बुलंदशहर के एक थाने में आबकारी अधिनियम के तहत जब्त की गई महिंद्रा एक्सयूवी को गैरकानूनी तरीके से पुलिस छापेमारी में ले जाने और उसके बाद हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे में महिला की मौत के मामले को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बेहद गंभीरता से लिया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को इस पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र और गोपनीय जांच करने के सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जाहिर की कि थाने के मालखाने या परिसर में सुरक्षित रखी जाने वाली जब्त संपत्ति को पुलिसकर्मियों ने अपनी मर्जी से बाहर निकाला, जिसके कारण एक निर्दोष परिवार उजड़ गया। उच्च न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक को पूरे प्रकरण की गहन पड़ताल कर 8 हफ्ते के भीतर अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।
इस पूरे मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने पुलिस विभाग द्वारा अपने ही दोषी कर्मियों को बचाने के रवैये पर कड़ा एतराज जताया। अदालत ने सवाल उठाया कि एक बेहद गंभीर और आपराधिक लापरवाही के मामले में केवल सर्विस रिकॉर्ड पर मामूली निंदा प्रविष्टि यानी सेंसर एंट्री दर्ज करके विभागीय जांच की इतिश्री क्यों कर दी गई। अदालत ने साफ किया कि जब्ती की हिरासत में मौजूद संपत्ति का अनधिकृत उपयोग केवल सेवा नियमों का सामान्य उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर कानून और जनता के भरोसे पर हमला है।
अवैध शराब मिलने के बाद जब्त हुई थी गाड़ी
इस पूरे विवाद की शुरुआत 16 अप्रैल 2021 को हुई थी। बुलंदशहर जिले के रामघाट थाने की पुलिस ने चेकिंग के दौरान एक महिंद्रा एक्सयूवी को रोका था। तलाशी लेने पर वाहन के भीतर से अवैध शराब के 19 कार्टन बरामद किए गए थे। अवैध शराब की तस्करी के आरोप में पुलिस ने वाहन को मौके पर ही आबकारी नियमों के तहत जब्त कर लिया था और उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत थाने के परिसर में सुरक्षित खड़ा करवा दिया गया था। कानूनी प्रावधानों के अनुसार, जब तक किसी सक्षम मजिस्ट्रेट या अदालत का स्पष्ट आदेश न हो, तब तक किसी भी जब्त वाहन को थाने से बाहर नहीं ले जाया जा सकता और न ही उसका कोई निजी या सरकारी उपयोग किया जा सकता है।
इसके बावजूद, जब्ती की कानूनी औपचारिकताएं चलने के दौरान ही 4 जून 2021 को इस एसयूवी को थाने से बाहर निकाल लिया गया। राज्य सरकार की तरफ से अदालत में पेश की गई जानकारी के अनुसार, तत्कालीन हेड मोहर्रिर सीताराम ने दो अन्य कांस्टेबलों पंकज राणा और नरेंद्र सिंह के साथ मिलकर इस गाड़ी को बाहर निकाला था। इन पुलिसकर्मियों का दावा था कि वे एक वांछित आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए दबिश देने जा रहे थे और इसी काम के लिए उन्होंने जब्त गाड़ी का इस्तेमाल किया। राज्य सरकार का यह भी कहना था कि इस पूरी कार्रवाई की जानकारी थाने के तत्कालीन प्रभारी निरीक्षक यानी एसएचओ बीरेंद्र सिंह को नहीं थी।
मथुरा में हुआ भीषण हादसा और महिला की मौत
थाने से गाड़ी निकाले जाने के महज तीन दिन बाद, यानी 7 जून 2021 को मथुरा जनपद के राया थाना क्षेत्र में यह एसयूवी एक गंभीर सड़क दुर्घटना का शिकार हो गई। टक्कर इतनी भीषण थी कि सड़क पर जा रहे मनोज कुमार के माता-पिता गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान मनोज कुमार की मां ने दम तोड़ दिया। इस जानलेवा घटना के बाद मथुरा पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दुर्घटना के संबंध में प्राथमिकी दर्ज की और दुर्घटनाग्रस्त एसयूवी को अपने अधिकार क्षेत्र में दोबारा जब्त कर लिया।
जब यह पूरा मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के संज्ञान में आया और अदालत ने दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध की गई विभागीय कार्रवाई का विवरण मांगा, तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बुलंदशहर ने विभागीय जांच को पूरी तरह बंद करते हुए हेड मोहर्रिर सीताराम और दोनों सिपाही पंकज राणा व नरेंद्र सिंह को केवल निंदा प्रविष्टि देकर छोड़ दिया था। इतने बड़े हादसे और जान जाने के बावजूद पुलिसकर्मियों पर किसी तरह का कड़ा प्रशासनिक या दांडिक कदम नहीं उठाया गया था।
अदालत की सख्त टिप्पणी और विभागीय लीपापोती पर सवाल
न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने 22 सितंबर को जारी अपने आदेश में इस मामूली विभागीय दंड पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। अदालत ने कहा कि जिस मामले में एक नागरिक की जान चली गई हो और पुलिस अभिरक्षा से वाहन का घोर दुरुपयोग हुआ हो, वहां महज सेंसर एंट्री देना प्रथम दृष्टया पूरी तरह अपर्याप्त, अनुचित और हास्यास्पद लगता है। उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि यह कोई साधारण प्रक्रियागत भूल नहीं है। यह पुलिस की सुरक्षित अभिरक्षा की संवैधानिक और वैधानिक जिम्मेदारी का खुला उल्लंघन है।
अदालत ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे इस पहलू की भी बारीकी से पड़ताल करें कि क्या दोषी पुलिसकर्मियों का यह कृत्य भारतीय दंड विधान के तहत चोरी, आपराधिक विश्वासघात या संपत्ति के आपराधिक गबन के दायरे में आता है। हालांकि उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि इस स्तर पर किसी भी पुलिसकर्मी की अंतिम आपराधिक जवाबदेही तय नहीं की जा रही है, बल्कि जांच का मुख्य मकसद निष्पक्ष तरीके से तथ्यों को सामने लाना और वास्तविक जिम्मेदारी तय करना है।
वरिष्ठ अधिकारियों और पर्यवेक्षण की भी होगी जांच
उच्च न्यायालय ने अपनी जांच का दायरा केवल निचले स्तर के सिपाहियों तक सीमित रखने से मना कर दिया है। पुलिस महानिदेशक को दिए गए आदेश में यह स्पष्ट किया गया है कि जांच के दौरान तत्कालीन एसएचओ बीरेंद्र सिंह के पर्यवेक्षी आचरण की भी जांच की जाएगी कि आखिर उनके थाने से उनकी जानकारी के बिना जब्त वाहन बाहर कैसे चला गया। इसके अलावा, तत्कालीन एसएसपी बुलंदशहर द्वारा की गई पूर्व विभागीय जांच की निष्पक्षता और पर्याप्तता की भी समीक्षा होगी, ताकि यह तय हो सके कि कहीं जानबूझकर दोषियों को बचाने की कोशिश तो नहीं की गई थी।
दूसरी ओर, उच्च न्यायालय ने वाहन मालिक की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने वाहन की मूल जब्ती को अवैध बताते हुए उसे चुनौती दी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि 19 कार्टन अवैध शराब मिलने पर गाड़ी को जब्त करने का आदेश कानूनी तौर पर सही था। अदालत ने कहा कि जब्ती की कार्रवाई में कोई कानूनी खामी नहीं थी, लेकिन जब्ती के बाद राज्य की मशीनरी द्वारा संपत्ति को संभालने में गंभीर आपराधिक और प्रशासनिक चूक हुई है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि पुलिस अभिरक्षा से वाहनों का इस तरह मनमाना दुरुपयोग होने दिया गया और बाद में सिर्फ नाममात्र की सजा दी गई, तो आपराधिक न्याय प्रणाली पर से आम जनता का भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।



















