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नागौर में जयप्रकाश शर्मा ने गोबर और गौमूत्र से बनाई इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं, लंदन तक पहुंची मांगराजस्थान
5 सित॰ 2026, 12:18 pm (21 दिन पहले)· 3

नागौर में जयप्रकाश शर्मा ने गोबर और गौमूत्र से बनाई इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं, लंदन तक पहुंची मांग

नागौर के शारदा पुरम कॉलोनी में जयप्रकाश शर्मा ने पंचगव्य का उपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल भगवान गणेश की मूर्तियां बनाई हैं। इन प्रतिमाओं की मांग राजस्थान के अलावा गुजरात और लंदन तक पहुंच गई है।

आगामी गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर इस बार आस्था के साथ प्रकृति की रक्षा का संदेश देने वाली एक अनूठी पहल सामने आई है। राजस्थान के नागौर जिले की शारदा पुरम कॉलोनी में रहने वाले जयप्रकाश शर्मा इन दिनों पूरी तरह से प्राकृतिक तत्वों से भगवान गणेश की मूर्तियां गढ़ने में जुटे हुए हैं। पिछले करीब एक महीने से लगातार जारी उनके इस प्रयास में पारंपरिक मूर्तिकला से हटकर पर्यावरण बचाने की एक मजबूत भावना दिखाई देती है। खास बात यह है कि इन मूर्तियों को बनाने में किसी भी तरह के हानिकारक प्लास्टर ऑफ पेरिस या रासायनिक रंगों का उपयोग बिल्कुल नहीं किया गया है।

इन खास प्रतिमाओं के निर्माण में पूरी तरह से देसी गाय के गोबर, गौमूत्र, शुद्ध देसी घी, लाल मिट्टी और बिल्व पत्र के बीजों का इस्तेमाल किया जा रहा है। मूर्तियों को सुंदर और मनमोहक रूप देने के लिए भी कृत्रिम रंगों की जगह प्राकृतिक माध्यमों को ही प्राथमिकता दी जाती है। जयप्रकाश का मुख्य उद्देश्य इस बड़े धार्मिक उत्सव के जरिए आम जनमानस को पर्यावरण और गोवंश की संभाल के प्रति जागरूक करना है ताकि उत्सव के दौरान प्रकृति को कोई नुकसान न पहुंचे।

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इस बार बनाई गई इन गणेश प्रतिमाओं का आकार 4 इंच से शुरू होकर 12 इंच तक रखा गया है। घरों में आसानी से स्थापना के लिए लोग विशेष रूप से इन छोटे आकारों को बहुत पसंद कर रहे हैं। नागौर के स्थानीय बाजारों के अलावा राज्य के कई अन्य हिस्सों से भी लगातार मांग आ रही है। धीरे-धीरे इस अनोखे प्रयोग की गूंज देश की सीमाओं को पार कर चुकी है और गुजरात के साथ-साथ यूके तथा लंदन तक भी इन मूर्तियों की खेप पहुंचाई जा चुकी है।

इन मूर्तियों की सबसे अनूठी विशेषता उनका विसर्जन करने का तरीका है जो पारंपरिक तौर-तरीकों से बिल्कुल अलग है। सामान्य मूर्तियों की तरह इन्हें किसी भी नदी, तालाब या अन्य प्राकृतिक जलस्रोत में प्रवाहित करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है। भक्तजन अपने ही घर के किसी गमले में इन प्रतिमाओं का विसर्जन बेहद आसानी से कर सकते हैं। मूर्ति को गमले की मिट्टी में रखकर जैसे ही ऊपर से पानी डाला जाता है, वह धीरे-धीरे पानी में घुलने लगती है और कुछ ही समय बाद पूरी तरह से मिट्टी में मिलकर खाद का रूप ले लेती है, जिससे उस गमले के पौधों को भी पोषण मिलता है।

पूरी निर्माण प्रक्रिया को पूरी तरह से शुद्ध और प्राकृतिक बनाए रखने के लिए एक निश्चित तरीका अपनाया जाता है। शुरुआत में देसी गाय के गोबर को अच्छी तरह सुखाकर उसका महीन पाउडर तैयार किया जाता है। इसके बाद उस सूखे पाउडर में लाल मिट्टी, गौमूत्र और शुद्ध देसी घी को आपस में मिलाया जाता है। इन सभी सामग्रियों को एक निश्चित अनुपात में गूंथकर एक मजबूत मिश्रण तैयार किया जाता है जिससे मूर्तियों को एक टिकाऊ और खूबसूरत आकार मिल सके। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी कृत्रिम रसायन का उपयोग नहीं किया जाता है।

मूर्तियों को आपस में जोड़ने और उन्हें अतिरिक्त मजबूती प्रदान करने के लिए बिल्व पत्र के बीजों का विशेष पाउडर काम में लाया जाता है। इस पाउडर में पवित्र गंगाजल मिलाकर एक गाढ़ा घोल तैयार किया जाता है, जिसे फिर गोबर और मिट्टी के मुख्य मिश्रण में मिलाया जाता है। इसके बाद इसी मिश्रण से भगवान गणेश के विभिन्न स्वरूपों को हाथों से गढ़ा जाता है। प्राकृतिक सामग्री होने और पूरी तरह से हाथ से काम होने के कारण इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय और मेहनत लगती है, लेकिन जयप्रकाश इसे प्रकृति बचाने की दिशा में एक बेहद जरूरी और सार्थक कदम मानते हैं।

पंचगव्य से तैयार की जाने वाली ये गणेश प्रतिमाएं एक साथ धार्मिक भावना और पर्यावरण संरक्षण का बेहतरीन संदेश दे रही हैं। एक तरफ जहां इनसे भक्तों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है, वहीं दूसरी तरफ विसर्जन के बाद खाद में बदल जाने के कारण जल प्रदूषण का खतरा पूरी तरह समाप्त हो जाता है। नागौर की एक छोटी सी कॉलोनी से शुरू हुआ यह सफर आज गुजरात से होता हुआ लंदन तक अपनी पहुंच बना चुका है। आने वाले समय में यह अनूठी पहल देश भर में पर्यावरण के अनुकूल गणेश उत्सव मनाने की एक बड़ी मिसाल साबित हो सकती है।

सवाल-जवाब

जयप्रकाश शर्मा ने ये मूर्तियां किस सामग्री से बनाई हैं?
इन्होंने देसी गाय के गोबर, गौमूत्र, देसी घी, लाल मिट्टी और बिल्व पत्र के बीजों का उपयोग किया है।
इन मूर्तियों का आकार क्या है?
ये मूर्तियां 4 इंच से लेकर 12 इंच तक के आकार में तैयार की गई हैं।
इन मूर्तियों का विसर्जन कैसे किया जाता है?
इन्हें नदियों में प्रवाहित करने के बजाय घर के किसी भी गमले की मिट्टी में रखकर पानी डाला जाता है जिससे ये खाद बन जाती हैं।
ये मूर्तियां नागौर के अलावा कहां तक पहुंची हैं?
नागौर और राजस्थान के अन्य शहरों के अलावा ये मूर्तियां गुजरात, यूके और लंदन तक भेजी जा चुकी हैं।
मूर्तियों को मजबूत बनाने के लिए क्या मिलाया जाता है?
मूर्तियों को जोड़ने और मजबूती देने के लिए बिल्व पत्र के बीजों के पाउडर में गंगाजल मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है।
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