वर्ष 2013 के चर्चित यौन उत्पीड़न प्रकरण में सजा काट रहे तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को त्योहार के अवसर पर जेल से बाहर लाने की कानूनी कोशिश शीर्ष अदालत में जोरदार बहस का कारण बन गई. अदालत में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और राज्य प्रशासन की नुमाइंदगी कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच अस्थायी राहत को लेकर कड़ा टकराव देखने को मिला. पीठ के समक्ष जब मामले को आगे बढ़ाने की अर्जी रखी गई, तब बचाव पक्ष ने तारीख पर सहमति जताने के साथ ही पर्व के मौके पर रिहाई का सवाल उठा दिया, जिस पर राज्य के वकील ने तीव्र आपत्ति दर्ज कराई. दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के उपरांत अदालत ने अगली सुनवाई 5 नवंबर के लिए तय कर दी.
त्योहार के अवसर पर रिहाई की मांग और अदालत में टकराव
सुनवाई के दौरान जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अतिरिक्त समय दिए जाने का अनुरोध किया, तो वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत की तारीख टालने पर कोई व्यवधान नहीं डाला. इसके बदले उन्होंने तुरंत अपनी बात रखते हुए कहा कि अगर दूसरा पक्ष समय चाहता है तो बेशक ले, किंतु तेजपाल को इस पर्व पर अपने घर आने का अवसर मिलना चाहिए. इस पर विरोध जताते हुए तुषार मेहता ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता वर्तमान में अदालत द्वारा मुजरिम ठहराए जा चुके हैं, ऐसे में उन्हें बीच में मुक्त करना वैधानिक रूप से उचित नहीं होगा. अभियोजन के इस रुख पर पलटवार करते हुए वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि निचली अदालत का पूर्व आदेश बरी करने का था, जिसे बाद में पलट दिया गया, इसलिए अंतरिम रियायत दी जानी चाहिए.
बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश और निचली अदालत का फैसला
इस पूरे मामले की जड़ें नवंबर 2013 में गोवा स्थित एक आलीशान होटल की लिफ्ट में हुई घटना से जुड़ी हैं, जहां तरुण तेजपाल पर अपनी कनिष्ठ सहयोगी के साथ यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगा था. सत्र अदालत ने मई 2021 में अपना निर्णय सुनाते हुए तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था. हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया और मामले को गंभीर मानते हुए तेजपाल को 10 वर्ष के सश्रम कारावास की कड़ी सजा सुना दी. हाईकोर्ट के इस आदेश के पश्चात तेजपाल ने सितंबर महीने में आत्मसमर्पण कर दिया था, जिसके बाद से वे उत्तरी गोवा स्थित कोलवाले केंद्रीय कारागार में अपनी निर्धारित सजा काट रहे हैं.
सजा बढ़ाने और निरस्त करने को लेकर आमने-सामने दोनों पक्ष
शीर्ष अदालत में न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले की खंडपीठ इस संवेदनशील कानूनी विवाद की समीक्षा कर रही है. राज्य सरकार ने तेजपाल को किसी भी प्रकार की फौरी रियायत दिए जाने का जोरदार विरोध किया है, क्योंकि उनका स्पष्ट कहना है कि गंभीर अपराध में दस वर्ष के कारावास का दंड पा चुके व्यक्ति को उत्सव के आधार पर छूट नहीं दी जा सकती. वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दोनों पक्षों की अलग-अलग याचिकाएं लंबित हैं. एक तरफ जहां राज्य सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा दी गई 10 वर्ष की जेल की अवधि को बढ़ाकर आजीवन कारावास में तब्दील करने की अपील की है, वहीं दूसरी तरफ तरुण तेजपाल ने अपनी दोषसिद्धि और कारावास के संपूर्ण आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत से न्याय की गुहार लगाई है.



















