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राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजों के बाद पार्षदों की बाड़ेबंदी पर संग्राम, खैरथल में अपहरण का आरोप तो करौली में बदला बयानराजस्थान
17 सित॰ 2026, 11:41 pm (7 दिन पहले)· 2

राजस्थान निकाय चुनाव के नतीजों के बाद पार्षदों की बाड़ेबंदी पर संग्राम, खैरथल में अपहरण का आरोप तो करौली में बदला बयान

राजस्थान में नगर निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद पार्षदों की बाड़ेबंदी को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। खैरथल में कांग्रेस पार्षद के अपहरण का आरोप लगा है, जबकि करौली में एफआईआर के बाद पार्षद ने वीडियो जारी कर खुद के मर्जी से जाने की बात कही है।

राजस्थान में हाल ही में संपन्न हुए नगर निकाय चुनाव के परिणाम सामने आने के बाद अब बोर्ड गठन को लेकर सियासी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। राज्य के विभिन्न निकायों में मेयर, सभापति और अध्यक्ष की कुर्सियों पर कब्जा जमाने के लिए दलों द्वारा पार्षदों की बाड़ेबंदी और गोलबंदी का दौर शुरू हो चुका है। इस प्रक्रिया के बीच प्रदेश के कई हिस्सों से पार्षदों के लापता होने और उनके जबरन अपहरण के गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं, जिससे राजनीतिक पारा काफी हाई हो गया है। ताजा मामले खैरथल और करौली जिलों से सामने आए हैं, जहां पार्षदों को अपने पाले में रखने की होड़ के बीच पुलिस थानों तक शिकायतें पहुंच गई हैं और बयानों के पलटने से मामला उलझ गया है।

खैरथल में वार्ड बीस के पार्षद के अपहरण का गंभीर आरोप

खैरथल नगर परिषद के वार्ड नंबर बीस से कांग्रेस के टिकट पर जीतकर आए निर्वाचित पार्षद भगवान दास के संदर्भ में सनसनीखेज मामला सामने आया है। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद जब भगवान दास अपने घर की तरफ लौट रहे थे, तभी रास्ते में कथित तौर पर उन्हें जबरन एक गाड़ी में अगवा कर लिए जाने की बात कही गई है। इस घटना को लेकर पार्षद के बेटे नितिन कुमार ने खैरथल थाने में आधिकारिक रूप से अपनी शिकायत दर्ज कराई है। परिवार की ओर से दी गई इस लिखित शिकायत में ओमप्रकाश रोघा, गिरीश डाटा और अन्य अज्ञात व्यक्तियों पर भगवान दास को बलपूर्वक उठाकर ले जाने का सीधा आरोप लगाया गया है। घटना के बाद से ही परिवार के सदस्यों ने अपने स्तर पर उनकी काफी तलाश की, लेकिन उनका कोई सुराग नहीं लग सका।

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थाने पहुंचे भाजपा नेता और परिवार के लोग

पार्षद के गायब होने और अपहरण की खबर फैलते ही स्थानीय राजनीति में भूचाल आ गया। बड़ी संख्या में लोग और परिजन भगवान दास की बरामदगी की मांग को लेकर खैरथल थाने पहुंच गए। थाने पहुंचने वालों में भाजपा के पूर्व विधायक रामहेत सिंह यादव, भाजपा जिला अध्यक्ष महा सिंह चौधरी और प्रभारी बलवान सिंह यादव जैसे कई प्रमुख चेहरे शामिल थे। सभी ने पीड़ित परिवार के साथ खड़े होकर पुलिस प्रशासन पर शीघ्र कार्रवाई करने का दबाव बनाया। थाने में मौजूद लोगों ने ओमप्रकाश रोघा और उनके परिवार पर इलाके में डर और खौफ का माहौल पैदा करने तथा डरा-धमकाकर वोट हासिल करने के गंभीर आरोप भी लगाए। हालांकि ये तमाम आरोप फिलहाल शिकायत दर्ज कराने वाले पक्ष की तरफ से लगाए गए हैं। पुलिस का कहना है कि जब तक इस पूरे मामले की गहनता से तकनीकी और मैदानी जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक इन आरोपों की सच्चाई पर मुहर नहीं लगाई जा सकती। परिवार ने पुलिस के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि भगवान दास को सकुशल बरामद किया जाए और इस कृत्य में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कदम उठाए जाएं। यह शिकायत खैरथल थाना अधिकारी और डीएसपी लाल सिंह यादव को सौंपी गई है, जिसके आधार पर पुलिस विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए तफ्तीश कर रही है। राजस्थान पुलिस के आधिकारिक पोर्टल पर भी खैरथल नगर परिषद के इस वार्ड से जुड़े पार्षद की जानकारी उपलब्ध है, हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि ऑनलाइन उपलब्ध वह पुराना डेटा इस वर्तमान आपराधिक घटनाक्रम से सीधे तौर पर जुड़ा है या नहीं।

करौली नगर परिषद में भी एफआईआर और नया मोड़

खैरथल के अलावा करौली नगर परिषद में भी पार्षदों की बाड़ेबंदी का खेल थाने तक जा पहुंचा। करौली में नवनिर्वाचित कांग्रेस पार्षद उस्मान खान के कथित अपहरण को लेकर पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई। यह मुकदमा हाजी रुखसार अहमद की तरफ से दर्ज कराया गया, जिन्होंने उस्मान खान को अपना छोटा भाई और नवनिर्वाचित पार्षद बताया है। दर्ज कराई गई इस एफआईआर में पूर्व विधायक लाखन सिंह कटारिया समेत कुल तीन लोगों को नामजद किया गया है। इसके अलावा अमीनुद्दीन खान और वीर सिंह मीणा गढ़ी के खिलाफ भी इस मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू किए जाने की बात सामने आई है। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उस्मान खान को आगामी चुनावों में अपने पक्ष में मतदान कराने के लिए बलपूर्वक बंधक बनाकर रखा गया है। जैसे ही यह मामला पुलिस के संज्ञान में आया, कोतवाली थाना पुलिस हरकत में आई और तुरंत कार्रवाई करते हुए पार्षद उस्मान खान को दस्तयाब कर लिया। पुलिस ने शुरुआती जानकारी में यह स्पष्ट किया कि नवनिर्वाचित पार्षद को तलाश कर सुरक्षित निकाल लिया गया है और आगे की कानूनी प्रक्रिया को तेजी से पूरा किया जा रहा है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और हैरान करने वाला मोड़ तब आया जब दस्तयाब किए जाने के तुरंत बाद पार्षद उस्मान खान खुद कैमरे के सामने आ गए और उन्होंने एक वीडियो जारी कर दिया। इस वीडियो संदेश में उन्होंने पुलिस में दर्ज कराई गई एफआईआर और अपने भाई द्वारा लगाए गए अपहरण के तमाम आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया और उन्हें पूरी तरह गलत बताया। उस्मान खान ने वीडियो में स्पष्ट किया कि वह किसी भी प्रकार के दबाव में नहीं हैं। उन्होंने खुद को कांग्रेस पार्टी का सच्चा प्रत्याशी बताते हुए दोहराया कि वह कांग्रेस के साथ ही हैं और आगे भी कांग्रेस के साथ ही बने रहेंगे। पार्षद ने यह भी दावा किया कि वह किसी के द्वारा अगवा नहीं किए गए थे, बल्कि अपनी मर्जी से ही अपनी यात्रा पर गए थे और अपनी इच्छा से ही वापस लौटे हैं। इसके साथ ही उन्होंने किसी भी खाली स्टांप पेपर या बैंक चेक पर जबरन हस्ताक्षर कराए जाने की बात से भी साफ इनकार कर दिया। इस तरह, जिस मामले की शुरुआत उनके अपने भाई की शिकायत पर अपहरण की गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज होने से हुई थी, उसी प्रकरण में खुद पार्षद के वीडियो बयान ने एक बिल्कुल अलग और उलट तस्वीर पेश कर दी है।

बाड़ेबंदी की राजनीति और भविष्य की पुलिस जांच

राजस्थान भर के स्थानीय निकायों में इस समय मेयर, सभापति और अध्यक्ष के महत्वपूर्ण पदों पर कब्जा करने के लिए पार्षदों की बाड़ेबंदी का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। राज्य के तमाम छोटे-बड़े राजनीतिक दल और उनके रणनीतिकार अपने-अपने पार्षदों को एकजुट रखने और टूटने से बचाने के लिए सुरक्षित ठिकानों पर शिफ्ट कर रहे हैं। इसके पीछे की मुख्य वजह बिल्कुल स्पष्ट है। जिन-जिन नगर निकायों में किसी भी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत या जादुई आंकड़ा नहीं मिल पाया है, वहां एक-एक निर्दलीय या बागी पार्षद का समर्थन भी सत्ता की पूरी गणित को रातों-रात बदल सकता है। इसी सियासी नूराकुश्ती के कारण चुनाव परिणाम आते ही पार्षदों को अपने पाले में करने के लिए जोड़-तोड़ और खींचतान बहुत ज्यादा बढ़ गई है। एक तरफ जहां पार्टियां अपने निर्वाचित पार्षदों की घेरेबंदी कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ कई बागी और निर्दलीय पार्षद अपने स्तर पर स्वतंत्र फैसले लेने के लिए अलग रास्ता चुन रहे हैं। खैरथल और करौली के दोनों प्रकरण इसी अस्थिर और तनावपूर्ण राजनीतिक माहौल की उपज हैं। हालांकि, इन दोनों ही मामलों में जमीनी हकीकत अभी धुंधली है क्योंकि खैरथल में जहां परिवार की लिखित शिकायत पर जबरन अपहरण का गंभीर आरोप लगाया गया है और पुलिस इस पर अनुसंधान कर रही है, वहीं करौली में एफआईआर के बाद पुलिस द्वारा दस्तयाब किए गए पार्षद ने खुद वीडियो जारी कर अपहरण के दावों को खारिज कर दिया है। आने वाले दिनों में पुलिस की विस्तृत जांच से ही यह साफ हो पाएगा कि इन दोनों ही स्थानों पर असल घटनाक्रम क्या था और पार्षदों को लेकर लगाए गए तमाम दावों और आरोपों में कितनी सच्चाई है। फिलहाल, निकाय चुनाव के फौरन बाद सामने आए इन दो बड़े वाक्यों ने राजस्थान की बाड़ेबंदी वाली सियासत को एक बार फिर से सुर्खियों के केंद्र में ला खड़ा कर दिया है।

सवाल-जवाब

राजस्थान के किन जिलों में पार्षदों को लेकर विवाद सामने आया है?
राजस्थान के खैरथल और करौली जिलों में नगर निकाय चुनाव के बाद पार्षदों को लेकर विवाद सामने आया है।
खैरथल में किस पार्षद के अपहरण का आरोप लगाया गया है?
खैरथल नगर परिषद के वार्ड नंबर 20 से कांग्रेस के निर्वाचित पार्षद भगवान दास के अपहरण का आरोप लगाया गया है।
करौली में किसके खिलाफ अपहरण की एफआईआर दर्ज कराई गई थी?
करौली में नवनिर्वाचित पार्षद उस्मान खान के अपहरण के मामले में पूर्व विधायक लाखन सिंह कटारिया सहित तीन लोगों को नामजद किया गया है।
करौली के पार्षद उस्मान खान ने वीडियो में क्या कहा?
पार्षद उस्मान खान ने वीडियो जारी कर अपहरण के आरोपों को गलत बताया और कहा कि वह अपनी मर्जी से गए थे और कांग्रेस के साथ हैं।
खैरथल में पार्षद के परिवार की ओर से शिकायत किसने दर्ज कराई?
खैरथल में पार्षद भगवान दास के बेटे नितिन कुमार ने थाने में अपहरण की शिकायत दर्ज कराई।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·7 दिन पहले

राजस्थान के निकाय चुनावों में पार्षदों की बाड़ेबंदी और अपहरण जैसी घटनाएं न केवल राजनीतिक अस्थिरता को दर्शाती हैं, बल्कि यह पर्यटन और आतिथ्य क्षेत्र के लिए भी चिंता का विषय है। जब राज्य में इस तरह का तनावपूर्ण माहौल और प्रशासनिक गहमागहमी फैलती है, तो यह वैश्विक मंच पर गंतव्य की सुरक्षित छवि को प्रभावित करता है। आने वाले समय में बोर्ड गठन की यह खींचतान स्थानीय कानून-व्यवस्था और राजनीतिक संस्कृति पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा सकती है।

Ravikash Gupta@ravikash·7 दिन पहले

राजस्थान के निकाय चुनावों के बाद बोर्ड गठन के लिए शुरू हुई यह बाड़ेबंदी और अपहरण के आरोप भारतीय राजनीति में लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण को दर्शाते हैं। इस तरह की दलबदल विरोधी और हॉर्स-ट्रेडिंग की संस्कृति न केवल चुनावी जनादेश का अपमान है, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर निवेशकों और कॉर्पोरेट जगत के बीच क्षेत्र की प्रशासनिक स्थिरता को लेकर एक नकारात्मक संदेश भी भेजती है, जिससे भविष्य में स्थानीय विकास कार्यों और आर्थिक नीतियों पर असर पड़ सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·7 दिन पहले

राजस्थान के इन स्थानीय चुनावों में जिस तरह से पार्षदों की बाड़ेबंदी और अपहरण के आरोप सामने आए हैं, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि निचले स्तर पर भी दलीय राजनीति किस हद तक अस्वस्थ हो चुकी है। यह प्रवृत्ति न केवल राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को कमजोर करती है, बल्कि प्रशासनिक मशीनरी पर भी अनावश्यक दबाव बनाती है। आने वाले समय में बोर्ड गठन की यह प्रक्रिया यदि ऐसी ही अराजकता से घिरी रही, तो यह स्थानीय शासन की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करेगी।

Rohan Verma@rohan-verma·7 दिन पहले

निकाय चुनावों के बाद बोर्ड गठन के लिए पार्षदों की बाड़ेबंदी और अपहरण या पाला बदलने के ऐसे मामले राजस्थान की दलीय राजनीति में पारदर्शिता पर बड़ा सवालिया निशान खड़े करते हैं। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है और आने वाले समय में प्रशासनिक स्थिरता के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों के बीच अविश्वास और टकराव को और अधिक बढ़ावा देगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·7 दिन पहले

यह आपराधिक प्रवृत्ति इस बात का प्रमाण है कि चुनावी जीत के बाद किस हद तक डराने-धमकाने और अपहरण के हथकंडे अपनाए जाते हैं। यदि भारतीय दंड संहिता और अपहरण से जुड़े कानूनों के तहत ऐसे मामलों में त्वरित और कठोर पुलिस कार्रवाई नहीं की गई, तो यह स्थिति स्थानीय निकायों में संगठित अपराधियों और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के गठजोड़ को और मजबूत करेगी, जिससे कानून-व्यवस्था गंभीर खतरे में पड़ जाएगी।

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