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पाली में गहने गिरवी रखकर बनाई गणेश मूर्तियां, फिर भी सन्नाटे में बाजारराजस्थान
9 सित॰ 2026, 10:29 pm (15 दिन पहले)· 2

पाली में गहने गिरवी रखकर बनाई गणेश मूर्तियां, फिर भी सन्नाटे में बाजार

पाली के एक मूर्तिकार परिवार ने पिछले साल हुए भारी नुकसान के बावजूद इस साल गहने गिरवी रखकर दो लाख रुपये से अधिक की लागत से गणेश मूर्तियां तैयार की हैं, लेकिन ग्राहकों के न आने से उनका पूरा परिवार आर्थिक संकट में घिर गया है।

पाली में गणेश चतुर्थी के पर्व को लेकर जहां एक तरफ चारों तरफ उत्सव और उत्साह का माहौल नजर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ राजा बली सर्कल के पास रखी हुई कुछ अधूरी और मुस्कुराती हुई प्रतिमाएं एक ऐसी व्यथा बयान कर रही हैं जिसमें खुशियों से ज्यादा तन्हाई और दर्द छिपा हुआ है। इस जगह पर पिछले 45 सालों से एक स्थानीय परिवार मिट्टी को संवारकर भगवान की सुंदर आकृतियां गढ़ने का काम कर रहा है। यह केवल इनके लिए जीविका कमाने का कोई माध्यम नहीं है, बल्कि इनका पूरा जीवन इसी कला के इर्द-गिर्द घूमता है। परिवार के वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि उन्हें इस काम के अलावा और कुछ नहीं आता है और उनके परिवार का भरण-पोषण इन्हीं मूर्तियों के जरिए होता है।

बीते साल की तबाही और भारी नुकसान

इस जश्न और रोशनी के पीछे का यथार्थ बहुत ही पीड़ादायक है। पिछले वर्ष गणेश चतुर्थी के अवसर पर भारी बारिश के कारण इस परिवार की कई मूर्तियां पानी भरने से नष्ट हो गई थीं, जिससे इन्हें लगभग 4.5 लाख रुपये का बहुत बड़ा वित्तीय घाटा उठाना पड़ा था। उस समय इन्हें पूरी उम्मीद थी कि इस बार की बिक्री से उस पुराने घाटे की भरपाई हो जाएगी, लेकिन हालात इसके बिल्कुल विपरीत साबित हुए और इनकी लागत तक वसूल नहीं हो पायी है।

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गहने गिरवी रखने की मजबूरी और बाजार का सन्नाटा

इस साल एक बार फिर नई उम्मीदों का दामन थामते हुए इस परिवार ने बप्पा की नई प्रतिमाओं का निर्माण किया है। इस बार भी इन्होंने काम को आगे बढ़ाने के लिए दो लाख रुपये से ज्यादा की पूंजी लगा दी है। जब जेब बिल्कुल खाली थी और हाथ में कोई नगदी नहीं बची थी, तब इन्हें अपनी घर की महिलाओं के जेवर तक गिरवी रखने पड़ गए। इसके बावजूद त्योहार अब बेहद करीब आ चुका है, लेकिन बाजारों में खरीदारों की भारी कमी बनी हुई है। लोग आते हैं, मूर्तियों को देखते हैं और मोलभाव करके आगे निकल जाते हैं। खरीदारों की संख्या इतनी कम है कि लागत निकलना भी मुश्किल हो रहा है। परिवार का कहना है कि उन्होंने अपने गहने गिरवी रखकर बप्पा को इसलिए गढ़ा था ताकि दूसरों के घरों में खुशियां आ सकें, लेकिन आज उनके खुद के घर का चूल्हा जलने पर संकट मंडरा रहा है.

प्रशासन से मदद की गुहार और कला बचाने की जद्दोजहद

पिछले पैंतालीस सालों की इस लंबी कलात्मक यात्रा के मुहाने पर खड़ा यह परिवार आज आर्थिक तंगी के उस दौर से गुजर रहा है जहां से आगे का रास्ता पूरी तरह धुंधला नजर आता है। इस हुनरमंद परिवार ने राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन के सामने गुहार लगाई है कि उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान की जाए ताकि उनकी यह पुरानी हस्तकला और उनका परिवार इस संकट से उबर सके। पूरे देश में गणपति के स्वागत की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन उन हाथों के बारे में कोई नहीं सोचता जो इन मूर्तियों में जान फूंकते हैं। पिछले साल साढ़े चार लाख का घाटा झेलने वाले इस परिवार के पास आज जीवन चलाने का कोई अन्य जरिया नहीं बचा है और सरकार से इन्हें मदद का इंतजार है।

सवाल-जवाब

पाली में मूर्तिकार परिवार को पिछले साल कितना नुकसान हुआ था?
पिछले साल बारिश और पानी भरने के कारण परिवार को लगभग 4.5 लाख रुपये का भारी नुकसान हुआ था।
इस साल मूर्तियों को बनाने के लिए परिवार ने कितने रुपये की लागत लगाई?
परिवार ने इस साल गणेश प्रतिमाओं को तैयार करने में 2 लाख रुपये से ज्यादा की लागत लगाई है।
मूर्तियों के निर्माण के लिए परिवार को क्या गिरवी रखना पड़ा?
पैसे न होने के कारण परिवार को घर की महिलाओं के गहने गिरवी रखने पड़े।
यह परिवार कितने सालों से मूर्तियां बना रहा है?
यह परिवार पिछले 45 सालों से मिट्टी की मूर्तियां बनाने का काम कर रहा है।
परिवार ने प्रशासन से क्या गुहार लगाई है?
परिवार ने अपनी कला और आजीविका को बचाने के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन से आर्थिक मदद की मांग की है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Ravikash Gupta@ravikash·15 दिन पहले

पाली के इस मूर्तिकार परिवार की व्यथा पारंपरिक अर्थव्यवस्था और सूक्ष्म ऋण संकट का एक गंभीर उदाहरण है। जब पारंपरिक कारीगर अपनी कार्यशील पूंजी के लिए अनौपचारिक स्रोतों या गहने गिरवी रखने पर निर्भर होते हैं, तो एक मौसम की आपदा या बाजार की मंदी उन्हें कर्ज के दुष्चक्र में धकेल देती है। इस वित्तीय असुरक्षा के कारण पीढ़ीगत हस्तकला और स्वदेशी कारीगरों का यह हुनर धीरे-धीरे समाप्त हो सकता है, जिसके लिए संस्थागत ऋण सहायता और बीमा सुरक्षा आवश्यक है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·15 दिन पहले

पाली के इस पारंपरिक मूर्तिकार परिवार का संकट महज एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि ग्रामीण और कुटीर उद्योगों की वित्तीय असुरक्षा का बड़ा संकेत है। पिछले साल के 4.5 लाख के भारी नुकसान के बाद इस बार 2 लाख रुपये की पूंजी जुटाने के लिए महिलाओं के जेवर गिरवी रखना यह साबित करता है कि मौसमी आपदाओं से निपटने के लिए इन हुनरमंदों के पास कोई संस्थागत वित्तीय सुरक्षा कवच या बीमा कवर मौजूद नहीं है। यदि समय पर सरकारी सहायता और आसान ऋण की व्यवस्था नहीं की गई, तो यह 45 साल पुरानी परंपरा दम तोड़ सकती है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत दोनों के लिए एक बड़ा झटका होगा।

Rohan Verma@rohan-verma·15 दिन पहले

यह रिपोर्ट पारंपरिक कारीगरों के सामने आ रही गंभीर वित्तीय चुनौतियों को उजागर करती है। पिछले साल के नुकसान के बाद गहने गिरवी रखकर दो लाख रुपये लगाने और खरीदार न मिलने से यह स्पष्ट है कि स्थानीय स्तर पर हस्तशिल्प और कला को संरक्षित करने के लिए कोई प्रभावी आर्थिक सुरक्षा तंत्र या बीमा योजना मौजूद नहीं है। यदि प्रशासन ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह पुश्तैनी हुनर दम तोड़ सकता है और भविष्य में ऐसे कारीगर इस कला को छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·15 दिन पहले

यह घटना न केवल एक परिवार की तबाही है, बल्कि पारंपरिक अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा की विफलता का प्रमाण है। जब स्थानीय कलाकार साहूकारों के चंगुल में फंसते हैं और प्रशासन मूकदर्शक रहता है, तो यह स्थिति आपराधिक लापरवाही जैसी प्रतीत होती है। यदि समय पर राहत पैकेज या विशेष ऋण माफी नहीं मिली, तो यह संकट अवैध ऋण दाताओं के जाल और गंभीर अपराधों को जन्म दे सकता है।

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