लद्दाख की ऊंची और बर्फीली चोटियों पर जहां सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है, वहां भारी टैंक ज्यादा दूर तक साथ नहीं दे पाते. यही वजह है कि भारत और चीन दोनों ने अपने-अपने हल्के टैंक हिमालयी मोर्चे के लिए तैयार किए हैं, भारत का ज़ोरावर और चीन का Type-15. अब दोनों टैंकों की ताकत, स्पीड और तकनीक को लेकर तुलना शुरू हो गई है कि ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में असली बादशाहत किसकी होगी.
लद्दाख झड़प के बाद फिर शुरू हुई भारत की तैयारी
भारतीय सेना के पास कभी सोवियत मूल के PT-76 हल्के टैंक हुआ करते थे, जिन्हें 1989 में सेवा से हटा दिया गया था. इसके बाद 1983 से समय-समय पर नए हल्के टैंक शामिल करने की कोशिशें होती रहीं, लेकिन हर बार परियोजना अधूरी रह गई. तस्वीर तब बदली जब 2020 में लद्दाख सीमा पर तनाव बढ़ा. इस घटनाक्रम ने भारत को एहसास कराया कि ऊंचाई वाले मोर्चों के लिए हल्के, तेज़ और आधुनिक टैंकों की सख्त जरूरत है. इसी के बाद लाइट टैंक कार्यक्रम को नए सिरे से रफ्तार मिली और आखिरकार ज़ोरावर टैंक की शक्ल में यह परियोजना जमीन पर उतरी. इसे लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने साथ मिलकर तैयार किया है, और इसे भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता की एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है.
ज़ोरावर में क्या है खास
ज़ोरावर का वजन महज 25 टन है, जो इसे बेहद फुर्तीला बनाता है. इसमें 760 हॉर्सपावर का कमिंस इंजन लगा है, जिससे इसका पावर-टू-वेट अनुपात 30 हॉर्सपावर प्रति टन बैठता है. मारक क्षमता के लिए इसमें ऑटोलोडर से लैस 105 मिमी कॉकरिल गन दी गई है. टैंक की सुरक्षा को लेकर विस्तृत जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन इसमें एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) मौजूद है जो हमलों से बचाव में मदद करता है. निगरानी के मोर्चे पर इसमें इंटीग्रेटेड यूएवी लगाया गया है, जिससे युद्धक्षेत्र की जानकारी तुरंत मिल सके.
बताया जा रहा है कि ज़ोरावर में बेहतर मारक क्षमता, सुरक्षा, निगरानी और संचार जैसी सुविधाएं दी गई हैं. यह एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) दागने में भी सक्षम है. इसमें डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम और आधुनिक बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम लगा है, जिससे लक्ष्य पर सटीक निशाना लगाना और सेना की टुकड़ियों के बीच तालमेल बिठाना आसान हो जाता है. यह दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों, हेलीकॉप्टरों और किलेबंद ठिकानों तक को निशाना बना सकता है. सड़क पर इसकी रफ्तार 70 किलोमीटर प्रति घंटा तक जाती है और खास बात यह है कि यह पानी में भी आसानी से चल सकता है.
25 टन का यह टैंक हंटर-किलर तकनीक, थर्मल इमेजिंग और लेजर रेंजफाइंडर जैसी अत्याधुनिक प्रणालियों से लैस है, जो युद्ध के दौरान सैनिकों को स्थिति की सटीक जानकारी देती रहती हैं. इसकी एक और बड़ी खूबी है इसकी मल्टी-मोडल ट्रांसपोर्ट क्षमता, यानी इसे हवाई जहाज, रेल या सड़क, किसी भी माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह आसानी से पहुंचाया जा सकता है. इससे इसे दूर-दराज और दुर्गम इलाकों में बहुत तेजी से तैनात किया जा सकता है.
चीन का Type-15 भी कम नहीं
दूसरी ओर चीन का Type-15 लाइट टैंक वजन में ज़ोरावर से काफी भारी है, इसका वजन 36 टन है. इसमें 1000 हॉर्सपावर का शक्तिशाली इंजन लगा है, हालांकि इसका पावर-टू-वेट अनुपात 28.5 हॉर्सपावर प्रति टन है. इसमें 105 मिमी की मुख्य गन के साथ कंपोजिट आर्मर का इस्तेमाल किया गया है और सुरक्षा के लिए GL5 एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) मौजूद है. हालांकि इसकी निगरानी प्रणाली को लेकर विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है.
Type-15 की 105 मिमी राइफल्ड गन की मारक क्षमता करीब 3 किलोमीटर बताई गई है. इसमें भी ऑटोलोडर सिस्टम लगा है, जिसकी वजह से चालक दल की संख्या घटकर सिर्फ तीन रह जाती है और लगातार फायरिंग करना आसान हो जाता है. यह टैंक APFSDS, HEAT, HE के साथ-साथ गन से दागी जाने वाली एंटी-टैंक मिसाइल (ATGM) जैसे कई तरह के गोला-बारूद इस्तेमाल कर सकता है.
इसमें लेजर रेंजफाइंडर, बैलिस्टिक कंप्यूटर, थर्मल इमेजिंग, रडार और पैनोरमिक साइट जैसी आधुनिक तकनीकें दी गई हैं. इसका फायर कंट्रोल सिस्टम चलते हुए लक्ष्य का पीछा करने में सक्षम है और यह भी हंटर-किलर रणनीति को सपोर्ट करता है. चालक दल की सुविधा का खास ख्याल रखते हुए इसमें एयर कंडीशनिंग, ऑक्सीजन उत्पादन प्रणाली, बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम और नेविगेशन सिस्टम जैसे फीचर भी दिए गए हैं.
ऊंचाई के मोर्चे पर किसका पलड़ा भारी
दोनों टैंकों के आंकड़ों पर गौर करें तो ज़ोरावर हिमालय जैसे ऊंचाई वाले युद्धक्षेत्र के लिए ज्यादा मुफीद नजर आता है. इसका कम वजन, बेहतर गतिशीलता और आधुनिक तकनीक इसे दुर्गम इलाकों में तेजी से संचालन करने में बढ़त दिला सकती है. वहीं सुरक्षा के मामले में Type-15 को थोड़ी बढ़त मिल सकती है, लेकिन ज़ोरावर में मौजूद एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम और इंटीग्रेटेड यूएवी इस फर्क को काफी हद तक पाट सकते हैं.
सिर्फ स्पेसिफिकेशन से तय नहीं होता मैदान का नतीजा
यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी भी टैंक की असली ताकत सिर्फ उसके तकनीकी आंकड़ों से तय नहीं होती. चालक दल की ट्रेनिंग, युद्ध की रणनीति और मैदान की परिस्थितियां भी उतनी ही अहम भूमिका निभाती हैं. दोनों टैंक अभी काफी नए हैं, इसलिए इनकी असली क्षमता का सही आकलन आने वाले समय में वास्तविक संचालन के दौरान ही हो सकेगा.
फिलहाल ज़ोरावर को भारत की रक्षा तैयारियों में एक अहम कदम के तौर पर देखा जा रहा है. इसकी मारक क्षमता, फुर्ती और तेजी से कहीं भी तैनात हो जाने की खूबी इसे कई मायनों में चीन के Type-15 के मुकाबले एक मजबूत विकल्प बनाती है. साथ ही इसे आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की दिशा में भी एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.













