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राजस्थान निकाय चुनाव से पहले पंजाब में भारी सियासी ड्रामा, पार्षदों की बाड़ेबंदी में घुसी पुलिसराजस्थान
19 सित॰ 2026, 10:27 am (6 दिन पहले)· 0

राजस्थान निकाय चुनाव से पहले पंजाब में भारी सियासी ड्रामा, पार्षदों की बाड़ेबंदी में घुसी पुलिस

संगरिया नगरपालिका अध्यक्ष चुनाव से पहले दो पार्षदों के कथित अपहरण की शिकायत पर पुलिस पंजाब की बाड़ेबंदी में पहुंची, जहां विधायक से तीखी बहस हुई। हालांकि पार्षदों ने खुद अपनी मर्जी से वहां मौजूद होने की बात कही है।

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की संगरिया नगरपालिका में अध्यक्ष पद के चुनाव से पहले सियासी सरगर्मियां चरम पर पहुंच गई हैं। अपने पार्षदों को एकजुट रखने के लिए कांग्रेस पार्टी द्वारा पंजाब में की गई बाड़ेबंदी के दौरान आधी रात को उस वक्त बड़ा बखेड़ा खड़ा हो गया, जब राजस्थान पुलिस अचानक वहां जा धमकी। दो स्थानीय पार्षदों के कथित अपहरण का मामला दर्ज होने के बाद संगरिया थाने की पुलिस टीम उनकी तलाश में अंतरराज्यीय सीमा लांघकर पंजाब के ठिकाने पर पहुंची थी। इस औचक कार्रवाई की जानकारी मिलते ही मौके पर मौजूद नेताओं में हड़कंप मच गया और देखते ही देखते राजनीतिक टकराव शुरू हो गया।

बाड़ेबंदी में पुलिस के पहुंचते ही गरमाया माहौल

दरअसल, संगरिया पुलिस को यह सूचना मिली थी कि अपहरण के दर्ज मुकदमे से जुड़े दो पार्षद, ओमप्रकाश स्वामी और साहिल स्वामी, पंजाब में कांग्रेस की बाड़ेबंदी में मौजूद हैं। जैसे ही पुलिस की टीम पंजाब स्थित उस परिसर में दाखिल हुई, वहां कांग्रेस विधायक अभिमन्यु पूनिया के साथ उनकी तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। विधायक ने पुलिस के इस तरह अचानक घुसने का कड़ा विरोध किया और दोनों पक्षों के बीच काफी देर तक गरमा-गरम बहस चलती रही। घटना के दौरान किसी ने इस पूरे विवाद का वीडियो रिकॉर्ड कर लिया, जो कुछ ही देर में सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। इस वीडियो के सामने आते ही राजस्थान और पंजाब के सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं।

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विधायक ने लगाया सरकारी तंत्र के दुरुपयोग का गंभीर आरोप

पंजाब में पुलिस अधिकारियों के साथ हुई तीखी बहस के दौरान संगरिया विधायक अभिमन्यु पूनिया ने भारतीय जनता पार्टी पर सरकारी मशीनरी का खुला दुरुपयोग करने का आरोप लगाया। विधायक का स्पष्ट कहना था कि चुनाव जीतने के लिए पार्षदों के खिलाफ मनगढ़ंत और झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस की इस कार्रवाई का असली मकसद पार्षदों को जबरन उठाना और उन पर अनुचित दबाव बनाना है। विधायक ने पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि पूरी कार्रवाई राजनीतिक दबाव के तहत की जा रही है। काफी देर तक चली इस तनातनी ने चुनावी माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया।

दोनों पार्षदों ने अपहरण के दावों को सिरे से नकारा

हंगामे के बीच पुलिस की जांच में उस वक्त बड़ा नाटकीय मोड़ आया जब कथित तौर पर अगवा बताए जा रहे दोनों पार्षदों ने अपहरण की बात को पूरी तरह खारिज कर दिया। संगरिया पुलिस ने मौके पर ही पार्षद ओमप्रकाश स्वामी और साहिल स्वामी के औपचारिक बयान दर्ज किए। दोनों पार्षदों ने पुलिस अधिकारियों को साफ-साफ बताया कि उनका किसी ने कोई अपहरण नहीं किया है, बल्कि वे अपनी स्वतंत्र इच्छा और मर्जी से बाड़ेबंदी में शामिल होने के लिए पंजाब आए हैं। इस बयान के बाद पुलिस टीम को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने शिकायत दर्ज कराने वालों और पुलिस कार्रवाई की मंशा पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

अध्यक्ष पद के चुनाव से पहले तेज हुआ आरोप-प्रत्यारोप का दौर

संगरिया नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव सिर पर होने की वजह से दोनों प्रमुख दल पार्षदों की संख्याबल को सुरक्षित रखने में पूरी ताकत झोंक रहे हैं। कांग्रेस द्वारा अपने खेमे के पार्षदों को पंजाब में सुरक्षित रखने की रणनीति के बीच अपहरण की शिकायत और फिर पुलिस का पंजाब पहुंचना इस चुनावी मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना चुका है। पुलिस टीम द्वारा दोनों पार्षदों के स्वेच्छा वाले बयान दर्ज करके संगरिया लौटने के बाद भी मामला शांत नहीं हुआ है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और पुलिस की भूमिका को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी है, जिससे आने वाले दिनों में सियासी पारा और चढ़ने के आसार हैं।

सवाल-जवाब

संगरिया पुलिस पंजाब क्यों पहुंची थी?
संगरिया पुलिस दो स्थानीय पार्षदों, ओमप्रकाश स्वामी और साहिल स्वामी, के अपहरण का मामला दर्ज होने के बाद उनकी तलाश में पंजाब पहुंची थी।
मौके पर विधायक और पुलिस के बीच किस बात को लेकर बहस हुई?
विधायक अभिमन्यु पूनिया ने आरोप लगाया कि पार्षदों पर झूठा मुकदमा दर्ज कर पुलिस के जरिए उन्हें उठाने की कोशिश की जा रही है और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग हो रहा है।
दोनों पार्षदों ने पुलिस को क्या बयान दिया?
पार्षद ओमप्रकाश स्वामी और साहिल स्वामी ने अपने अपहरण की बात से इनकार करते हुए पुलिस को बताया कि वे अपनी मर्जी से बाड़ेबंदी में आए हैं।
यह पूरा विवाद किस चुनाव से जुड़ा हुआ है?
यह विवाद राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की संगरिया नगरपालिका अध्यक्ष पद के लिए होने वाले चुनाव से जुड़ा हुआ है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Li Wei@li-wei·5 दिन पहले

यह घटना भारतीय राजनीति में दलबदल रोकने के लिए अपनाई जाने वाली बाड़ेबंदी की पुरानी संस्कृति और प्रशासनिक तंत्र के अंतर्संबंधों को उजागर करती है। स्थानीय चुनावों में इस तरह का अंतरराज्यीय पुलिस दखल और राजनीतिक टकराव लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर गंभीर सवाल खड़े करता है। भविष्य में इस प्रकार के प्रकरण चुनावी रणनीतियों और प्रशासनिक निष्पक्षता के बीच संघर्ष को और अधिक तीव्र कर सकते हैं, जिससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने की आशंका है।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

संगरिया नगरपालिका चुनाव से पहले हुआ यह घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय निकाय चुनावों में भी अब किस हद तक वित्तीय और राजनीतिक संसाधन झोंके जा रहे हैं। पार्षदों की बाड़ेबंदी और अंतरराज्यीय पुलिस कार्रवाई जैसी घटनाएं चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। इस तरह की जोड़-तोड़ और प्रशासनिक खींचतान से न केवल लोकतांत्रिक संस्थाओं की छवि धूमिल होती है, बल्कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस की तर्ज पर राजनीतिक दलों में बढ़ रही अस्थिरता और अविश्वास भी उजागर होता है। भविष्य में इस प्रकार के प्रकरणों से निवेशकों और बाजार में नीतिगत स्थिरता को लेकर अनिश्चितता का संदेश जा सकता है, जो स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों और विकास योजनाओं को भी प्रभावित कर सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

स्थानीय निकायों के चुनावों में इस तरह की अंतरराज्यीय पुलिस की दखलंदाजी और बाड़ेबंदी की संस्कृति भारतीय लोकतंत्र के संघीय ढांचे और प्रशासनिक तटस्थता दोनों के लिए एक गंभीर चुनौती है। जब स्थानीय जनप्रतिनिधियों को बचाने या फंसाने के लिए पुलिस बल का इस्तेमाल राजनीतिक अस्त्र के रूप में होने लगे, तो यह शासन प्रणाली की कमजोरी को दर्शाता है। आने वाले समय में इस प्रकार के हथकंडे चुनाव आयोग के लिए भी बड़ी चुनौती बनेंगे, क्योंकि यह प्रवृत्ति निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान के बुनियादी सिद्धांतों को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

यह घटना दिखाती है कि स्थानीय निकाय चुनावों में भी जोड़तोड़ और शक्ति प्रदर्शन किस हद तक पहुंच चुके हैं। अंतरराज्यीय पुलिस कार्रवाई और बाड़ेबंदी की इस संस्कृति से प्रशासनिक मशीनरी की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। भविष्य में ऐसी घटनाएं चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को और अधिक कमजोर कर सकती हैं, जिससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने की आशंका है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

निकाय चुनाव से पहले इस तरह की बाड़ेबंदी और पुलिस की अंतरराज्यीय दखलअंदाजी कानून-व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। जब कथित रूप से अगवा पार्षदों ने खुद अपनी मर्जी से वहां होने की बात कही है, तो यह स्पष्ट है कि पुलिस तंत्र का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा साधने के लिए हो रहा है। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रियाओं की आड़ में राजनीतिक दलों का टकराव प्रशासनिक निष्पक्षता को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर संकट खड़ा होता है।

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