गुजरात हाईकोर्ट ने वैवाहिक कानूनों की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है कि यदि किसी व्यक्ति का पहला विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ है, तो उसके द्वारा की गई दूसरी शादी स्वतः अमान्य मानी जाएगी. अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही दूसरी महिला को पुरुष के पहले विवाह की जानकारी पहले से रही हो, केवल यह तथ्य उस दूसरी शादी को कानूनी मान्यता नहीं दिला सकता. कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति के लिए दूसरा विवाह तभी मान्य हो सकता है जब पहली शादी का विधिवत तलाक हो चुका हो. इस आधार पर उच्च न्यायालय ने पहले से विवाहित पुरुष की दूसरी शादी को पूरी तरह गैरकानूनी करार दिया.
पड़ोस से शुरू हुआ रिश्ता और पंचायत में कराया पंजीकरण
इस पूरे मामले की शुरुआत एक पड़ोस में रहने वाले युवक और युवती के आपसी संबंध से हुई थी. वह पुरुष पहले से विवाहित था और उसका एक बच्चा भी था. इसके बावजूद दोनों ने साल 2022 में झागड़िया स्थित सुल्तानपुर ग्राम पंचायत में जाकर अपनी शादी का पंजीकरण कराया और वैवाहिक बंधन में बंध गए. दोनों ने अपने इस कदम की भनक अपने परिवारों को भी नहीं लगने दी थी. शादी रचाने के बाद फरवरी 2023 में दोनों छुट्टियां बिताने गोवा चले गए. जब वे दोनों वहां से वापस लौटे, तब तक युवक की पहली पत्नी को पूरे मामले की जानकारी हो चुकी थी और उसने दूसरी पत्नी के खिलाफ कानूनी शिकायत दर्ज करा दी थी.
वडोदरा फैमिली कोर्ट में याचिका और महिला का दावा
पहली पत्नी की ओर से पुलिस में मामला पहुंचने के बाद दूसरी महिला ने राहत के लिए वडोदरा फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उसने अदालत में अर्जी दाखिल कर अपनी इस शादी को पूरी तरह रद्द करने की गुहार लगाई. महिला का आरोप था कि युवक ने उसे यह कहकर अंधेरे में रखा था कि उसका पहली पत्नी से तलाक हो चुका है, और इसी धोखे में उसने शादी के कागजात पर दस्तखत किए थे. महिला ने यह भी कहा कि शादी के पंजीकरण के दौरान पुरुष ने खुद को अविवाहित बताया था. इसके अतिरिक्त महिला ने हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए दलील दी कि पहली शादी के अस्तित्व में रहते दूसरी शादी कानूनी रूप से वैध नहीं हो सकती, साथ ही विवाह के दौरान आवश्यक सप्तपदी की रस्म भी नहीं निभाई गई थी.
फैमिली कोर्ट ने खारिज की थी अर्जी, हाईकोर्ट में चुनौती
वडोदरा फैमिली कोर्ट ने सुनवाई के दौरान महिला की याचिका को खारिज कर दिया था. फैमिली कोर्ट का यह मानना था कि महिला को पुरुष के पहले से विवाहित होने की पूरी जानकारी थी, इसलिए वह बाद में अपने ही आचरण का अनुचित लाभ उठाकर शादी रद्द करने की मांग नहीं कर सकती. फैमिली कोर्ट ने पति के इस तर्क को सही माना था कि महिला सब कुछ जानते हुए रिश्ते में आगे बढ़ी थी. इस प्रतिकूल आदेश के बाद महिला ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को चुनौती देते हुए गुजरात हाईकोर्ट में अपील दायर की.
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कानूनी प्रावधान
गुजरात हाईकोर्ट में जस्टिस इलेश वोरा और जस्टिस आरटी वच्छानी की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की और फैमिली कोर्ट के फैसले को पूरी तरह पलट दिया. खंडपीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम के मूल सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए कहा कि जब तक पहली शादी कानूनी तौर पर कायम है, तब तक किया गया दूसरा विवाह कानून की नजर में शून्य और अवैध है. पीठ ने इस बात को गंभीरता से नोट किया कि पुरुष ने ऐसा कोई भी साक्ष्य अदालत में पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि उसका पहली पत्नी से तलाक हो चुका था.
अदालत की खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट ने सिर्फ इस बिंदु पर जोर देकर गलती की कि महिला को पहले विवाह की जानकारी थी, जबकि यह तर्क कानून के सामने बेहद कमजोर है. अदालत ने स्पष्ट रेखांकित किया कि जब पहली शादी के खत्म होने का कोई पुख्ता प्रमाण मौजूद नहीं है, तो दूसरी शादी किसी भी सूरत में वैध नहीं ठहर सकती. इस न्यायिक निर्णय से दूसरी महिला को अपनी शादी रद्द कराने में सफलता मिली, जबकि पुरुष का पहली पत्नी के साथ कानूनी वैवाहिक रिश्ता यथावत बना रहा.



















