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राजस्थान निकाय चुनाव में बागियों और निर्दलीयों के आगे झुकीं राजनीतिक पार्टियां, मान मनुहार तेजराजस्थान
16 सित॰ 2026, 7:53 pm (9 दिन पहले)· 0

राजस्थान निकाय चुनाव में बागियों और निर्दलीयों के आगे झुकीं राजनीतिक पार्टियां, मान मनुहार तेज

राजस्थान में निकाय प्रमुख पदों के लिए सियासी खींचतान तेज हो गई है, जहां बीजेपी और कांग्रेस बागियों को मनाने और निर्दलीय पार्षदों को अपने पाले में लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं।

राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों की सरगर्मी अब अपने चरम पर पहुंच चुकी है। स्थानीय निकायों के मुखिया की कुर्सी हासिल करने के लिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। इस चुनावी रण में बागियों को शांत करने और निर्दलीय पार्षदों को अपने पाले में लाने के लिए दोनों दल अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। इस बार निकाय प्रमुख की कुर्सी हासिल करने की होड़ में दोनों पार्टियों के पार्षदों ने न केवल जमकर लॉबिंग की, बल्कि निर्दलीयों को रिझाने के लिए सारे पुराने रिकॉर्ड भी तोड़ दिए। निर्दलीय पार्षदों के पैर छूने से लेकर उनके परिवार के सदस्यों के जरिए दबाव बनाने और सामाजिक प्रभाव का इस्तेमाल करने जैसे हर हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।

पार्षदों के पाला बदलने का डर और सुरक्षात्मक कदम

चुनाव के इस नाजुक मोड़ पर दोनों ही प्रमुख दलों को अपने पार्षदों के टूटने और भीतरघात का गहरा डर सता रहा है। बगावत की इसी आशंका के चलते नामांकन प्रक्रिया के दौरान बेहद सतर्कता बरती गई। नामांकन दाखिल कराने के लिए प्रत्याशियों के साथ केवल उन्हीं चुनिंदा और अनुभवी नेताओं को भेजा गया, जो किसी भी तरह की संभावित गड़बड़ी को समय रहते संभाल सकें। हालांकि, आम सहमति बनाने के तमाम दावों के बावजूद कई जगहों पर पार्टी अनुशासन तार-तार होता दिखा। दौसा नगर परिषद में बीजेपी पार्षदों के बीच खुलकर बगावत देखने को मिली। वहीं, उदयपुर में भी दोपहर तक दो प्रमुख दावेदार अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे, जिससे पार्टी नेतृत्व की सांसें अटकी रहीं। काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार पारस सिंघवी के नाम पर सहमति बन सकी। इसके उलट, धौलपुर के बसेड़ी से बीजेपी के लिए राहत भरी खबर आई, जहां राघवेंद्र सिंह ने इकलौता नामांकन दाखिल किया, जिससे उनकी निर्विरोध जीत का रास्ता साफ हो गया है।

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बागियों को मनाने और समझौते की रणनीति

जिन निकायों में कोई आंतरिक विवाद या खींचतान नहीं थी, वहां दोनों ही बड़ी पार्टियों ने अपने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा बिना किसी देरी के कर दी। लेकिन जहां कलह की स्थिति बनी हुई है, वहां सस्पेंस अब भी बरकरार है। बागी उम्मीदवारों को मनाने और उन्हें चुनावी मैदान से पीछे हटने के लिए राजी करने का काम जारी है। नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख 18 नवंबर है, और तब तक रूठे हुए नेताओं को मनाने का यह दौर बेहद आक्रामक तरीके से चलेगा। इस चुनावी संकट को सुलझाने और बागी सुरों को दबाने के लिए दोनों ही दलों ने अपने सबसे कद्दावर और अनुभवी नेताओं को मैदान में उतार दिया है।

सीकर और खैरथल में दिलचस्प चुनावी समीकरण

बगावत के इस माहौल में राजनीतिक दलों को कई जगहों पर अपनी रणनीति में बड़े बदलाव करने पड़े हैं। सीकर जिले के फतेहपुर नगर परिषद में बीजेपी ने बड़ा दांव खेलते हुए एक निर्दलीय प्रत्याशी मंजू भिंडा को अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया है। वहीं, खैरथल में तो बीजेपी ने कांग्रेस को अब तक का सबसे बड़ा झटका दिया है। यहां कांग्रेस के सभापति पद के सबसे मजबूत दावेदार विक्रम चौधरी को बीजेपी अपने पाले में खींचने में सफल रही। मंगलवार रात को विक्रम चौधरी ने कांग्रेस के 11 अन्य पार्षदों के साथ मिलकर केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र सिंह यादव की मौजूदगी में बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली। इसके बाद आज विक्रम चौधरी ने बीजेपी नेताओं के साथ जाकर खैरथल निकाय प्रमुख पद के लिए अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया। भले ही अभी तक उन्हें पार्टी का आधिकारिक सिंबल नहीं मिला है, लेकिन बीजेपी खेमे में उनका नाम पूरी तरह फाइनल माना रहा है। इन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों को देखते हुए बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने ही अपने पार्षदों को एकजुट रखने और विरोधियों के खेमे में सेंध लगाने के लिए अपने दिग्गज नेताओं की पूरी फौज को झोंक दिया है।

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