बिहार के समस्तीपुर जिले के मोहनपुर प्रखंड में बाढ़ का रूप भले ही कुछ बदला हो, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बेहद भयावह बनी हुई है। गंगा नदी के जलस्तर में मामूली गिरावट जरूर दर्ज की गई है, मगर जिन इलाकों के घरों के भीतर पानी घुस चुका है, वहां के बाशिंदों की सांसें अभी भी अटकी हुई हैं। बाढ़ की विभीषिका केवल पानी भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके बाद शुरू होने वाला संघर्ष और भी ज्यादा मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देने वाला होता है। जलमग्न हो चुके इन इलाकों में लोगों की जिंदगी मानो पूरी तरह से थम सी गई है और वे एक अजीब सी कसमकस के बीच जीने को मजबूर हैं।
घर छोड़ें या रुकें, दोनों तरफ है भारी खतरा
बाढ़ प्रभावित इन इलाकों में रहने वाले परिवारों के सामने एक बहुत बड़ी दुविधा खड़ी हो गई है। यदि वे अपने आशियानों को छोड़कर सुरक्षित स्थानों की तरफ रुख करते हैं, तो उनके मन में घर के सामान की चोरी हो जाने का लगातार डर सताता रहता है। वहीं, अगर वे जलभराव के बीच अपने घरों में ही टिके रहते हैं, तो उनकी जान और सेहत पर हमेशा खतरा मंडराता रहता है। मटियोर इलाके की रहने वाली कंचन देवी इसी तरह के गंभीर संकट से जूझ रही हैं। उनके घर के अंदर और सीढ़ियों तक पानी भर चुका है, और उनका पूरा परिवार पिछले पांच से छह दिनों से इसी नारकीय स्थिति में रहने को विवश है। इसके बावजूद वह अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उन्हें डर है कि पीछे से कीमती सामान चोरी न हो जाए।
बच्चों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव
घरों में पानी भर जाने के कारण दैनिक जीवन की मूलभूत जरूरतें पूरी करना बेहद मुश्किल हो गया है। कंचन देवी बताती हैं कि उनके बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। माता-पिता को दिनभर इस बात का पहरा देना पड़ता है कि कहीं उनके बच्चे खेलते-कूदते गहरे पानी में न चले जाएं। कड़ी धूप से बचने के लिए उन्हें अपनी छतों का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन वहां भी रहने के लिए पर्याप्त और उचित इंतजाम नहीं हैं। इसी तरह की पीड़ा सिंकी देवी की भी है, जिनके घर में पानी घुसने के बाद सोने के लाले पड़ गए हैं। घर के भीतर पानी होने के कारण सामान्य तरीके से सोना असंभव हो गया है, जबकि छत पर सोने पर मच्छरों का भयंकर प्रकोप झेलना पड़ता है। बाढ़ के इन दिनों में बच्चों को घर के अंदर भी स्वतंत्र रूप से खेलने की इजाजत नहीं है, जिससे यह आपदा उनके लिए केवल प्राकृतिक संकट न रहकर एक स्थायी मानसिक तनाव बन चुकी है।
दिव्यांग पति और नाव का लंबा इंतजार
ललिता देवी के परिवार की मुश्किलें इस आपदा के बीच और भी ज्यादा बढ़ गई हैं क्योंकि उनके पति दिव्यांग हैं। उनके घर के चारों तरफ पानी भरा हुआ है और घर का शौचालय भी पूरी तरह से डूब चुका है। ऐसे में अपने दिव्यांग पति को घर से बाहर निकालना या रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना उनके लिए किसी पहाड़ चढ़ने जैसा हो गया है। ललिता देवी का कहना है कि किसी भी आपात स्थिति में उन्हें नाव का लंबा इंतजार करना पड़ता है। पानी के बीच से गुजरकर किसी दिव्यांग व्यक्ति को सुरक्षित बाहर ले जाना बेहद जोखिम भरा काम है। इसी प्रकार संगीता देवी के परिवार के सामने भी रात के समय उजाले की व्यवस्था करने, भोजन जुटाने, बच्चों की हिफाजत करने और नाव की उपलब्धता को लेकर भारी संकट बना हुआ है। अंधेरे में बाढ़ के पानी के बीच से गुजरना अपनी जान जोखिम में डालने जैसा है।
भविष्य को लेकर गहरी चिंता और लंबी चुनौतियां
भले ही गंगा के जलस्तर में कुछ कमी आई हो, लेकिन आम जनजीवन को पटरी पर लौटने में अभी काफी वक्त लगेगा। जलस्तर घटने के बाद भी इन गरीब परिवारों के सामने अपने घरों की साफ-सफाई करने, पानी में खराब हो चुके सामान को बचाने और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसी बड़ी चुनौतियां मुंह बाएं खड़ी रहेंगी। मोहनपुर के इन बाढ़ग्रस्त गांवों की यह कहानी इस बात की गवाही देती है कि बाढ़ सिर्फ मकानों को नहीं डुबोती, बल्कि यह लोगों की रातों की नींद, उनकी रोजी-रोटी, उनकी सुरक्षा की भावना और उनके आने वाले कल की उम्मीदों को भी अपने साथ बहा ले जाती है।



















