मेवाड़ की ऐतिहासिक और पावन धरा पर जलझूलनी एकादशी यानी देव झूलनी ग्यारस का पर्व बड़े ही श्रद्धा भाव और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। इस धार्मिक उत्सव के अवसर पर मेवाड़ के विख्यात श्री सांवलिया सेठ मंदिर से भगवान की भव्य भाव सवारी निकाली गई। भगवान श्री सांवलिया सेठ एक सुसज्जित चांदी के रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देने मंदिर परिसर से बाहर निकले। इस अलौकिक पल के दर्शन करने और सवारी का हिस्सा बनने के लिए दूर-दराज से हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिर प्रांगण पहुंचे, जिससे पूरा इलाका भक्तिमय माहौल में डूब गया।
राम रेवाड़ी की सदियों पुरानी परंपरा और सरोवर स्नान
मेवाड़ क्षेत्र में देव झूलनी ग्यारस के पावन दिन राम रेवाड़ी निकालने की परंपरा कई पीढ़ियों से निरंतर चली आ रही है। इसी ऐतिहासिक लोक परंपरा का निर्वहन करते हुए श्री सांवलिया सेठ मंदिर से यह पारंपरिक भाव सवारी निकाली गई। चांदी के भव्य रथ पर विराजमान भगवान श्री सांवलिया सेठ को नगर भ्रमण कराते हुए पवित्र सरोवर तक ले जाया गया। सरोवर के तट पर पूरे विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ भगवान को स्नान कराया गया। सवारी के पूरे मार्ग में विभिन्न प्रकार की नयनाभिराम और भव्य झांकियां भी साथ-साथ चलती रहीं, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी रहीं।
गुलाल के उड़ते रंग और भक्तों का उल्लास
सवारी के गुजरने वाले मार्गों पर श्रद्धालु पहले से ही कतारबद्ध होकर खड़े रहे, ताकि चांदी के रथ पर सवार श्री सांवलिया सेठ की एक झलक पा सकें। पूरे मार्ग में भक्तों ने जोरदार जयकारे लगाए, जिससे वातावरण गूंज उठा। अपनी खुशी और भक्ति प्रकट करने के लिए श्रद्धालुओं ने जमकर अबीर-गुलाल उड़ाया। रंगों की फुहार के बीच श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते-गाते हुए भगवान के रथ के साथ आगे बढ़ते नजर आए। नगर के विभिन्न चौराहों और रास्तों पर स्थानीय लोगों ने भगवान के दर्शन कर शीश नवाया और आशीर्वाद प्राप्त किया।
साल में एक बार मिलने वाला दर्शन और दो दिवसीय मेला
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देव झूलनी ग्यारस का दिन बेहद खास माना जाता है क्योंकि यही वह पावन अवसर होता है जब भगवान स्वयं अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर नगरवासियों और भक्तों के बीच आते हैं। भगवान के इस साक्षात रूप के दर्शन करने की चाह में हर वर्ष यहां जनसैलाब उमड़ता है। इस विशेष धार्मिक आयोजन को और भव्य बनाने के लिए मंदिर परिक्षेत्र में दो दिवसीय मेले का आयोजन भी किया जा रहा है। भाव सवारी और मेले के संयोजन ने पूरे क्षेत्र में एक अलग ही रौनक भर दी है, जिससे मेवाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति, अटूट जन-आस्था और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है।




















