आजादी के आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाला देश का पहला गांधी आश्रम आज उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में गुमनामी और बदहाली का सामना कर रहा है। रामपुर मनिहारान क्षेत्र के घाटहेड़ा गांव में स्थित यह ऐतिहासिक परिसर कभी स्वतंत्रता सेनानियों की शरणस्थली और अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त रणनीतियां बनाने का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। एक तरफ जहां सरकार देश भर की ऐतिहासिक इमारतों और धरोहरों को पर्यटन स्थलों के रूप में संवार रही है, वहीं स्वतंत्रता संग्राम की इस मजबूत नीव को संरक्षण न मिलने से यह धीरे-धीरे खंडहर में बदल रहा है।
स्वतंत्रता संग्राम की गुप्त बैठकों और आंदोलनों का प्रमुख गढ़
अंग्रेजी शासन के समय घाटहेड़ा का यह आश्रम देश की आजादी के दीवानों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना साबित हुआ था। देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमलापति त्रिपाठी जैसी महान शख्सियतें यहां समय-समय पर आकर आंदोलन की भावी रूपरेखा तय करती थीं। ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देने के लिए ऐतिहासिक मनानी रेलवे स्टेशन को आग के हवाले करने की पूरी साजिश इसी आश्रम की चारदीवारी के भीतर रची गई थी, जिसे बाद में क्रांतिकारियों ने सफलता से अंजाम दिया था। इसके अलावा आसपास के 32 गांवों के नागरिक और स्वतंत्रता सेनानी यहां नियमित रूप से एकत्र होकर स्वाधीनता संग्राम को गति देने के लिए विचार-विमर्श करते थे।
संयुक्त प्रांत के न्याय मंत्री ने की थी स्थापना
इतिहास के पन्नों के अनुसार सहारनपुर जिले का भारतीय स्वाधीनता संग्राम और महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए आंदोलनों में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। दिल्ली रोड पर रामपुर मनिहारान के पास बसे घाटहेड़ा गांव में क्रांतिकारियों की गतिविधियों को संगठित करने के उद्देश्य से अप्रैल 1939 में इस केंद्र की नींव रखी गई थी। संयुक्त प्रांत के तत्कालीन न्याय मंत्री कैलाश नाथ काटजू ने इस गांधी आश्रम की स्थापना की थी। 1943 में इसे देश के पहले गांधी आश्रम के रूप में पूर्ण पहचान मिली। जब भी जिले में अंग्रेजों के खिलाफ किसी गोपनीय बैठक या बड़े प्रदर्शन का आयोजन करना होता था, तो स्वतंत्रता सेनानी सबसे पहले घाटहेड़ा आश्रम को ही प्राथमिकता देते थे।
देश भर के कार्यकर्ताओं के लिए बना प्रशिक्षण केंद्र
घाटहेड़ा स्थित यह गांधी आश्रम सिर्फ रणनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने एक राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण संस्थान के रूप में भी कार्य किया। यहां युवाओं और कार्यकर्ताओं को राष्ट्र सेवा, चरखा चलाने, कुटीर उद्योग और गांधीवादी विचारों का गहन प्रशिक्षण दिया जाता था। इस केंद्र से प्रशिक्षित होकर निकलने वाले कर्मचारियों और सेवकों को देश भर में स्थापित होने वाले अन्य गांधी आश्रमों में नियुक्त किया जाता था। इस प्रकार सहारनपुर के इस छोटे से गांव ने पूरे देश में गांधीवादी नेटवर्क को मजबूत करने में मुख्य भूमिका निभाई थी।
अमृत काल में संरक्षण की बाट जोहती ऐतिहासिक धरोहर
स्थानीय साहित्यकार डॉ वीरेंद्र आज़म का कहना है कि सहारनपुर महात्मा गांधी के आंदोलनों की अग्रिम पंक्ति में रहा है। देश की आजादी के बाद से लेकर अब तक कई दशक बीत चुके हैं और राष्ट्र अमृत काल का उत्सव मना रहा है, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के इस साक्षी स्थल को वह सम्मान और संरक्षण नहीं मिल सका जिसका यह हकदार था। उचित रखरखाव न होने के कारण आश्रम का भवन अब जर्जर हो चुका है। स्थानीय निवासियों और इतिहासकारों की मांग है कि सरकार को इस ऐतिहासिक स्थल को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करते हुए इसका पुनरुद्धार करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां इस महान विरासत से प्रेरणा ले सकें।



















