चुनावी प्रक्रियाओं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लेकर विपक्षी दलों के तेवर बेहद आक्रामक हो चुके हैं, लेकिन इस बीच प्रधान न्यायाधीश के रुख ने पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव से जुड़े गंभीर मुद्दों पर भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत से मिलने का वक्त मांगा था। हालांकि, प्रधान न्यायाधीश ने इस मुलाकात से इनकार कर दिया, क्योंकि इसी तरह के विवाद पहले से ही शीर्ष अदालत में विचाराधीन हैं। इस घटनाक्रम के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर संवैधानिक सीमाओं को लांघने का आरोप लगाते हुए तीखा हमला बोला।
संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा पर भाजपा का वार
भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायपालिका को हर दिन के राजनीतिक विवादों से पूरी तरह अलग रहना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेता सत्ता पाने की बेचैनी में संवैधानिक कानूनों और अपनी राजनीतिक नौटंकी के बीच का फर्क भूल चुके हैं। भाटिया के अनुसार, प्रधान न्यायाधीश द्वारा विपक्षी नेताओं से मिलने से साफ मना करना एक बड़ा संदेश देता है कि अदालतों को सियासी खींचतान का अखाड़ा नहीं बनाया जा सकता।
संविधान की प्रति को लेकर चल रही राजनीति पर प्रहार करते हुए भाजपा प्रवक्ता ने कहा, “इसे पढ़िए, इसका सम्मान कीजिए और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को समझिए।” उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल संविधान को साथ लेकर चलने भर से कोई उसके प्रावधानों का मर्म नहीं समझ जाता। संविधान देश के शासन तंत्र का पथप्रदर्शक दस्तावेज है, न कि राजनीतिक तमाशा खड़ा करने का कोई औजार।
विपक्ष की चार सूत्री मांगें और सुप्रीम कोर्ट तक मार्च का ऐलान
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने विरोध प्रदर्शन को लगातार धार दे रहे हैं। इसी रणनीति के तहत विपक्षी दलों ने 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक पैदल मार्च निकालने की तैयारी की है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने बाकायदा पत्र लिखकर सोमवार शाम चार से पांच बजे के बीच प्रधान न्यायाधीश से मिलने का समय मांगा था।
विपक्षी दल प्रधान न्यायाधीश को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपना चाहते थे। इस ज्ञापन में चुनाव में कथित वोट चोरी पर रोक लगाने, मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को तुरंत रोकने और आगामी चुनावों में पुरानी मतपत्र प्रणाली को फिर से लागू करने जैसी प्रमुख मांगें शामिल थीं। अदालत ने ऐसे मामलों के पहले से विचाराधीन होने के आधार पर इस मुलाकात को मंजूरी नहीं दी।






















