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राजस्थान के जालोर में 750 साल पुराना ठाकुरद्वारा मंदिर, जहां भगवान राधा-कृष्ण को साक्षी मानकर होता है सामाजिक न्यायराजस्थान
4 सित॰ 2026, 12:35 pm (21 दिन पहले)· 3

राजस्थान के जालोर में 750 साल पुराना ठाकुरद्वारा मंदिर, जहां भगवान राधा-कृष्ण को साक्षी मानकर होता है सामाजिक न्याय

जालोर के ऐतिहासिक राधा-कृष्ण ठाकुरद्वारा मंदिर में पिछले 750 वर्षों से माली समाज की पंचायत बैठती है, जहां आपसी विवादों के समाधान के साथ-साथ समाज सुधार के बड़े निर्णय लिए जाते हैं।

राजस्थान के जालोर शहर स्थित बड़ी पोल क्षेत्र का ऐतिहासिक राधा-कृष्ण मंदिर केवल धार्मिक आस्था और देव-पूजा तक सीमित नहीं है। लगभग 750 वर्षों पुराना यह पवित्र धाम माली समाज के लिए सामाजिक एकजुटता, सांस्कृतिक परंपरा और न्याय व्यवस्था का एक मजबूत केंद्र बना हुआ है। स्थानीय लोग और श्रद्धालु इस प्राचीन मंदिर को बेहद आदर के साथ 'ठाकुरद्वारा' कहकर पुकारते हैं। सदियों से यह स्थान समाज में एकता बनाए रखने, कुरीतियों को समाप्त करने और आपसी मतभेदों को सुलझाने का एक मुख्य जरिया रहा है।

राधा-कृष्ण की प्रतिमा के समक्ष सामाजिक न्याय की अनूठी परंपरा

ठाकुरद्वारा मंदिर परिसर में माली समाज की पांच पट्टी की पंचायत आयोजित करने की बेहद मजबूत और पुरानी परंपरा है। जब भी समाज के किसी परिवार में संपत्ति विवाद, जमीन-जायदाद के मामले, पारिवारिक मनमुटाव या अन्य कोई सामाजिक मुद्दा सामने आता है, तो समाज के पंच और सम्मानित वरिष्ठ नागरिक इस मंदिर में एकत्रित होते हैं। यहाँ न्याय प्रणाली का तरीका आम ग्रामीण या प्रशासनिक पंचायतों से काफी अलग और दिव्य माना जाता है।

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इस पंचायत में फैसला सुनाते समय पंच किसी मानवीय पद, व्यक्तिगत प्रभाव या सामाजिक दबाव के आधार पर निर्णय नहीं लेते। इसके बजाय मंदिर के गर्भगृह में विराजमान भगवान राधा-कृष्ण की दिव्य प्रतिमा को मुख्य साक्षी माना जाता है। पंच दोनों पक्षों की दलीलों और बातों को पूरी निष्ठा व ध्यान से सुनते हैं। इसके बाद भगवान के श्रीचरणों के सामने निष्पक्ष और पारदर्शी निर्णय सुनाया जाता है। ईश्वर को साक्षी मानकर दिए गए इस फैसले को समाज का हर व्यक्ति पूरी श्रद्धा और आदर के साथ स्वीकार करता है।

स्थापत्य कला और उत्सवों की अनूठी छटा

वास्तुकला और निर्माण शैली की दृष्टि से भी ठाकुरद्वारा मंदिर अत्यंत भव्य और दर्शनीय है। मंदिर की मोटी व मजबूत दीवारें तथा पारंपरिक स्थापत्य शैली प्राचीन भारतीय शिल्प कला की समृद्ध झलक प्रस्तुत करती हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जैसे पावन अवसरों पर जब इस मंदिर को दुल्हन की तरह सजाया जाता है, तो पूरा परिसर भक्ति और उल्लास के रंग में डूब जाता है। मंदिर समिति के अध्यक्ष भोमाराम का कहना है कि 750 साल पुरानी यह न्याय परंपरा आज भी उसी निष्ठा और पवित्रता के साथ जारी है, जो संपूर्ण समाज को भाईचारे के सूत्र में पिरोकर रखती है।

वर्ष 2018 में लिया गया ऐतिहासिक समाज सुधार का संकल्प

ठाकुरद्वारा मंदिर केवल विवादों के निपटारे का केंद्र ही नहीं है, बल्कि इसने सामाजिक कुरीतियों को मिटाने में भी क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। वर्ष 2018 में इस मंदिर परिसर में माली समाज की एक ऐतिहासिक महापंचायत बुलाई गई थी। इस बैठक में समाज के बुजुर्गों, पंचों और युवाओं ने सर्वसम्मति से कई दूरगामी और प्रगतिशील फैसले लिए।

इस महापंचायत के दौरान समाज में लंबे समय से चली आ रही मृत्युभोज जैसी कुप्रथा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके अलावा, विवाह समारोहों में होने वाले भारी-भरकम फिजूलखर्च, डीजे बजाने और स्टेज कार्यक्रमों पर भी रोक लगाने का फैसला किया गया। इस प्रकार 750 वर्षों की समृद्ध विरासत समेटे यह मंदिर आज भी समाज के लिए प्रेरणा का एक पावन स्रोत और न्याय का निष्पक्ष दरबार बना हुआ है।

सवाल-जवाब

जालोर का ठाकुरद्वारा मंदिर कितना पुराना है?
जालोर की बड़ी पोल में स्थित यह ठाकुरद्वारा मंदिर लगभग 750 वर्ष पुराना है।
ठाकुरद्वारा मंदिर किस समाज का मुख्य केंद्र है?
यह मंदिर माली समाज की आस्था, सामाजिक एकजुटता और पांच पट्टी की पंचायत का मुख्य केंद्र है।
मंदिर में निर्णय किस प्रक्रिया के तहत सुनाया जाता है?
यहाँ पंच किसी पद या व्यक्ति को नहीं, बल्कि गर्भगृह में स्थापित भगवान राधा-कृष्ण की प्रतिमा को साक्षी मानकर निष्पक्ष फैसला सुनाते हैं।
वर्ष 2018 की महापंचायत में क्या मुख्य सामाजिक सुधार किए गए थे?
2018 की महापंचायत में मृत्युभोज पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया और शादियों में फिजूलखर्ची, डीजे व स्टेज प्रोग्राम पर रोक लगाई गई।
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