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मुरादाबाद रैली से असदुद्दीन ओवैसी का विपक्षी दलों को खुला बुलावा, 2027 के दंगल से पहले गठबंधन पर बातचीत की रखी शर्तउत्तर प्रदेश
20 सित॰ 2026, 8:25 pm (38 दिन पहले)· 0

मुरादाबाद रैली से असदुद्दीन ओवैसी का विपक्षी दलों को खुला बुलावा, 2027 के दंगल से पहले गठबंधन पर बातचीत की रखी शर्त

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को साथ आने का न्योता दिया है। उन्होंने दो टूक कहा कि अगर भाजपा को तीसरी बार सरकार बनाने से रोकना है तो विपक्षी दलों को अभी बातचीत की मेज पर आना होगा।

उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनावों को लेकर राज्य का राजनीतिक पारा अभी से चढ़ने लगा है। भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आक्रामक अभियानों और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में 27,000 वोट जोड़ने के माइक्रो-मैनेजमेंट फॉर्मूले के बीच एक नया राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। मुरादाबाद की एक बड़ी जनसभा के मंच से ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने भाजपा विरोधी खेमे के सामने गठबंधन का खुला प्रस्ताव रख दिया है। ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को सीधी नसीहत देते हुए कहा कि अगर वे राज्य में भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकना चाहते हैं, तो उन्हें अकेले लड़ने के भ्रम से बाहर निकलकर फौरन बातचीत शुरू करनी चाहिए।

असदुद्दीन ओवैसी ने विपक्षी दलों पर यह आरोप लगाया कि चुनाव हारने के बाद अक्सर उन पर वोट काटने का ठीकरा फोड़ दिया जाता है। मुरादाबाद की जनसभा में उन्होंने साफ शब्दों में कहा,

"मजलिस कभी नहीं चाहती कि उत्तर प्रदेश में तीसरी बार बीजेपी की सरकार बने। मैं हाथ मिलाने और गठबंधन करने के लिए तैयार हूं।"
उन्होंने विपक्षी नेताओं को आगाह करते हुए कहा कि अगर सच में भाजपा को रोकना मकसद है, तो गठबंधन के लिए चुनाव के बाद आंसू बहाने के बजाय आज ही सार्थक चर्चा की जरूरत है। ओवैसी ने जोर देकर कहा कि उनकी यह सियासी पहल केवल सत्ता पाने के लिए नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और बराबरी के हक के लिए है। उनका कहना था कि उनकी पार्टी किसी के रहम पर नीचे फर्श पर बैठने के बजाय मेज पर बराबर की कुर्सी पाकर अपने लोगों के हकों की बात करेगी।

बिहार के पिछले चुनावी नतीजों की दिलाई याद

ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और सेक्युलर कहे जाने वाले दलों के पुराने रवैये पर सवाल खड़े करते हुए बिहार विधानसभा चुनाव का उदाहरण सामने रखा। उन्होंने याद दिलाया कि बिहार में एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और वामपंथी दलों के महागठबंधन को पत्र लिखकर केवल 6 सीटें मांगी थीं। इसके बावजूद वहां के मुख्य विपक्षी दलों ने एआईएमआईएम को पूरी तरह दरकिनार कर दिया था। ओवैसी के अनुसार, उस इनकार का नतीजा पूरे देश ने देखा कि किस तरह सेक्युलर वोटों के बिखराव ने समीकरण बदल दिए। उत्तर प्रदेश में उसी गलती को न दोहराने की चेतावनी देते हुए उन्होंने गैर-भाजपा दलों से समय रहते परिपक्व रुख अपनाने की अपील की।

अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले के सामने खड़ी हुई नई दुविधा

ओवैसी की इस सीधी पेशकश ने समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के सामने एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद से अखिलेश यादव अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सोशल इंजीनियरिंग मॉडल पर लगातार काम कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी राज्य के लगभग 19 से 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं को अपना मजबूत और पारंपरिक जनाधार मानती रही है। जानकारों का मानना है कि अगर अखिलेश यादव एआईएमआईएम के साथ औपचारिक मंच साझा करते हैं, तो भाजपा को इस गठबंधन को तुष्टिकरण और कट्टरपंथी ध्रुवीकरण के रूप में प्रचारित करने का सीधा मौका मिल जाएगा। इससे समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े गैर-यादव ओबीसी और हिंदू मतदाताओं में बिखराव का खतरा बढ़ सकता है, जिसका संकेत भाजपा ने इसे भाईजान पार्टनरशिप कहकर पहले ही दे दिया है।

मुस्लिम वोटों के एकाधिकार और समानांतर नेतृत्व का डर

समाजवादी पार्टी के भीतर सबसे बड़ी चिंता यह है कि एआईएमआईएम को उत्तर प्रदेश की मुख्य चुनावी धारा में साझेदार बनाने से राज्य में एक स्वतंत्र और आक्रामक मुस्लिम नेतृत्व खड़ा हो सकता है। अब तक समाजवादी पार्टी अल्पसंख्यक मतों के स्वाभाविक दावेदार के रूप में बिना किसी आंतरिक चुनौती के चुनाव लड़ती रही है। ओवैसी को गठबंधन में हिस्सेदारी देने का मतलब होगा कि राज्य के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में एआईएमआईएम को स्थायी राजनीतिक जमीन सौंपना। यही वजह है कि अखिलेश यादव किसी भी ऐसे समझौते से कतराते रहे हैं जिससे उनके पारंपरिक वोट बैंक में कोई दूसरा भागीदार बन जाए।

इस सियासी प्रस्ताव के बाद उभरती तीन प्रमुख रणनीतिक संभावनाएं

ओवैसी के इस दांव के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीन रास्ते बनते दिख रहे हैं

  • सपा की खामोशी या पूर्ण इनकार: अखिलेश यादव ओवैसी के इस बयान पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया न देकर इसे नजरअंदाज कर सकते हैं। सपा की कोशिश होगी कि 2027 का चुनाव पूरी तरह से भाजपा बनाम सपा के सीधे मुकाबले के रूप में लड़ा जाए, जिससे अल्पसंख्यक मतदाता मजबूरी में सपा के पक्ष में ही एकजुट रहें।
  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीटों पर सीधा बिखराव: यदि विपक्ष ने गठबंधन से इनकार कर दिया, तो एआईएमआईएम सीमांचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 30 से 40 मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में अपने आक्रामक उम्मीदवार उतार सकती है। ऐसी स्थिति में मतों के विभाजन का सीधा फायदा सत्तारूढ़ भाजपा को मिल सकता है।
  • पर्दे के पीछे रणनीतिक तालमेल: किसी औपचारिक और सार्वजनिक गठबंधन के जोखिम से बचने के लिए दोनों दल कुछ खास सीटों पर अघोषित समझ बना सकते हैं, ताकि भाजपा विरोधी मतों में सीधा टकराव टाला जा सके।

असदुद्दीन ओवैसी ने अपना प्रस्ताव रखकर गेंद अब सीधे समाजवादी पार्टी के पाले में डाल दी है। 2027 की चुनावी बिसात पर अब यह तय होना बाकी है कि अखिलेश यादव अपने पीडीए मॉडल के सहारे अकेले दम पर मैदान संभालेंगे या फिर अल्पसंख्यक मतों के संभावित बिखराव को रोकने के लिए कोई नया समीकरण साधेंगे।

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सवाल-जवाब

असदुद्दीन ओवैसी ने किस जनसभा से गठबंधन का प्रस्ताव रखा?
ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए यह खुला चुनावी प्रस्ताव दिया।
ओवैसी ने किन राजनीतिक दलों से बातचीत करने की अपील की है?
उन्होंने मुख्य विपक्षी दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से समय रहते गठबंधन पर बातचीत शुरू करने को कहा है।
ओवैसी ने बिहार चुनाव का क्या उदाहरण दिया?
उन्होंने बताया कि बिहार में उनकी पार्टी ने सिर्फ 6 सीटें मांगी थीं, लेकिन विपक्षी दलों के इनकार करने से वोटों का बिखराव हुआ।
अखिलेश यादव के लिए इस प्रस्ताव को स्वीकार करना क्यों चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है?
सपा को डर है कि ओवैसी से सीधे जुड़ने पर भाजपा इसे तुष्टिकरण बताकर बहुसंख्यक और गैर-यादव ओबीसी वोटों को एकजुट कर सकती है।
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की अनुमानित हिस्सेदारी कितनी है?
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की आबादी लगभग 19 से 20 प्रतिशत मानी जाती है, जो सपा का पारंपरिक वोट बैंक रहा है।
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टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·38 दिन पहले

उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में इस गठबंधन प्रस्ताव का असर केवल चुनावी समीकरणों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह राज्य के सांस्कृतिक परिदृश्य और यात्रा आधारित पर्यटन को भी प्रभावित कर सकता है। जब राजनीतिक गतिविधियां और रैलियां बढ़ती हैं, तो स्थानीय आतिथ्य, होटल उद्योग और सांस्कृतिक उत्सवों पर इनका सीधा असर पड़ता है। मुरादाबाद जैसे पीतल उद्योग और सांस्कृतिक धरोहर वाले शहर में इस तरह की हलचल से स्थानीय लाइफस्टाइल और पर्यटन अर्थव्यवस्था में एक नया दौर शुरू हो सकता है, जो आने वाले समय में वैश्विक पर्यटकों के नजरिए से भी महत्वपूर्ण साबित होगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·38 दिन पहले

ओवैसी का यह प्रस्ताव समाजवादी पार्टी के 'पीडीए' फॉर्मूले की असली परीक्षा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण टालने के लिए अखिलेश यादव को फूंक-फूंककर कदम रखना होगा। एआईएमआईएम को साथ लेने से जहां एक तरफ मुस्लिम वोटों का बिखराव रुक सकता है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा को बहुसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण का सीधा मौका मिल सकता है। धर्मनिरपेक्षता और सीटों के बंटवारे के बीच का यह संतुलन ही 2027 के चुनावी समीकरणों को तय करेगा।

Ravikash Gupta@ravikash·38 दिन पहले

अर्जुन की बात बिल्कुल सही है, लेकिन यहाँ बड़ा सवाल 'पीडीए' के 'पी' (पिछड़ा) और 'डी' (दलित) घटकों पर पड़ने वाले प्रभाव का है। यदि समाजवादी पार्टी एआईएमआईएम के साथ औपचारिक गठबंधन करती है, तो भाजपा को जवाबी ध्रुवीकरण का सीधा अवसर मिल जाएगा। इससे गैर-यादव ओबीसी और दलित मतदाता, जिन्हें अखिलेश ने अपने पाले में खींचा था, वापस छिटक सकते हैं। इसलिए, ओवैसी को साथ लेने का गणित जितना सीधा दिखता है, ज़मीनी सामाजिक समीकरणों के लिहाज़ से यह उतना ही जटिल है। विपक्ष के लिए असली चुनौती मुस्लिम वोटों को बिखरने से बचाने के साथ-साथ अपने इस व्यापक सामाजिक आधार को एकजुट रखने की होगी।

Rohan Verma@rohan-verma·38 दिन पहले

ओवैसी का यह कदम अखिलेश यादव के पीडीए (PDA) कार्ड की बड़ी परीक्षा है। सपा के लिए दुविधा यह है कि अगर वे एआईएमआईएम को साथ लेते हैं, तो गैर-यादव ओबीसी और अन्य वर्गों के ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ेगा, और अगर ठुकराते हैं, तो मुस्लिम समाज में प्रतिनिधित्व की अनदेखी का आरोप मजबूत होगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक है, वहां यह त्रिकोणीय रस्साकशी 2027 के चुनावी समीकरणों को बेहद दिलचस्प और संवेदनशील बना देगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·38 दिन पहले

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इतिहास गवाह है कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का सीधा असर वहाँ की कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा पर पड़ता है। मुरादाबाद जैसे संवेदनशील जिलों में यह चुनावी रस्साकशी केवल मतों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक संवेदनशीलता और सुरक्षा चुनौतियों को भी बढ़ा सकती है। अत्यधिक ध्रुवीकृत मुकाबले में पुलिस और प्रशासन के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। राजनीतिक दलों को चुनावी बिसात बिछाते समय सामाजिक सौहार्द और जनता की सुरक्षा को सर्वोपरि रखना होगा।

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