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नागौर में खुदाई के दौरान मिला था गणेश और हनुमान का अद्भुत स्वरूप, एक ही पत्थर पर उकेरी गई हैं प्रतिमाएंराजस्थान
16 सित॰ 2026, 11:10 pm (8 दिन पहले)· 2

नागौर में खुदाई के दौरान मिला था गणेश और हनुमान का अद्भुत स्वरूप, एक ही पत्थर पर उकेरी गई हैं प्रतिमाएं

राजस्थान के नागौर स्थित बख्तासागर तालाब के पास एक अनोखा मंदिर है, जहां खुदाई के दौरान एक ही पत्थर पर भगवान गणेश और हनुमानजी की संयुक्त प्रतिमा निकली थी। विक्रम संवत 1730 में राजा बख्तावर सिंह के शासनकाल में तालाब की खुदाई के समय मिले इस दुर्लभ स्वरूप के दर्शन के लिए आज भी दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

राजस्थान के नागौर जिले से एक ऐसा हैरान करने वाला और चमत्कारी प्रसंग सामने आता है जो इतिहास और गहरी आस्था को आपस में जोड़ता है। इस स्थान पर भगवान गणेश और हनुमानजी की अद्धभुत प्रतिमाएं किसी कृत्रिम निर्माण का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि एक ही प्राकृतिक पत्थर पर स्वाभाविक रूप से उभरी हुई नजर आती हैं। इन दोनों देवताओं की आकृतियां अलग-अलग खंडों में नहीं बल्कि पूरी तरह से एक ही पाषाण पर उत्कीर्ण हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जब कोई भी श्रद्धालु इस प्रतिमा को बिल्कुल सामने से देखता है, तो उसे ऐसा आभास होता है मानो भगवान गणेश और संकटमोचन हनुमान एक साथ आकाश मार्ग में गमन कर रहे हों। यह पाषाण रूप नागौर शहर में ऐतिहासिक बख्तासागर तालाब के ठीक नजदीक स्थित भाकल इच्छा शक्ति हनुमान गणेश मंदिर के भीतर विराजमान है, जो आज के समय में आस्था का एक बहुत बड़ा और खास केंद्र बन चुका है।

बख्तासागर तालाब की खुदाई और इतिहास

इस पवित्र और अनोखे मंदिर के इतिहास के तार सीधे तौर पर नागौर के बख्तासागर तालाब के निर्माण कार्य से जुड़े हुए बताए जाते हैं। स्थानीय मान्यताओं और पुरानी जानकारियों के अनुसार, विक्रम संवत 1730 में तत्कालीन राजा बख्तावर सिंह ने बख्तासागर तालाब को बनवाने का काम शुरू करवाया था। जब इस विशाल तालाब के लिए जमीन की खुदाई का काम तेजी से चल रहा था, तभी अचानक श्रमिकों को जमीन के भीतर से एक विशेष पत्थर प्राप्त हुआ। इस रहस्यमयी और चमत्कारी पत्थर पर भगवान गणेश और हनुमानजी के अद्वितीय स्वरूप उकेरे हुए मिले। इस पाषाण को देखते ही वहां मौजूद लोगों की श्रद्धा स्वतः ही जागृत हो उठी और बाद में इसी निश्चित स्थान पर इस दिव्य प्रतिमा की विधिवत स्थापना कर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवा दिया गया। तभी से लेकर आज तक यह पावन स्थल क्षेत्र के श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है।

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ज्ञान और शक्ति का अनूठा संगम

इस अनूठी प्रतिमा का सबसे खास पहलू इसका स्वरूप और धार्मिक महत्व है जो भक्तों को अपनी ओर खींचता है। सनातन परंपरा में जहां एक तरफ भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक, ज्ञान और किसी भी कार्य के शुभारंभ का प्रतीक माना गया है, वहीं दूसरी तरफ हनुमानजी को असीम शक्ति, अदम्य साहस और अनन्य भक्ति का देवता माना जाता है। ऐसे में एक ही पाषाण पर इन दोनों महान देवताओं का एक साथ प्रकट होना भक्तों के लिए बुद्धि और बल यानी ज्ञान और शक्ति के महान संगम का प्रत्यक्ष प्रतीक बन जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश और हनुमानजी दोनों ऐसे पावन देव स्वरूप हैं जिन पर किसी भी प्रकार के नवग्रहों का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी प्राचीन मान्यता के आधार पर यह विश्वास किया जाता है कि जो भी भक्त अपने जीवन की गंभीर बाधाओं, संकटों और परेशानियों से मुक्ति पाने की कामना लेकर इस संयुक्त स्वरूप की सच्ची श्रद्धा से पूजा-अर्चना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

दृष्टि को मोह लेने वाली बनावट

इस मंदिर में आने वाले हर एक श्रद्धालु के लिए यह प्रतिमा हमेशा से ही बड़े कौतूहल और आकर्षण का विषय रही है। कड़े पाषाण पर तराशे गए दोनों देवताओं का यह रूप ऐसा है कि जो भी व्यक्ति इसे पहली बार देखता है, उसकी नजरें वहीं ठहर जाती हैं और ध्यान स्वतः ही आकर्षित हो जाता है। विशेष रूप से प्रतिमा की शारीरिक बनावट और गति की मुद्रा देखकर ऐसा अहसास होता है मानो भगवान गणेश और हनुमानजी एक साथ वायुमार्ग से आसमान की तरफ गतिशील मुद्रा में बढ़ रहे हों। भगवान गणेश और हनुमान के इस प्रकार के संयुक्त और दुर्लभ स्वरूप का उल्लेख धार्मिक परंपराओं में भी विशेष रूप से मिलता है। देश के दक्षिण में स्थित चेन्नई शहर के एक प्रसिद्ध मंदिर में भी इसी तरह के संयुक्त स्वरूप को आद्यंत महाप्रभु के रूप में पूजा जाता है। नागौर का यह ऐतिहासिक मंदिर भी इसी प्रकार के अत्यंत दुर्लभ और अद्भुत स्वरूप के कारण देश भर के श्रद्धालुओं और सनातन धर्म में गहरी रुचि रखने वाले लोगों के बीच विशेष महत्व रखता है।

सवाल-जवाब

नागौर में यह अनोखा मंदिर कहां स्थित है?
यह मंदिर नागौर में ऐतिहासिक बख्तासागर तालाब के पास भाकल इच्छा शक्ति हनुमान गणेश मंदिर के रूप में स्थित है।
इस प्रतिमा की खोज कब हुई थी?
इस प्रतिमा की खोज विक्रम संवत 1730 में राजा बख्तावर सिंह के कार्यकाल के दौरान बख्तासागर तालाब की खुदाई के वक्त हुई थी।
प्रतिमा की मुख्य विशेषता क्या है?
इसकी मुख्य विशेषता यह है कि भगवान गणेश और हनुमानजी की प्रतिमाएं अलग-अलग न होकर एक ही पत्थर पर उकेरी गई हैं।
इस स्वरूप को किस बात का प्रतीक माना जाता है?
यह स्वरूप बुद्धि, ज्ञान और शक्ति का संगम माना जाता है, जिसकी पूजा से जीवन की बाधाओं से मुक्ति की मान्यता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Riya Menon@riya-menon·8 दिन पहले

नागौर का यह ऐतिहासिक मंदिर राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। खाद्य और जीवनशैली के दृष्टिकोण से, ऐसे अनूठे धार्मिक स्थल केवल आस्था तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे क्षेत्र की पारंपरिक खानपान संस्कृति, मंदिर के विशेष भोग-प्रसाद की परंपराओं और सांस्कृतिक पर्यटन को भी संबल देते हैं। यदि ऐसे ऐतिहासिक स्थलों को सांस्कृतिक पर्यटन परिपथ से बेहतर ढंग से जोड़ा जाए, तो इससे नागौर की पारंपरिक जीवनशैली और वहां के स्थानीय व्यंजनों को भी व्यापक पहचान मिल सकती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 दिन पहले

यह समाचार आस्था और स्थानीय इतिहास के मेल को रेखांकित करता है, जहाँ विक्रम संवत 1730 के बख्तासागर तालाब की खुदाई से जुड़े पुरातात्विक साक्ष्य क्षेत्रीय पर्यटन और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की संभावनाओं को बढ़ाते हैं। ऐसे स्थल भविष्य में धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में उभर सकते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·8 दिन पहले

बख्तासागर तालाब की खुदाई से मिले इस पुरातात्विक साक्ष्य से न केवल नागौर की सांस्कृतिक धरोहर को बल मिलता है, बल्कि यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन और हेरिटेज ट्रेवल के नए आर्थिक अवसर भी पैदा कर सकता है। ऐसे दुर्लभ और ऐतिहासिक रूप स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और इकोनॉमी को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 दिन पहले

यह ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व का विषय है कि विक्रम संवत 1730 के कालखंड में बख्तासागर तालाब की खुदाई के दौरान मिली यह प्रतिमा कितनी सुरक्षित रही। हालांकि यह आपराधिक या कानूनी मामला नहीं है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा, प्राचीन धरोहरों के संरक्षण और ऐसे धार्मिक स्थलों पर बढ़ती भीड़ के प्रबंधन के लिए स्थानीय प्रशासन और कानून-व्यवस्था एजेंसियों को सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने चाहिए ताकि सांस्कृतिक संपदा सुरक्षित रहे।

Rohan Verma@rohan-verma·8 दिन पहले

यह घटना न केवल गहरी आस्था का प्रतीक है, बल्कि पुरातात्विक संपदा के वैज्ञानिक संरक्षण की बड़ी मांग भी उठाती है। प्रशासनिक स्तर पर यदि ऐसे ऐतिहासिक स्थलों के आसपास पर्यटन और भीड़ प्रबंधन के लिए ठोस नीति नहीं बनाई गई, तो सदियों पुरानी इस अनमोल धरोहर की मूल संरचना और आसपास के पुरातात्विक साक्ष्यों को भारी नुकसान पहुंच सकता है, जिस पर तुरंत ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

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