एक परिवार के सामाजिक भविष्य और मासूम बच्चे की भलाई को सर्वोपरि रखते हुए मेघालय उच्च न्यायालय ने 27 वर्षीय एक व्यक्ति पर दर्ज पॉक्सो कानून के तहत आपराधिक कार्यवाही और एफआईआर को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। दो जजों की पीठ ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि जब संबंधित जोड़ा कानूनी रूप से शादी करके अपनी चार साल की बेटी के साथ सुखद वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रहा है, तो ऐसी स्थिति में पुरुष को कारागार भेजने से महिला और बच्ची दोनों का जीवन अंधकारमय हो जाएगा।
मामले की पृष्ठभूमि और 2021 से अब तक का घटनाक्रम
यह पूरा प्रकरण मेघालय के री-भोई जिले का है। वर्ष 2021 में जब युवती नाबालिग थी और गर्भावस्था के दौर से गुजर रही थी, तब री-भोई महिला पुलिस स्टेशन में आरोपी युवक के विरुद्ध पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत एफआईआर दर्ज की गई थी। कालक्रम में वयस्क होने के पश्चात युवती ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से उसी पुरुष के साथ रहने का निर्णय लिया। इस वर्ष मार्च के महीने में दोनों ने नोंगपोह स्थित मैरिज रजिस्ट्रार के समक्ष औपचारिक एवं कानूनी रूप से अपना विवाह संपन्न कराया। वर्तमान में दोनों अपनी चार साल की पुत्री के साथ एक साथ रह रहे हैं।
न्यायालय लीगल सर्विसेज समिति की रिपोर्ट और महिला का पक्ष
हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी की तरफ से प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में भी अदालत को इस बात का आश्वासन दिया गया कि यह दंपति अपनी बच्ची के साथ शांतिपूर्ण माहौल में जीवन यापन कर रहा है। सुनवाई के दौरान महिला ने पीठ को अवगत कराया कि लगातार अदालती प्रक्रियाओं और मुकदमों के कारण उसकी लैबोरेटरी टेक्नोलॉजी डिप्लोमा की पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी। अब वह कानून की शिक्षा ग्रहण करने अथवा किसी वोकेशनल ट्रेनिंग में प्रवेश लेने की इच्छा रखती है। उसने अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि अपने पति पर दर्ज आपराधिक केस को समाप्त किए जाने पर उसे कोई आपत्ति नहीं है।
सामाजिक वास्तविकताओं और न्यायिक विवेक पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
अपने फैसले को आधार प्रदान करते हुए उच्च न्यायालय ने शालेनबोर वाहतांग बनाम मेघालय राज्य के पूर्व निर्णय का उल्लेख किया। पीठ ने टिप्पणी की कि राज्य के भीतर किशोरावस्था में आपसी सहमति से रिश्ते बनना एक सामान्य बात है। जजों ने माना कि यद्यपि पॉक्सो कानून के तहत दर्ज अपराधों को सैद्धांतिक रूप से समाज के विरुद्ध माना जाता है, तथापि न्यायपालिका स्वयं को व्यावहारिक सामाजिक हकीकत से पृथक नहीं रख सकती। जहां एक परिवार पूरी तरह स्थापित हो चुका हो, वहां अत्यधिक कानूनी कठोरता अपनाने से पीड़िता और उसके मासूम बच्चे के कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
उच्च शिक्षा और सरकारी योजनाओं को लेकर अदालती निर्देश
आपराधिक एफआईआर को निरस्त करने के साथ ही अदालत ने संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। हाईकोर्ट ने कहा है कि महिला और उसकी चार वर्ष की पुत्री को सभी प्रासंगिक सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का पूरा लाभ प्रदान किया जाए। इसके साथ ही जिला लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को यह आदेश दिया गया है कि वह 8 सप्ताह की समयावधि के भीतर महिला की उच्च शिक्षा अथवा व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए आवश्यक प्रबंध सुनिश्चित करे।



















