सिंह राशिफल 22 सितंबर 2026: आठवें भाव में शनि का प्रभाव, धैर्य और व्यवस्थित दिनचर्या से बनेंगे कामन्यूयॉर्क में वैश्विक तनाव पर बोले एस. जयशंकर, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में तुरंत बदलाव जरूरीकिश्त की मूल कंपनी वनईएमआई टेक्नोलॉजीज की बाजार में मजबूत एंट्री, 12 फीसदी प्रीमियम पर हुई लिस्टिंगदलाल स्ट्रीट पर शुक्रवार को लौटी रौनक, रियल्टी और मिडकैप की अगुवाई में सेंसेक्स और निफ्टी मजबूतअमेरिकी डॉलर के सामने कनाडाई डॉलर 5 अगस्त के बाद के सबसे निचले स्तर पर फिसला, व्यापार तनाव से बढ़ा दबावकच्चे तेल में चार दिनों की गिरावट थमी, एशियाई कारोबार में कीमतें संभलींशेयर बाजार में आज 64 कंपनियों का एक्स-डेट एक्शन: टीएएएल टेक का स्टॉक स्प्लिट और 63 शेयरों पर डिविडेंड का मौकाराजस्थान के देशनोक में खेत की डिग्गी में डूबे तीन सगे भाई, एक-दूसरे को बचाने के प्रयास में गई जानलखनऊ में 3,567 शिक्षकों और प्रधानाचार्यों को बांटे गए नियुक्ति पत्र, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया पर जोरबैंक ऑफ बड़ौदा और केनरा बैंक के कर्जदारों पर बढ़ा ब्याज का बोझ, 12 जून से लागू होंगी नई दरें
निठारी कांड के बरी आरोपी सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत, जेल से रिहाई के सिर्फ 310 दिन बाद लगा ली फांसीउत्तराखंड
18 सित॰ 2026, 5:36 pm (4 दिन पहले)· 1

निठारी कांड के बरी आरोपी सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत, जेल से रिहाई के सिर्फ 310 दिन बाद लगा ली फांसी

निठारी कांड के आरोपी सुरेंद्र कोली ने जेल से रिहा होने के 310 दिन बाद हरिद्वार में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली, जहां वह एक चाय की दुकान पर काम कर रहा था।

तकरीबन दो दशकों तक देश की सबसे बड़ी और खौफनाक आपराधिक गुत्थियों में से एक रहे निठारी कांड के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली की कहानी का अंत हो गया है। लगभग 19 वर्षों तक जेल की सलाखों के पीछे रहने के बाद, कानूनी रूप से पूरी तरह बरी होकर बाहर आया सुरेंद्र कोली अपनी आजादी के 310 दिन भी पूरे नहीं कर पाया। शुक्रवार को उत्तराखंड के हरिद्वार में भूपतवाला इलाके से उसकी मौत की खबर सामने आई, जहां उसने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। अभी तीन दिन पहले ही उसने वहां एक स्थानीय चाय की दुकान पर काम करना शुरू किया था। जिस शख्स की जिंदगी के 6,935 दिन जेल की कालकोठरी में सुरक्षा और मुकदमों के बीच गुजरे, खुली हवा में आते ही उसकी सांसें हमेशा के लिए थम गईं। इस घटना ने एक बार फिर उस दौर की यादें ताजा कर दी हैं जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।

जेल से लेकर बरी होने तक का उतार-चढ़ाव भरा सफर

सुरेंद्र कोली का कानूनी सफर बेहद पेचीदा और नाटकीय मोड़ों से भरा रहा। साल 2006 में गिरफ्तारी के बाद से वह लगातार जेल में बंद था। एक समय ऐसा था जब निचली अदालतों ने उसे बेहद जघन्य अपराधों का दोषी मानते हुए 13 अलग-अलग मामलों में मौत की सजा सुनाई थी। देश की जनता और न्याय प्रणाली के बीच इस मामले को लेकर गहरा गुस्सा था। हालांकि, जैसे-जैसे यह मामला उच्च अदालतों में अपील के जरिए पहुंचा, अभियोजन पक्ष के दावों की कलई खुलने लगी। साल 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कोली को 12 मामलों में बरी कर दिया था। अदालत ने जांच के तरीकों और पेश किए गए सबूतों की विश्वसनीयता पर कड़े सवाल उठाए थे। इसके बाद भी उसके खिलाफ एक मामला लंबित था, जिसमें उसे राहत मिलना बाकी था।

ये भी पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला और रिहाई

सुरेंद्र कोली के भाग्य का अंतिम फैसला नवंबर 2025 में हुआ। उसका आखिरी मामला देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में बड़ी कमियों, ठोस वैज्ञानिक सबूतों की अनुपस्थिति और फॉरेंसिक साक्ष्यों के अभाव को रेखांकित किया। अदालत ने पाया कि कोली के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और पुख्ता सबूत मौजूद नहीं थे। इसी आधार पर न्यायालय ने उसे इस अंतिम मामले में भी पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और घरेलू सहायक सुरेंद्र कोली दोनों को सबूतों की भारी कमी के कारण राहत दी थी। सभी कानूनी अड़चनों से मुक्त होने के बाद कोली आखिरकार जेल की चहारदीवारी से बाहर आ सका था, लेकिन उसकी यह आजादी बेहद संक्षिप्त साबित हुई।

निठारी कांड: नोएडा की वह खौफनाक कोठी डी-5

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत साल 2005 और 2006 के बीच हुई थी, जब उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित निठारी गांव से अचानक बच्चे और महिलाएं लापता होने लगे थे। एक के बाद एक कई लोगों के गायब होने से पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया था। पुलिस की शुरुआती सुस्ती के बाद जब जांच ने रफ्तार पकड़ी, तो सुराग नोएडा के सेक्टर-31 स्थित कोठी नंबर डी-5 की तरफ गए। यह आलीशान कोठी एक कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर की थी, और सुरेंद्र कोली वहां उसका घरेलू नौकर या सहायक था। जांचकर्ताओं को भनक भी नहीं थी कि इस कोठी की दीवारों के पीछे कितना बड़ा राज छिपा हुआ था।

नाले से मिले नरकंकाल और सीबीआई की जांच

29 दिसंबर 2006 का वह दिन भारतीय अपराध के इतिहास में दर्ज हो गया, जब कोठी डी-5 के पीछे बने एक नाले और उसके आसपास की जमीन से इंसानी खोपड़ियां, हड्डियों के अवशेष, बच्चों के सड़े-गले कपड़े और अन्य संदिग्ध सामान बरामद हुए। इस वीभत्स खोज ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इसके तुरंत बाद पुलिस ने मोनिंदर सिंह पंढेर और उसके नौकर सुरेंद्र कोली को गिरफ्तार कर लिया। मामले की संवेदनशीलता और बड़े पैमाने पर फैले जनाक्रोश को देखते हुए जनवरी 2007 में इस पूरे मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को सौंप दी गई। स्थानीय पुलिस ने इस सिलसिले में कुल 19 विभिन्न गुमशुदगी और गंभीर अपराधों के मुकदमे दर्ज किए थे। CBI ने अपनी गहन पड़ताल के बाद इनमें से 16 मामलों में अदालत के सामने आरोप पत्र दाखिल किए, जिनमें कोली पर अपहरण, बलात्कार, बर्बर हत्या और सबूतों को मिटाने जैसे बेहद संगीन आरोप लगाए गए थे।

हरिद्वार में जीवन का अंतिम अध्याय

कानूनी मुकदमों से बरी होने के बाद सुरेंद्र कोली ने समाज की मुख्यधारा में लौटने की कोशिश की थी। वह अपनी पहचान छिपाकर या नए सिरे से जिंदगी शुरू करने के इरादे से उत्तराखंड के धार्मिक शहर हरिद्वार पहुंचा था। वह उत्तरी हरिद्वार के भूपतवाला नामक इलाके में आया और वहां एक साधारण सी चाय की दुकान पर अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए काम करने लगा। लेकिन वहां काम शुरू किए अभी केवल तीन दिन ही हुए थे कि शुक्रवार को उसकी लाश फंदे से लटकती हुई पाई गई। शुरुआती जांच के आधार पर स्थानीय पुलिस इसे आत्महत्या मान रही है। जो शख्स लगभग दो दशकों तक जेल की सख्त सुरक्षा में जीवित रहा, वह खुली दुनिया में आने के एक साल के भीतर ही टूट गया और इस तरह निठारी कांड के सबसे चर्चित चेहरे का अंत बेहद खामोशी से हो गया।

सवाल-जवाब

सुरेंद्र कोली की मौत कब और कहां हुई?
सुरेंद्र कोली की मौत शुक्रवार को उत्तराखंड के हरिद्वार शहर के भूपतवाला इलाके में हुई।
कोली हरिद्वार में क्या काम कर रहा था?
कोली अपनी मौत से केवल तीन दिन पहले ही हरिद्वार आया था और वहां एक स्थानीय चाय की दुकान पर काम कर रहा था।
सुरेंद्र कोली ने जेल में कितना समय बिताया और वह कितने दिनों तक आजाद रहा?
सुरेंद्र कोली ने जेल में कुल 6,935 दिन (लगभग 19 साल) गुजारे और जेल से रिहा होने के बाद वह केवल 310 दिन ही आजाद रह सका।
निठारी कांड की शुरुआत कब हुई थी और मुख्य आरोप क्या थे?
निठारी कांड की शुरुआत साल 2005-06 में नोएडा के निठारी गांव से बच्चों और महिलाओं के गायब होने के साथ हुई थी, जहां हत्या, दुष्कर्म, और अपहरण के आरोप लगे थे।
कोली को सभी मामलों में रिहाई कैसे मिली?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2023 में उसे 12 मामलों में बरी किया और नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने फॉरेंसिक सबूतों की कमी के आधार पर उसे आखिरी मामले में भी बरी कर दिया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Aisha Khan@aisha-khan·2 दिन पहले

निठारी कांड पर आधारित यह दुखद घटना इस बात को रेखांकित करती है कि न्याय प्रणाली से बरी होने के बावजूद आरोपियों का समाज में पुनर्वास कितना कठिन और जटिल होता है। लगभग दो दशक की कैद के बाद खुली हवा में सांस लेने वाला व्यक्ति यदि 310 दिनों के भीतर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है, तो यह केवल एक आत्महत्या का मामला नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अलगाव का गंभीर परिणाम है। आने वाले समय में ऐसे मामलों पर सिनेमैटिक या डॉक्यू-सीरीज़ का निर्माण होते समय, इस मानवीय पहलू और मानसिक संघर्ष को गहराई से पर्दे पर उकेरे जाने की पूरी संभावना है।

Ravikash Gupta@ravikash·3 दिन पहले

निठारी कांड के मुख्य आरोपी सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में आत्महत्या की यह घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासद अंत नहीं, बल्कि देश की आपराधिक न्याय प्रणाली और पुनर्वास तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करती है। करीब 19 साल जेल की कालकोठरी में बिताने और कानूनी रूप से बरी होने के बाद, समाज में उसकी सामाजिक अस्वीकार्यता, आर्थिक संकट और मनोवैज्ञानिक अलगाव ने उसे इस भयानक कदम के लिए मजबूर किया। यह मामला यह रेखांकित करता है कि लंबी कैद से रिहा होने वाले कैदियों के लिए मजबूत मनोवैज्ञानिक समर्थन और सामाजिक पुनर्वास की व्यवस्था कितनी आवश्यक है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·3 दिन पहले

सुरेंद्र कोली का यह त्रासद अंत केवल एक व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली के बाद के चरण यानी कैदी पुनर्वास और सामाजिक पुनरुत्थान की पूर्ण अनुपस्थिति को उजागर करता है। लगभग दो दशकों की लंबी और ізоलेटेड कैद के बाद जब कोई व्यक्ति रिहा होता है, तो उसके सामने आजीविका का संकट और तीव्र सामाजिक बहिष्कार होता है। यह घटना नीति निर्माताओं और कानूनविदों के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि न्याय केवल अदालतों में बरी होने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि जेल से बाहर आने वाले व्यक्तियों के लिए एक प्रभावी प्रशासनिक सहायता तंत्र भी अनिवार्य है, अन्यथा इस तरह की त्रासदियां व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बनती रहेंगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 दिन पहले

यह घटना एक गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट को उजागर करती है। लगभग दो दशकों की लंबी कैद के बाद अचानक मिली स्वतंत्रता और समाज की ओर से मिलने वाले सामाजिक बहिष्कार या स्वीकार्यता के अभाव ने संभवतः उसे इस चरम कदम तक पहुँचा दिया। यह मामला न केवल हमारी न्याय प्रणाली की सीमाओं को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि जेल से रिहा होने वाले ऐसे व्यक्तियों के पुन: समाजीकरण और मानसिक स्वास्थ्य के लिए राज्य स्तर पर कोई पुनर्वास नीति क्यों नहीं है।

Rohan Verma@rohan-verma·3 दिन पहले

लगभग दो दशक तक जेल की कालकोठरी में रहने के बाद बरी हुए सुरेंद्र कोली की आत्महत्या इस बात का गंभीर प्रमाण है कि कानूनी रूप से दोषमुक्त होने के बावजूद लंबे कारावास के बाद कैदियों का पुनर्वास न होना उनके लिए एक नया मानसिक संकट बन जाता है। हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली में यह एक बड़ा शून्य है कि जेल से बाहर आने वाले व्यक्तियों की मनोवैज्ञानिक स्थिति और समाज में उनकी सुगमता से वापसी के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। यदि समय रहते पूर्व कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक समायोजन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो ऐसे मामले भविष्य में भी हमारी व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करते रहेंगे।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp