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राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों से पहले तेज हुई राजनीतिक जंग, अशोक गहलोत और गोविंद सिंह डोटासरा ने लगाए संगीन आरोपराजस्थान
18 सित॰ 2026, 6:44 pm (7 दिन पहले)· 5

राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों से पहले तेज हुई राजनीतिक जंग, अशोक गहलोत और गोविंद सिंह डोटासरा ने लगाए संगीन आरोप

राजस्थान में 309 नगर निकायों के प्रमुखों के चुनाव से पहले सियासी घमासान तेज हो गया है, जहां कांग्रेस ने बीजेपी पर पार्षदों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया है तो वहीं बीजेपी ने इन दावों को सिरे से खारिज किया है।

राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर सियासी पारा अपने चरम पर पहुंच गया है। राज्य के 309 नगर निकायों के अध्यक्षों के चुनाव 21 सितंबर को होने हैं, लेकिन मतदान से पहले ही प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल तेज हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां स्थानीय निकायों पर अपना कब्जा जमाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही हैं। इस चुनावी मुकाबले के बीच पार्षदों की बाड़ेबंदी, खरीद-फरोख्त के संगीन आरोप और पुलिस की कानूनी कार्रवाईयों ने इस पूरे मामले को एक बड़ा राजनीतिक विवाद बना दिया है। दोनों ही दल एक-दूसरे पर लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखने का आरोप लगा रहे हैं।

पार्षदों की खरीद-फरोख्त और दबाव के गंभीर आरोप

कांग्रेस पार्टी ने सत्तारूढ़ बीजेपी पर पार्षदों को प्रलोभन देने और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने के बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का दावा है कि उनके पार्षदों को पाला बदलने के लिए 2-2 करोड़ रुपये तक के भारी-भरकम ऑफर दिए जा रहे हैं। विपक्ष का यह भी आरोप है कि पुलिस प्रशासन का इस्तेमाल कर कांग्रेस और निर्दलीय पार्षदों को डराया-धमकाया जा रहा है ताकि वे दबाव में आकर वोट करें। दूसरी तरफ, बीजेपी ने कांग्रेस के इन आरोपों को पूरी तरह से मनगढ़ंत बताया है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस अपनी अंदरूनी कलह और संभावित हार को देखते हुए पहले से ही बहाने तलाश रही है।

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नागौर के रिजॉर्ट में आधी रात को पुलिस की दबिश और हंगामा

इस सियासी जंग का सबसे बड़ा ड्रामा नागौर जिले के कुचेरा में देखने को मिला, जहां कांग्रेस पार्षदों की बाड़ेबंदी वाले एक रिजॉर्ट में पुलिस टीम जांच के लिए जा पहुंची। पुलिस के इस कदम से मौके पर हड़कंप मच गया और कांग्रेस के अध्यक्ष पद के दावेदार तेजपाल मिर्धा व पुलिस अधिकारियों के बीच तीखी बहस हो गई।

दरअसल, पुलिस की यह कार्रवाई कांग्रेस पार्षद लिंबाराम के साले महेंद्र द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत के बाद हुई थी। महेंद्र ने पुलिस में शिकायत दी थी कि लिंबाराम और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया है और उन पर दबाव बनाकर जबरन वोट डलवाने की साजिश रची जा रही है। इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पुलिस रिजॉर्ट पहुंची थी। हालांकि, स्थिति तब और बदल गई जब कांग्रेस ने लिंबाराम का एक वीडियो जारी कर दिया। इस वीडियो संदेश में लिंबाराम ने स्पष्ट किया कि वह पूरी तरह सुरक्षित हैं और अपनी मर्जी से रिजॉर्ट में रुके हुए हैं।

कांग्रेस नेतृत्व के तीखे हमले और अशोक गहलोत के आरोप

कुचेरा की इस घटना के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने सरकार और पुलिस प्रशासन को आड़े हाथों लिया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट लिखकर कई गंभीर आरोप लगाए। डोटासरा का दावा था कि इससे पहले कांग्रेस के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार तेजपाल मिर्धा की गाड़ी को जानबूझकर टक्कर मारने की कोशिश की गई थी। इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री शकुंतला रावत की एक चैट का स्क्रीनशॉट भी साझा किया, जिसमें उन्होंने पुलिस द्वारा पीछा किए जाने की बात कही थी।

इस मामले में राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी मोर्चा संभाला और सीधे तौर पर बीजेपी पर निशाना साधा। गहलोत ने आरोप लगाया कि बीजेपी अपने बोर्ड बनाने के लिए सरकारी अधिकारियों, विशेषकर जिला कलेक्टरों पर अनुचित दबाव बना रही है। उन्होंने कहा कि पार्षदों को खरीदने के लिए 2-2 करोड़ रुपये के लालच दिए जा रहे हैं ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित किया जा सके।

बीजेपी का पलटवार और कांग्रेस की गुटबाजी पर सवाल

बीजेपी के वरिष्ठ नेता अरुण चतुर्वेदी ने कांग्रेस के इन सभी आरोपों का मजबूती से खंडन किया। चतुर्वेदी ने कहा कि खरीद-फरोख्त के सारे आरोप झूठे हैं और कांग्रेस अपनी कमजोरियों को छिपाने की कोशिश कर रही है। उनका दावा है कि कई कांग्रेस और निर्दलीय पार्षद अपने क्षेत्रों में विकास कार्य करवाने की मंशा से खुद आगे आकर बीजेपी के बोर्ड का समर्थन करना चाहते हैं।

चतुर्वेदी ने कुचेरा रिजॉर्ट में पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि कानून अपना काम कर रहा था। उन्होंने तर्क दिया कि जब किसी जनप्रतिनिधि के परिवार का सदस्य उनके लापता या अपहृत होने की शिकायत दर्ज कराता है, तो पुलिस का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह मामले की जांच करे। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर पुलिस शिकायत के आधार पर जांच के लिए गई थी, तो कांग्रेस नेताओं को इससे क्या परेशानी थी? इसके अलावा, बीजेपी नेता ने पूर्व मुख्यमंत्री पर तीखा हमला बोलते हुए पूछा कि क्या अशोक गहलोत के कार्यकाल के दौरान हुए पिछले निकाय चुनाव भी पुलिस के दम पर ही जीते गए थे? उन्होंने कहा कि कांग्रेस में चल रही आपसी गुटबाजी के कारण ही उनके पार्षद उनका साथ छोड़ रहे हैं।

21 सितंबर को होने वाले चुनाव पर टिकीं नजरें

इस भारी घमासान के बीच भी बीजेपी कई जगहों पर बढ़त बनाने में सफल रही है। प्रदेश के कुल 309 नगर निकायों में से 25 निकायों में बीजेपी निर्विरोध अपना बोर्ड बनाने में कामयाब हो चुकी है। इसमें भरतपुर नगर निगम भी शामिल है, जो काफी चर्चा में रहा। भरतपुर में निर्दलीय पार्षदों की संख्या कांग्रेस और बीजेपी दोनों से अधिक थी, लेकिन बीजेपी रणनीति के तहत निर्दलीय उम्मीदवार को अपना नामांकन वापस लेने के लिए मनाने में सफल रही, जिससे वहां उसकी राह आसान हो गई।

अब सभी राजनीतिक विश्लेषकों और जनता की निगाहें 21 सितंबर को होने वाले मतदान पर टिकी हैं। इसी दिन राजस्थान के सभी शेष नगर निकायों के अध्यक्षों का चुनाव होगा, जिससे यह साफ हो जाएगा कि इस बाड़ेबंदी और सियासी खींचतान के खेल में अंततः किस पार्टी का पलड़ा भारी रहता है और किसे सबसे अधिक पार्षदों का समर्थन हासिल होता है।

सवाल-जवाब

राजस्थान में नगर निकायों के अध्यक्षों का चुनाव कब होगा?
नगर निकायों के अध्यक्षों के चुनाव 21 सितंबर को आयोजित किए जाएंगे।
कुल कितने नगर निकायों के प्रमुखों के लिए यह चुनाव हो रहे हैं?
राज्य के कुल 309 नगर निकायों के प्रमुखों (अध्यक्षों) के लिए यह चुनाव कराए जा रहे हैं।
कांग्रेस ने बीजेपी पर क्या गंभीर आरोप लगाए हैं?
कांग्रेस ने बीजेपी पर पार्षदों को 2-2 करोड़ रुपये में खरीदने की कोशिश करने और पुलिस के जरिए उन्हें डराने-धमकाने के आरोप लगाए हैं।
नागौर के कुचेरा स्थित रिजॉर्ट में पुलिस क्यों पहुंची थी?
कांग्रेस पार्षद लिंबाराम के साले महेंद्र ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि लिंबाराम और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया गया है, जिसके बाद पुलिस वहां जांच के लिए पहुंची थी।
अपहरण के आरोपों पर पार्षद लिंबाराम ने क्या प्रतिक्रिया दी?
लिंबाराम ने एक वीडियो जारी कर स्पष्ट किया कि वह पूरी तरह सुरक्षित हैं और अपनी मर्जी से रिजॉर्ट में रह रहे हैं।
बीजेपी अब तक कितने नगर निकायों में निर्विरोध अपना बोर्ड बना चुकी है?
बीजेपी 309 में से 25 नगर निकायों में निर्विरोध अपना बोर्ड बनाने में सफल रही है, जिसमें भरतपुर भी शामिल है।
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टिप्पणियाँ 5

Nyra Kaif@nyra-kaif·6 दिन पहले

राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में जिस तरह रिजॉर्ट्स की बाड़ेबंदी और अपहरण जैसी हाई-वोल्टेज ड्रामेबाजी सामने आ रही है, वह भारतीय राजनीति में लगातार गिरते भरोसे और चुनावी दबाव की संस्कृति को उजागर करती है। जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया महज हॉर्स-ट्रेडिंग और पुलिस थानों के चक्कर काटने तक सीमित हो जाती है, तो जमीनी स्तर के विकास के असल मुद्दे कहीं पीछे छूट जाते हैं। आने वाले समय में जनता का इस उठापटक से मोहभंग होना तय है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·6 दिन पहले

राजस्थान के इन स्थानीय चुनावों में जिस तरह बाड़ेबंदी और पुलिस दखल की तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे जमीनी स्तर पर भी दलीय राजनीति के बढ़ते ध्रुवीकरण को दर्शाती हैं। 309 नगर निकायों के इन परिणामों का सीधा असर आगामी राजनीतिक समीकरणों और प्रशासनिक पकड़ पर पड़ेगा, जहाँ दोनों दल हर कीमत पर जीत दर्ज करने की जुगत में हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

स्थानीय निकाय चुनाव में पुलिस और प्रशासन की यह प्रत्यक्ष दखलंदाजी और अपहरण के मामलों का सामने आना कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति को दर्शाता है। यदि नागौर जैसी घटनाओं में चुनावी बाड़ेबंदी के बीच पुलिस कार्रवाई और वीडियो के जरिए खंडन का यह दौर थमा नहीं, तो यह प्रशासनिक और राजनीतिक तनाव आने वाले समय में राज्य की जमीनी कानून-व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·6 दिन पहले

राजस्थान के इन स्थानीय चुनावों में जिस तरह प्रशासनिक मशीनरी और बाड़ेबंदी के बीच टकराव की स्थिति बनी है, उसका सीधा असर राज्य के कारोबारी माहौल और निवेशक भरोसे पर पड़ सकता है। जमीनी स्तर पर इस तरह की राजनीतिक अस्थिरता और पुलिस-प्रशासनिक विवाद से कॉर्पोरेट और निवेशकों के बीच अनिश्चितता का संदेश जाता है, जो अंततः क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों और स्थानीय विकास परियोजनाओं की गति को प्रभावित कर सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·6 दिन पहले

राजस्थान के इन स्थानीय चुनावों में जिस तरह रिजॉर्ट पॉलिटिक्स और पुलिस की दखलंदाजी सामने आई है, वह इस बात का संकेत है कि जमीनी सत्ता हासिल करने के लिए राजनीतिक दल किस हद तक जा सकते हैं। इस तरह के घटनाक्रम से प्रशासनिक मशीनरी की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं, और आने वाले समय में यह प्रवृत्ति राज्य के अन्य क्षेत्रीय और विधानसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों के बीच और अधिक टकराव का कारण बन सकती है।

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