रणनीति का प्रदर्शन कर चुकी है।
अब लखनऊ के पोस्टर में हनुमान जी की शरण में जाने का दृश्य यह रेखांकित करने की कोशिश है कि पार्टी किसी एक वर्ग विशेष तक सीमित नहीं है और न ही वह धार्मिक आस्थाओं से परहेज करती है। एक तरफ जहां दोनों दल बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं के आयोजन और राज्य के आर्थिक विकास के दावों को लेकर एक-दूसरे पर लगातार हमले कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बाबर और हनुमान से जुड़े प्रतीकों के प्रवेश ने तय कर दिया है कि चुनावी मुकाबला केवल नीतिगत मुद्दों पर ही नहीं बल्कि प्रतीकात्मक राजनीति पर भी लड़ा जाएगा।
नैरेटिव की होड़ और बदलते राजनीतिक समीकरण
हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश की सियासत में नैरेटिव तय करने की होड़ साफ दिखाई दी है। कुछ महीने पहले अयोध्या के राम मंदिर में कथित चंदा चोरी और अन्य व्यवस्थागत आरोपों को लेकर अखिलेश यादव लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए थे और भाजपा को सफाई देने की स्थिति में आना पड़ रहा था। हालांकि, इसके बाद के दो से तीन महीनों के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए युवा पीढ़ी यानी जेन-जी को साधने और एक लाख सरकारी नौकरियों की घोषणा जैसे बड़े प्रशासनिक कदम उठाए हैं।
इन फैसलों के दम पर भाजपा अखिलेश यादव के पीडीए विमर्श का मुकाबला करने में जुटी है। इस पूरे सियासी घटनाक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बजरंगी वाला आह्वान जहां भाजपा के कोर कैडर में उत्साह और ऊर्जा भरने का जरिया है, वहीं अखिलेश यादव का हनुमान जी के समक्ष नतमस्तक होना समाजवादी पार्टी पर लगने वाले कथित हिंदू-विरोधी ठप्पे से खुद को सुरक्षित रखने की एक सचेत कोशिश मानी जा रही है।


















