भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने के मुद्दे पर वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच गहराते कूटनीतिक तनाव के बीच वॉल स्ट्रीट के शीर्ष बैंकिंग नेतृत्व ने एक बड़ा बयान दिया है। अमेरिकी संसद की ओर से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक का भारी सीमा शुल्क लगाने का अधिकार मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय हलकों में खलबली मच गई थी। हालांकि, अमेरिका के सबसे बड़े वित्तीय संस्थान जेपीमॉर्गन चेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेमी डिमन ने अमेरिकी प्रशासन को आगाह किया है कि वाशिंगटन व्यावहारिक रूप से भारत पर इतना बड़ा शुल्क लागू नहीं कर पाएगा। उनका कहना है कि इस तरह के दंडात्मक कदम से रूस को सीमित नुकसान होगा, जबकि वैश्विक तेल व्यापार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था खुद एक बड़े वित्तीय संकट में फंस जाएगी।
मुंबई में आयोजित जेपीमॉर्गन इंडिया इन्वेस्टर कॉन्फ्रेंस के दौरान एक मीडिया बातचीत में जेमी डिमन ने अमेरिकी नीति निर्माताओं को ज़मीनी आर्थिक सच्चाइयों से रूबरू कराया। उन्होंने वाशिंगटन के सांसदों को दोटूक सलाह दी कि भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं से जुड़े संवेदनशील विषय पर कोई भी फैसला जल्दबाजी में नहीं लेना चाहिए। डिमन ने उम्मीद जताई कि अमेरिकी प्रशासन व्यावहारिक समझदारी दिखाएगा और किसी भी कठोर कार्रवाई से पहले वैश्विक बाजार के समीकरणों का आकलन करेगा। उन्होंने रेखांकित किया कि अमेरिका को रूस पर राजनीतिक दबाव बनाने का पूरा हक है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं होना चाहिए कि वह अपने सबसे अहम रणनीतिक साझीदार भारत के आर्थिक हितों पर प्रहार करने लगे।
कच्चे तेल की आपूर्ति और वैश्विक महंगाई का गंभीर संकट
अमेरिकी नेतृत्व को दी गई इस चेतावनी की जड़ें अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति शृंखला से जुड़ी हैं। जेमी डिमन ने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिकी दबाव के कारण भारत ने रूस से कच्चा तेल लेना पूरी तरह रोक दिया, तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पड़ेगा। भारत अपनी विशाल ऊर्जा खपत के कारण रातों-रात आयात बंद करके शून्य पर नहीं आ सकता। यदि भारत रूसी आपूर्ति से हटता है, तो उसे अपनी दैनिक खपत पूरी करने के लिए वैश्विक खुले बाजार में दूसरे उत्पादक देशों के पास जाना होगा।
डिमन के अनुसार, भारत जैसे विशाल उपभोक्ता के अचानक वैश्विक खुले बाजार में प्रवेश करने से गैर-रूसी तेल की मांग में अभूतपूर्व उछाल आएगा। जब वैश्विक बाजार में मांग बहुत अधिक बढ़ जाएगी और सीमित आपूर्ति के लिए होड़ मचेगी, तो कच्चे तेल के दाम बेकाबू हो जाएंगे। इस अनियंत्रित मूल्य वृद्धि की सबसे भारी कीमत खुद पश्चिमी देशों और अमेरिकी नागरिकों को चुकानी पड़ेगी, क्योंकि तेल महंगा होते ही अमेरिका में मुद्रास्फीति का नया तूफान आ जाएगा। यही वजह है कि अमेरिकी वित्त मंत्रालय और व्हाइट हाउस के रणनीतिकारों के लिए भारत के विरुद्ध कड़े कदम उठाना बेहद जोखिम भरा साबित हो सकता है।
भारतीय रिफाइनरियों का तकनीकी ढांचा और उराल क्रूड की भूमिका
ऊर्जा अर्थशास्त्र के अलावा जेमी डिमन ने वाशिंगटन के नीति निर्माताओं के सामने एक ऐसा तकनीकी पहलू रखा जिसे अक्सर राजनीतिक बहसों में छोड़ दिया जाता है। आम धारणा के विपरीत, रिफाइनिंग उद्योग में हर तरह का कच्चा तेल एक जैसा नहीं होता और न ही हर रिफाइनरी हर प्रकार के तेल को आसानी से संसाधित कर सकती है।
- रासायनिक संरचना की अनुकूलता: भारत की प्रमुख रिफाइनरियों का इंजीनियरिंग ढांचा खास रासायनिक संरचना वाले कच्चे तेल को शोधित करने के लिए डिजाइन किया गया है।
- रूसी उराल क्रूड की खासियत: रूस के उराल क्रूड में सल्फर की तय मात्रा और विशिष्ट घनत्व भारतीय रिफाइनरियों के मौजूदा संयंत्रों के लिए तकनीकी रूप से बेहद मुफीद है, जिससे कम लागत और उच्च दक्षता में पेट्रोल व डीजल का उत्पादन संभव होता है।
- मशीनरी को नुकसान का अंदेशा: यदि भारत अचानक किसी दूसरे देश से पूरी तरह भिन्न ग्रेड का कच्चा तेल आयात करने लगे, तो रिफाइनिंग इकाइयों के तकनीकी संतुलन के बिगड़ने, मशीनों के क्षतिग्रस्त होने और शोधन लागत के अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाने का जोखिम पैदा हो जाएगा। डिमन का तर्क है कि अमेरिका को भारत की इस तकनीकी व्यवस्था और औद्योगिक सीमाओं को स्वीकार करना होगा।
लिंडसे ओ ग्राहम कानून और द्विपक्षीय व्यापार पर तलवार
इस पूरे तनाव की शुरुआत अमेरिकी संसद द्वारा पारित किए गए ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ से हुई है। इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को यह असाधारण वैधानिक अधिकार सौंपा गया है कि वे रूस से तेल खरीदने वाले देशों, मुख्य रूप से भारत और चीन, से आने वाले उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक का दंडात्मक शुल्क लगा सकें। वाशिंगटन के रणनीतिकारों का मानना है कि भारत द्वारा रूसी तेल के निरंतर क्रय से मॉस्को के राजस्व में भारी वृद्धि हो रही है, जिससे वह युद्ध खर्चों को संभालने में सक्षम बना हुआ है।
हालांकि, वाणिज्यिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि यदि इस कानून के तहत भारत से निर्यात होने वाले उत्पादों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया, तो दोनों देशों के बीच 200 अरब डॉलर से अधिक का वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार पूरी तरह चरमरा जाएगा। अमेरिका और भारत के बीच व्यापार ठप होने की स्थिति में अमेरिकी आपूर्ति शृंखलाएं टूट जाएंगी और अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इसका भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ेगा, जो वाशिंगटन के अपने हितों के लिए ही आत्मघाती कदम साबित होगा।
भारत की ‘पीपल फर्स्ट’ नीति और 1.4 अरब नागरिकों का सवाल
अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों की धमकियों के बीच भारत ने भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना रुख दृढ़ता से रखा है। अमेरिकी संसद में नया विधेयक पारित होने के तुरंत बाद अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने देश की विदेश और ऊर्जा नीति का मूल आधार पूरी दुनिया के सामने स्पष्ट किया। राजदूत ने सोशल मीडिया पर रेखांकित किया कि भारत की ऊर्जा नीति पूरी तरह ‘पीपल फर्स्ट’ यानी जनता के कल्याण के मूलभूत सिद्धांत पर आधारित है।
क्वात्रा ने वैश्विक समुदाय को ध्यान दिलाया कि भारत अपनी कुल घरेलू आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और लगभग 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस विदेशों से आयात करता है। इतनी भारी निर्भरता के चलते ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए कोई राजनीतिक सौदेबाजी का विषय नहीं, बल्कि देश के 1.4 अरब नागरिकों की दैनिक आजीविका, खाद्य सुरक्षा और जीवन स्तर से जुड़ा बुनियादी सवाल है। भारत ने दोटूक रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि वह तेल की खरीद वहीं से करेगा जहां यह सस्ता, आसानी से सुलभ और व्यावसायिक रूप से तर्कसंगत होगा।
वैश्विक बाजार में 150 डॉलर क्रूड का खतरा टालने में भारत की भूमिका
भारतीय राजनयिकों और बैंकिंग प्रमुख जेमी डिमन के विश्लेषण का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि संकट के समय रूसी तेल खरीदकर भारत ने अनजाने में वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक बड़े विनाश से बचाया है। जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ा था, उस समय यदि भारत ने रूसी तेल छोड़कर पश्चिमी देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार के सीमित भंडारों के लिए बोली लगाना शुरू कर दिया होता, तो कच्चे तेल की कीमतें 150 से 180 डॉलर प्रति बैरल तक उछल सकती थीं।
भारत ने रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में संतुलन स्थापित किया। इस रणनीतिक कदम से न केवल भारत के घरेलू उपभोक्ताओं को बेतहाशा महंगाई से राहत मिली, बल्कि वैश्विक मांग के दबाव को कम करके अमेरिका और यूरोप के बाजारों में भी ऊर्जा की कीमतों को एक विनाशकारी स्तर तक पहुंचने से रोक दिया गया। इस प्रकार, जमीनी आर्थिक हकीकतें यह दर्शाती हैं कि भारत पर दंडात्मक शुल्क लगाने का विचार कूटनीतिक रूप से आकर्षक दिखने के बावजूद आर्थिक रूप से अव्यावहारिक है।



















