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राजस्थान निकाय चुनाव: पाली नगर निगम में फंसी भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ की साखराजस्थान
4 सित॰ 2026, 4:59 pm (21 दिन पहले)· 3

राजस्थान निकाय चुनाव: पाली नगर निगम में फंसी भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ की साख

राजस्थान में निकाय चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं, जहां 65 वार्डों वाले पाली नगर निगम के चुनाव में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ की राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।

राजस्थान के भीतर निकाय चुनावों का पारा चढ़ चुका है और नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनावी तस्वीर पूरी तरह से साफ हो चुकी है। इस राजनीतिक हलचल के बीच सबसे ज्यादा चर्चा पाली नगर निगम की हो रही है, जहां कुल 65 वार्डों के लिए घमासान मचा हुआ है। इस बार महापौर का पद सामान्य महिला श्रेणी के लिए आरक्षित होने के कारण राजनीतिक दलों की रणनीति और समीकरण पूरी तरह से बदल गए हैं। हालांकि पाली को पारंपरिक रूप से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है, क्योंकि पिछले चुनावों में पार्टी ने यहाँ के सभी स्थानीय निकायों पर अपना बोर्ड बनाया था। इसके बावजूद, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस बार अपनी स्थिति को मजबूत करते हुए सत्ताधारी पार्टी के विजय रथ को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।

मदन राठौड़ का गृह जिला और राजनीतिक प्रतिष्ठा

इस चुनाव के केंद्र में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का गृह जिला होने के कारण पार्टी की साख दांव पर लगी हुई है। मदन राठौड़ का इस क्षेत्र से गहरा राजनीतिक जुड़ाव रहा है, क्योंकि वह पाली जिले में तीन बार जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं और सुमेरपुर विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक भी चुने जा चुके हैं। अपने गृह जिले में एक बार फिर कमल का फूल खिलाना और पार्टी का परचम लहराना उनकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है। पाली के स्थानीय निकाय इतिहास पर नजर डालें तो यहाँ अब तक अलग-अलग समय पर 20 सभापति और 23 प्रशासक नियुक्त किए जा चुके हैं। आजादी के समय यह क्षेत्र नगर पालिका हुआ करता था, जिसे बाद में क्रमिक रूप से नगर परिषद और अंततः 2024 में नगर निगम का दर्जा दिया गया। निगम बनने के बाद रेखा राकेश भाटी यहाँ की पहली महापौर बनी थीं।

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पाली निकाय का राजनीतिक इतिहास और सत्ता का उतार-चढ़ाव

पाली के राजनीतिक पटल पर समय-समय पर अलग-अलग दलों का वर्चस्व रहा है। वर्ष 1945 से लेकर 1992 तक पाली नगर पालिका पर मुख्य रूप से कांग्रेस पार्टी का दबदबा कायम रहा। इसके बाद दौर बदला और 1994 से 2004 के बीच भाजपा के टिकट पर ज्ञानचंद पारख और कुसुम सोनी ने नगर परिषद की कमान संभाली। फिर साल 2004 से 2014 के दशक में कांग्रेस पार्टी के प्रदीप हिंगड़ और केवल चंद्र गुलेचा सभापति के पद पर आसीन रहे। इसके बाद के वर्षों में, यानी 2014 से 2024 तक एक बार फिर सत्ता का पहिया घूमा और भाजपा के महेंद्र बोहरा तथा रेखा राकेश भाटी ने नगर परिषद की सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ली। पूरे प्रदेश के अन्य हिस्सों की तरह ही यहाँ भी 3 सितंबर को नाम वापसी की समय-सीमा समाप्त होने के बाद चुनावी मैदान की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो गई है, और दोनों प्रमुख दल अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं।

नामांकन रद्दीकरण और बागियों का बड़ा संकट

चुनावी समीकरणों के बीच दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों को बागियों के तेवरों से बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। नामांकन पत्रों की जाँच के दौरान तकनीकी कारणों से कांग्रेस पार्टी के 6 उम्मीदवारों और भारतीय जनता पार्टी के 1 उम्मीदवार का नामांकन रद्द कर दिया गया था। इस फेरबदल के बाद अब कांग्रेस मैदान में 59 सीटों पर और भाजपा 64 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कुल 65 वार्डों के इस निकाय चुनाव में विभिन्न दलों और निर्दलियों को मिलाकर कुल 244 उम्मीदवार चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। खास बात यह है कि इनमें से 118 उम्मीदवार पूरी तरह से निर्दलीय के रूप में ताल ठोक रहे हैं, जिससे दोनों पार्टियों का चुनावी गणित काफी हद तक बिगड़ गया है।

त्रिकोणीय मुकाबला और अन्य दलों की उपस्थिति

पाली नगर निगम के कुल 65 वार्डों में से कम से कम 20 वार्ड ऐसे हैं जहाँ दोनों ही दलों के बागी उम्मीदवारों ने अपनी ही पार्टियों के आधिकारिक प्रत्याशियों के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। इन वार्डों में त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है, जिससे भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेताओं की चिंताएँ काफी बढ़ी हुई हैं। इसके विपरीत, केवल 10 वार्ड ऐसे हैं जहाँ दोनों मुख्य दलों के बीच आमने-सामने की सीधी टक्कर होनी है, जबकि 22 वार्डों में महिला उम्मीदवारों के बीच कड़ा मुकाबला तय किया गया है। इसके अलावा, इन चुनावों में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर के अन्य दलों के प्रतिनिधि भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, जिनमें आरएलपी का एक प्रत्याशी, आम आदमी पार्टी का एक प्रत्याशी और बीएपी का एक प्रत्याशी शामिल है। चूँकि यह पूरा क्षेत्र सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का गृह क्षेत्र है, इसलिए पूरे प्रदेश की निगाहें पाली नगर निगम के चुनावी नतीजों पर टिकी हुई हैं।

सवाल-जवाब

पाली नगर निगम चुनाव में कुल कितने वार्डों के लिए मतदान होना है?
पाली नगर निगम में कुल 65 वार्डों के लिए चुनाव हो रहे हैं।
पाली नगर निगम का महापौर पद इस बार किसके लिए आरक्षित है?
इस बार पाली नगर निगम का महापौर पद सामान्य महिला श्रेणी के लिए आरक्षित किया गया है।
नामांकन की जाँच के दौरान किस पार्टी के कितने नामांकन रद्द हुए?
नामांकन जाँच के दौरान कांग्रेस के 6 उम्मीदवारों और भाजपा के 1 उम्मीदवार का नामांकन रद्द कर दिया गया था।
वर्तमान में कांग्रेस और भाजपा कितने-कितने वार्डों में चुनाव लड़ रही हैं?
कांग्रेस 59 वार्डों में और भाजपा 64 वार्डों में अपने प्रत्याशी मैदान में उतारकर चुनाव लड़ रही है।
पाली नगर निगम चुनाव में कुल कितने उम्मीदवार मैदान में हैं?
पाली नगर निगम के 65 वार्डों के लिए कुल 244 उम्मीदवार चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
इस चुनाव में कितने निर्दलीय प्रत्याशी ताल ठोक रहे हैं?
पाली नगर निगम चुनाव में कुल 118 निर्दलीय प्रत्याशी चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं।
कितने वार्डों में भाजपा और कांग्रेस दोनों को बगावत का सामना करना पड़ रहा है?
पाली निगम के 20 वार्डों में दोनों पार्टियों को बागी उम्मीदवारों की वजह से बगावत का सामना करना पड़ रहा है।
पाली नगर निगम में कुल कितने वार्डों में सीधी टक्कर है?
पाली नगर निगम के 10 वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के बीच आमने-सामने की सीधी टक्कर होगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·20 दिन पहले

पाली नगर निगम का यह मुकाबला केवल स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं है, बल्कि यह प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के राजनीतिक कौशल की सीधी अग्निपरीक्षा है। सामान्य महिला आरक्षित सीट और बागियों के बागी तेवरों के बीच, भाजपा के इस पारंपरिक गढ़ में आंतरिक कलह से निपटना और जीत सुनिश्चित करना पार्टी नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·20 दिन पहले

पाली नगर निगम चुनाव का यह परिदृश्य केवल राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर कानून-व्यवस्था और प्रशासन की पकड़ का भी लिटमस टेस्ट है। जैसे-जैसे 65 वार्डों में बागी तेवर और तकनीकी अड़चनें सामने आ रही हैं, ज़मीनी स्तर पर उम्मीदवारों की स्क्रूटनी और प्रशासनिक नियंत्रण पर पैनी नज़र रखनी होगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि सत्ताधारी दल इन आंतरिक असंतोषों और बगावत के बीच किस प्रकार चुनावी मैदान की व्यवस्था संभालता है।

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