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मेवाड़ के गढ़बोर में जलझूलनी एकादशी पर सोने की पालकी में निकले चारभुजा नाथ, 2 किलोमीटर तक उड़ा गुलालराजस्थान
22 सित॰ 2026, 11:06 pm (2 दिन पहले)· 0

मेवाड़ के गढ़बोर में जलझूलनी एकादशी पर सोने की पालकी में निकले चारभुजा नाथ, 2 किलोमीटर तक उड़ा गुलाल

राजसमंद स्थित करीब 5500 साल पुराने चारभुजा नाथ मंदिर में जलझूलनी एकादशी पर राजसी ठाठ-बाट के साथ भगवान की भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें ठाकुरजी सोने की पालकी में दूधतलाई पहुंचे।

राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित गढ़बोर के प्रसिद्ध चारभुजा नाथ मंदिर में जलझूलनी एकादशी के मौके पर सदियों पुरानी आस्था और राजसी ठाठ-बाट का अनूठा संगम देखने को मिला। करीब 5500 साल पुराने बताए जाने वाले इस ऐतिहासिक धाम से ठाकुरजी विशेष शोभायात्रा के साथ नगर भ्रमण पर निकले। इस दौरान मेवाड़ की प्राचीन धार्मिक विरासत और राजसी रवायतों का भव्य प्रदर्शन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।

सोने की पालकी और शाही लवाजमे के साथ नगर भ्रमण

जलझूलनी एकादशी के अवसर पर इस भव्य आयोजन का प्रमुख आकर्षण भगवान चारभुजा नाथ की सोने की पालकी रही। विशेष अनुष्ठानों के बाद ठाकुरजी को सोने की भव्य पालकी में विराजमान किया गया। इसके उपरांत शाही लवाजमे के साथ यह शोभायात्रा मंदिर परिसर से रवाना हुई। शोभायात्रा के आगे और साथ में सजे-धजे हाथी और घोड़े चल रहे थे। पुजारी परिवार के सदस्य पारंपरिक लाल पाग धारण कर पूरी निष्ठा के साथ ठाकुरजी के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे।

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सोने-चांदी के पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों का प्रदर्शन

इस ऐतिहासिक परंपरा में मंदिर के सदियों पुराने पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों का प्रदर्शन भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। शोभायात्रा के दौरान सोने और चांदी से बनी गदा, भाले, तलवारें और बंदूक सहित अन्य प्राचीन हथियारों को मंदिर के गर्भगृह से बाहर निकाला गया। इन दिव्य शस्त्रों को भगवान के पराक्रम, शक्ति और राजसी वैभव का प्रतीक माना जाता है। पुजारी परिवार पूरी जिम्मेदारी के साथ इन पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों की पूजा-अर्चना और देखरेख का कार्य संभालता है। इन दुर्लभ अस्त्रों का शोभायात्रा में शामिल होना इस आयोजन को अन्य धार्मिक यात्राओं की तुलना में विशिष्ट पहचान देता है।

2 किलोमीटर तक बिछी गुलाल की चादर

नगर भ्रमण के दौरान जब ठाकुरजी की पालकी आगे बढ़ी, तो पूरे मार्ग पर आस्था का उल्लास छा गया। श्रद्धालु पूरे रास्ते जमकर गुलाल उड़ाते रहे, जिससे करीब दो किलोमीटर लंबा पूरा शोभायात्रा मार्ग गुलाबी रंग में सराबोर नजर आया। भगवान के गगनभेदी जयकारों के बीच श्रद्धालु इस पारंपरिक उत्सव में झूमते हुए नजर आए।

दूधतलाई में परिक्रमा और पवित्र स्नान

नगर भ्रमण संपन्न होने के बाद ठाकुरजी की पालकी दूधतलाई पहुंची। यहां सबसे पहले ठाकुरजी के साथ दूधतलाई की परिक्रमा की गई। परिक्रमा पूर्ण होने के बाद जलझूलनी एकादशी के विधान के अनुसार भगवान को विधि-विधान से पवित्र स्नान कराया गया। इसी स्नान के कारण इस पर्व को जलझूलनी एकादशी की परंपरा से जोड़ा जाता है। गढ़बोर के चारभुजा नाथ धाम में सोने की पालकी, लाल पाग पहने पुजारी, प्राचीन अस्त्र-शस्त्र, हाथी-घोड़े और गुलाल का यह संगम मेवाड़ की समृद्ध विरासत को आज भी जीवंत बनाए हुए है।

सवाल-जवाब

चारभुजा नाथ मंदिर कहां स्थित है और यह कितना पुराना है?
यह प्रसिद्ध मंदिर राजस्थान के राजसमंद जिले के गढ़बोर में स्थित है और इसे करीब 5500 साल पुराना बताया जाता है।
जलझूलनी एकादशी पर ठाकुरजी किस वाहन में नगर भ्रमण पर निकलते हैं?
इस पावन दिन पर भगवान चारभुजा नाथ को सोने की भव्य पालकी में विराजमान करके नगर भ्रमण कराया जाता है।
शोभायात्रा में कौन से पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र शामिल किए जाते हैं?
शोभायात्रा में सोने और चांदी की गदा, भाले, तलवारें, बंदूक और अन्य प्राचीन हथियार शामिल किए जाते हैं।
शोभायात्रा मार्ग की लंबाई कितनी है और वहां क्या परंपरा निभाई जाती है?
शोभायात्रा मार्ग करीब दो किलोमीटर लंबा है, जिस पर श्रद्धालु रास्तेभर गुलाल उड़ाकर मार्ग को गुलाबी रंग में रंग देते हैं।
नगर भ्रमण के बाद ठाकुरजी को कहां स्नान कराया जाता है?
नगर भ्रमण के बाद पालकी दूधतलाई पहुंचती है, जहां परिक्रमा करने के उपरांत भगवान को पवित्र स्नान कराया जाता है।
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टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·2 दिन पहले

मेवाड़ की संस्कृति की बात ही निराली है। पिछले साल गढ़बोर में इस शोभायात्रा को अपनी आँखों से देखने का मौका मिला था। जब दो किलोमीटर तक हवा में सिर्फ गुलाबी गुलाल उड़ रही थी और चारों तरफ ठाकुरजी के जयकारे गूँज रहे थे, तो वह नज़ारा आज भी आँखों के सामने घूम जाता है।

Ravikash Gupta@ravikash·2 दिन पहले

5500 साल पुराना मंदिर? इतने पुराने निर्माण और हथियारों के दावे पर थोड़ा शक होता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·2 दिन पहले

रविकेश जी, 5500 साल का इतिहास तो थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर लगता है, पर मेवाड़ की परंपराएं वाकई शानदार हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·2 दिन पहले

मेवाड़ की परम्पराएं वाकई शानदार हैं, पर इतने पुराने हथियारों को यूं खुले में भीड़ के बीच निकालना थोड़ा जोखिम भरा लगता है। भीड़ में सुरक्षा संभालना और इन प्राचीन अस्त्रों की रक्षा करना अपने आप में बड़ी चुनौती होगी।

Rohan Verma@rohan-verma·2 दिन पहले

करण जी, सुरक्षा की चिंता सही है, पर ऐसे मेलों में प्रशासन और पुजारी परिवार सालों से व्यवस्था संभालते आए हैं।

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