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फरीदाबाद के सोतई में किसानों का 26 दिन से धरना जारी, जेवर एयरपोर्ट के मुआवजे पर कोर्ट में सुनवाईहरियाणा
16 सित॰ 2026, 10:26 pm (5 दिन पहले)· 0

फरीदाबाद के सोतई में किसानों का 26 दिन से धरना जारी, जेवर एयरपोर्ट के मुआवजे पर कोर्ट में सुनवाई

फरीदाबाद के सोतई गांव के किसान जेवर एयरपोर्ट के लिए अधिग्रहित जमीन का मुआवजा न मिलने के कारण 26 दिनों से धरने पर बैठे हैं। इस मामले में अदालत में सुनवाई हुई और अगली तारीख 22 सितंबर तय की गई है।

फरीदाबाद के सोतई गांव में किसानों का आंदोलन अब छब्बीसवें दिन में प्रवेश कर चुका है। अपनी जमीन के अधिग्रहण के बदले मुआवजे की मांग को लेकर किसान दिन-रात धरने पर बैठे हुए हैं। इस बीच अदालत में इस मामले की सुनवाई हुई, जहां नगर निगम फरीदाबाद की ओर से एक नई अर्जी दाखिल किए जाने की जानकारी सामने आई है। किसानों का आरोप है कि इस नए आवेदन के माध्यम से नगर निगम अपने पहले के जवाब में फेरबदल करने की कोशिश कर रहा है। किसानों का यह भी कहना है कि अभी तक मामले से जुड़े आवश्यक दस्तावेज भी अदालत में पेश नहीं किए गए हैं।

जेवर एयरपोर्ट के लिए हुआ था जमीन अधिग्रहण

इस पूरे विवाद की जड़ जेवर एयरपोर्ट के लिए किया गया जमीन का अधिग्रहण है। एडवोकेट राजकुमार भाटी के अनुसार, सोतई गांव से आए इन किसानों की जमीनों को जेवर एयरपोर्ट परियोजना के लिए अधिग्रहित किया गया था, लेकिन इसके एवज में इन्हें अब तक कोई मुआवजा नहीं दिया गया है। मुआवजे की इसी राशि को पाने के लिए सभी प्रभावित लोग आंदोलन की राह पर हैं और लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं।

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अदालत में किसानों ने रखी अपनी बात

सुनवाई के दौरान किसान अदालत में पेश हुए और अपनी फाइलों के साथ दस्तावेज प्रस्तुत किए। सरकारी नीतियों के अनुसार अदालत में पहुंचे इन बारह सेक्टरों के किसानों के पास अपनी जमीन के पूरे कागजात मौजूद हैं। राजस्व रिकॉर्ड में भी जमीन इन्हीं किसानों के नाम पर दर्ज है। इसके बावजूद तय समय पर मुआवजा राशि न मिलने के कारण सभी लोग गहरी परेशानी और मानसिक तनाव के दौर से गुजर रहे हैं।

जमीनों के बढ़े हुए दामों से भारी वित्तीय नुकसान

किसान पक्षों का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में जमीनों के बाजार भाव तीन से चार गुना तक बढ़ चुके हैं, जबकि मुआवजा केवल एक गुना दर के हिसाब से आंका जा रहा है। इससे किसानों को भारी वित्तीय घाटा उठाना पड़ रहा है। समय पर भुगतान न मिलने के कारण किसानों में गहरा रोष व्याप्त है। अदालत में सुनवाई के दौरान किसानों का पक्ष विस्तार से सुना गया और मामले की त्वरित सुनवाई के निर्देश देने की मांग की गई।

भूख हड़ताल पर बैठने की थी तैयारी

किसान नेता बबलू हुड्डा ने बताया कि आज उनके धरने का छब्बीसवां दिन पूरा हो गया है। इससे पहले सभी ने मिलकर यह तय किया था कि आज का प्रदर्शन सोतई गांव के साथ-साथ न्यायाधीश के कक्ष के बाहर भी किया जाएगा। आज किसान भूख हड़ताल करने के इरादे से आए थे, लेकिन वकील के माध्यम से उनकी मुलाकात न्यायाधीश से हो गई, जहां उन्होंने अपनी सारी बातें खुलकर रखीं।

साल 2022 से मुआवजे का इंतजार

किसानों ने न्यायाधीश को बताया कि सरकार ने उनकी जमीन का अधिग्रहण साल 2022 में किया था और अब साल 2026 चल रहा है जो समाप्ति की ओर है। इस लंबे अंतराल के बाद भी उन्हें मुआवजे के नाम पर एक रुपया तक नहीं मिला है। किसानों का दावा है कि अधिग्रहित जमीन पूरी तरह से उनकी है और इसका एक भी सिंगल डॉक्यूमेंट न तो नगर निगम फरीदाबाद के पास है और न ही भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के पास है।

साल 2022 और 2026 के रेट में जमीन-आसमान का अंतर

किसानों ने अदालत के समक्ष यह भी बात रखी कि साल 2022 और मौजूदा साल 2026 के जमीन के भावों में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है। जो जमीन पहले एक एकड़ की कीमत रखती थी, आज वह केवल सौ गज के बराबर हो गई है। दूसरी तरफ से कोई ठोस गवाह या सबूत पेश नहीं किया जा रहा है, जिससे यह साफ साबित होता है कि जमीन के असली मालिक यही किसान हैं।

जब तक मुआवजा नहीं मिलेगा, धरना रहेगा जारी

सोतई गांव के निवासी कैलाश ने बताया कि गांव के सभी बुजुर्ग और युवा पिछले छब्बीस दिनों से लगातार धरने पर बैठे हैं और रोजाना अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। वे कोई भी अनुचित मांग नहीं कर रहे बल्कि अपनी ही जमीन का हक मांग रहे हैं। किसानों ने स्पष्ट किया है कि जब तक उन्हें मुआवजा नहीं मिल जाता और सरकार उनकी बात मान नहीं लेती, तब तक यह शांतिपूर्ण धरना इसी तरह लगातार जारी रहेगा।

सवाल-जवाब

सोतई गांव के किसान क्यों धरना दे रहे हैं?
किसान जेवर एयरपोर्ट के लिए अधिग्रहित की गई जमीन का मुआवजा न मिलने के विरोध में 26 दिनों से धरना दे रहे हैं।
सोतई के किसानों की जमीन किस परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी?
किसानों की जमीन जेवर एयरपोर्ट के लिए अधिग्रहित की गई थी।
इस मामले की अगली अदालत में सुनवाई कब होगी?
इस मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को तय की गई है।
किसानों ने जमीन का अधिग्रहण किस वर्ष होने का दावा किया है?
किसानों के अनुसार सरकार ने उनकी जमीन का अधिग्रहण वर्ष 2022 में किया था।
नगर निगम फरीदाबाद ने अदालत में क्या किया है?
नगर निगम फरीदाबाद ने अदालत में एक नई एप्लीकेशन दाखिल की है जिसके जरिए वे अपने पहले दिए गए जवाब में बदलाव करना चाहते हैं।
किसान नेता का क्या नाम है जो इस धरने का नेतृत्व कर रहे हैं?
किसान नेता बबलू हुड्डा इस आंदोलन से जुड़े हुए हैं।
किसानों का विरोध प्रदर्शन कितने दिनों से चल रहा है?
किसानों का धरना आज 26वें दिन भी जारी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Nyra Kaif@nyra-kaif·5 दिन पहले

यह खबर केवल प्रशासनिक देरी का मामला नहीं है, बल्कि अनिश्चितता से उपजे उस गहरे मानसिक तनाव को उजागर करती है जो सीधे तौर पर किसानों के पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर रहा है। चार साल तक मुआवजे का भुगतान न होने से परिवारों की वित्तीय स्थिरता डगमगा गई है, जिसका असर ग्रामीण जीवनशैली और युवा पीढ़ी की मानसिक सेहत पर भी पड़ रहा है। यदि यह स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो यह असंतोष एक बड़े सामाजिक संकट का रूप ले सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

यह मामला प्रशासनिक शिथिलता और कानूनी दांव-पेंच का एक गंभीर उदाहरण है, जहां 2022 से मुआवजे का अटकाव नीतिगत विसंगतियों को उजागर करता है। यदि नगर निगम के नए आवेदनों और अदालती देरी का यही दौर चलता रहा, तो यह गतिरोध राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और स्थानीय भू-स्वामियों के बीच विश्वास को और कम कर सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

यह गतिरोध केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह बड़े बुनियादी ढांचा निवेश और वित्तीय परिसंपत्ति प्रबंधन पर दूरगामी प्रभाव डालता है। जब अधिग्रहण के चार साल बाद भी वैध मुआवजा नहीं मिलता, तो ज़मीन जैसी अचल संपत्ति में निवेश करने वाले निवेशकों का भरोसा डगमगाता है। इस तरह की प्रशासनिक देरी और कानूनी उलझनें भविष्य के प्रोजेक्ट्स के लिए पूंजी प्रवाह और कॉरपोरेट-भूस्वामी संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

फरीदाबाद के सोतई गांव में किसानों का यह 26 दिवसीय धरना प्रशासनिक सुस्ती और कानूनी दांव-पेच का एक गंभीर उदाहरण है। साल 2022 से मुआवजे का अटका रहना और नगर निगम द्वारा जवाब में फेरबदल की कोशिशें प्रक्रिया को और लंबा खींच रही हैं। हालांकि किसानों की अदालत तक सीधी पहुंच और कानूनी कागजातों की मजबूती उनकी स्थिति को मजबूत करती है, लेकिन इस विलंब से न केवल उनका वित्तीय नुकसान हो रहा है बल्कि जनहित और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भी तनाव बढ़ रहा है। 22 सितंबर की अगली सुनवाई इस बात तय करेगी कि न्याय व्यवस्था इस प्रशासनिक टालमटोल पर कितना कड़ा रुख अपनाती है।

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

वर्ष 2022 से भूमि अधिग्रहण के बावजूद मुआवजे का भुगतान न होना और अब नगर निगम द्वारा नए आवेदनों के जरिए कानूनी प्रक्रिया को उलझाना प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जेवर एयरपोर्ट जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के आसपास क्षेत्रीय स्तर पर बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ यह जरूरी है कि विस्थापित किसानों के वित्तीय हितों की रक्षा समय पर हो। यदि 22 सितंबर की अगली सुनवाई में कोई ठोस समाधान नहीं निकला, तो यह गतिरोध न केवल एनसीआर बेल्ट में बड़े पैमाने पर किसान आंदोलन का रूप ले सकता है, बल्कि इससे शासन और नीतिगत क्रियान्वयन पर जनता का भरोसा भी डगमगाएगा।

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