भारत की स्वतंत्रता की तिथि 15 अगस्त 1947 तय हो चुकी थी और पूरे देश में ऐतिहासिक पल की तैयारियां चल रही थीं, लेकिन आजादी से ठीक 48 घंटे पहले 13 अगस्त का दिन देश के लिए शांति या सुकून लेकर नहीं आया। सीमा विभाजन की घोषणाओं, दंगों की आशंका और राजनीतिक खींचतान के बीच इस एक ही दिन कई ऐसी अभूतपूर्व घटनाएं घटीं जिन्होंने भारत के इतिहास और भूगोल को हमेशा के लिए प्रभावित कर दिया। कोलकाता के बेलियाघाट में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर उग्र भीड़ द्वारा पथराव किया गया, तो दूसरी तरफ कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में जवाहर लाल नेहरू के अड़ियल रुख के कारण भारत को नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस से हाथ धोना पड़ा। इसी रात लाहौर रेडियो स्टेशन से ऑल इंडिया रेडियो की पहचान खत्म हो गई और नए देश की आधिकारिक घोषणा की गई।
बेलियाघाट की हैदरी मंजिल पर हमला और महात्मा गांधी का शांत प्रतिरोध
13 अगस्त 1947 की दोपहर लगभग तीन बजे महात्मा गांधी कोलकाता के अशांत इलाके बेलियाघाट में स्थित हैदरी मंजिल पहुंचे थे। उनके साथ महादेव भाई, मनु और कुछ अन्य प्रमुख सहयोगी भी मौजूद थे। गांधी जी उस समय बंगाल में भड़के सांप्रदायिक तनाव को शांत करने और राहत कार्य देखने पहुंचे थे, लेकिन वहां पहुंचते ही उन्हें स्थानीय लोगों के तीव्र असंतोष का सामना करना पड़ा। हैदरी मंजिल के बाहर इकट्ठा हुए उग्र लोगों ने गांधी जी के खिलाफ तीखी नारेबाजी शुरू कर दी। भीड़ का रुख बेहद आक्रामक था और देखते ही देखते नारेबाजी के साथ-साथ मकान की तरफ कांच की बोतलें और पत्थर फेंके जाने लगे।
प्रशांत पोल द्वारा लिखित पुस्तक 'वे पंद्रह दिन' में इस पूरी घटना का विस्तृत विवरण दिया गया है। पुस्तक के अनुसार, जब बाहर पत्थरों और बोतलों की बौछार हो रही थी, तब भी महात्मा गांधी पूरी तरह अविचल और शांत रहे। हालात की गंभीरता को देखते हुए गांधी जी स्वयं भवन के बाहर आए और उन्होंने भीड़ की ओर हाथ हिलाकर लोगों से शांत रहने का विनम्र आग्रह किया। उनके इस साहसिक और शांत इशारे का भीड़ पर गहरा असर पड़ा और नारेबाजी अचानक थम गई। इसके बाद गांधी जी ने हमलावर रुख अपनाए खड़े लोगों को संबोधित करना शुरू किया, जिससे वहां का माहौल पूरी तरह बदल गया।
भीड़ को शांत करते हुए गांधी जी ने कहा, "यदि आप फिर से हिंसा और पागलपन की ओर लौटे, तो मैं इसका जीवित गवाह नहीं बनूंगा।" इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वे कोलकाता में हिंदुओं और मुसलमानों दोनों की समान भाव से सेवा करने आए हैं और स्वयं को पूरी तरह लोगों की सुरक्षा के भरोसे छोड़ रहे हैं। उन्होंने वहां मौजूद हिंदू समुदाय से अपील की कि वे सुनिश्चित करें कि कोलकाता में रहने वाले किसी भी मुस्लिम नागरिक का बाल भी बांका न हो। गांधी जी ने बताया कि वे बेलियाघाट में रहकर वास्तव में नोआखाली के पीड़ित हिंदुओं के प्राणों की रक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं। इस संक्षिप्त और भावुक संबोधन के बाद वे शांतिपूर्वक वापस हैदरी मंजिल के भीतर चले गए।
नेहरू की जनमत संग्रह की नीति और सरदार पटेल का विरोध
महात्मा गांधी जब कोलकाता में शांति स्थापना के प्रयास कर रहे थे, ठीक उसी समय देश के उत्तर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र में भारत के क्षेत्रीय अखंडता को लेकर गंभीर संकट खड़ा हो गया था। नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस में रहने वाले पठान समुदाय और पाकिस्तानी पंजाबियों के बीच ऐतिहासिक रूप से कभी तालमेल नहीं रहा था। इसी वजह से वहां के बहुसंख्यक पठानों और प्रांतीय नेतृत्व ने पाकिस्तान के बजाय भारत के साथ विलय करने का स्पष्ट मन बना लिया था।
प्रांतीय असेंबली का राजनीतिक समीकरण भी भारत के पक्ष में था। वर्ष 1945 के प्रांतीय चुनावों में मुस्लिम बहुल इलाका होने के बावजूद नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस में मुस्लिम लीग को करारी शिकस्त मिली थी और कांग्रेस पार्टी ने स्पष्ट बहुमत हासिल करके सरकार बनाई थी। लोकतांत्रिक और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुसार, प्रांतीय विधानसभा के बहुमत के आधार पर इस प्रांत का भारत में विलय पूरी तरह तय माना जा रहा था। हालांकि, जब विलय की औपचारिक प्रक्रिया पर चर्चा शुरू हुई, तब जवाहर लाल नेहरू के एक फैसले ने पूरे घटनाक्रम को उलट दिया।
जवाहर लाल नेहरू इस बात पर अड़ गए कि नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस के भविष्य का फैसला प्रांतीय विधानसभा के बजाय जनमत संग्रह (रेफरेंडम) के जरिए ही कराया जाना चाहिए। जब यह विषय कांग्रेस कार्यकारिणी के समक्ष विचारार्थ आया, तब सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू के इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। सरदार पटेल का स्पष्ट तर्क था कि जब देश के अन्य सभी प्रांतों में विलय का अधिकार वहां की चुनी हुई प्रांतीय विधानसभाओं को दिया गया है, तो यहां अलग नियम क्यों लागू किया जाए। पटेल ने कहा कि जिन राज्यों में मुस्लिम लीग का बहुमत था, वे अपनी विधानसभा के निर्णय से पाकिस्तान में शामिल हो रहे हैं, इसलिए नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर में कांग्रेस का बहुमत होने के नाते न्यायसंगत यही होगा कि प्रांतीय असेंबली का फैसला मानकर इसे भारत का हिस्सा बनाया जाए। इसके बावजूद नेहरू अपनी लोकतांत्रिक जिद पर अड़े रहे, जिसका सीधा फायदा पाकिस्तान को मिला और यह रणनीतिक क्षेत्र भारत के हाथ से निकल गया।
आधी रात को बदला ऑल इंडिया रेडियो का सुर और पाकिस्तान का जन्म
राजनीतिक उठापटक और हिंसा के दौर के बीच संचार का सबसे बड़ा माध्यम ऑल इंडिया रेडियो भी इस ऐतिहासिक परिवर्तन का साक्षी बन रहा था। 13 जनवरी की रात लगभग 11 बजकर 50 मिनट पर ऑल इंडिया रेडियो के लाहौर केंद्र से एक अंतिम पारंपरिक उद्घोषणा प्रसारित की गई। प्रसारण अधिकारी ने श्रोताओं को सूचित किया कि यह ऑल इंडिया रेडियो का लाहौर केंद्र है और अगले महत्वपूर्ण ऐलान के लिए कुछ मिनट प्रतीक्षा की जाए। इसके बाद रेडियो पर लगातार लगभग दस मिनट तक संगीत बजता रहा, जिसने पूरे देश में उत्सुकता और तनाव को बढ़ा दिया था।
जैसे ही घड़ी की सुइयों ने रात के 12 बजकर 1 मिनट का समय दिखाया, रेडियो तरंगों पर एक नई आवाज गूंज उठी। रेडियो से उद्घोषणा हुई, "अस्सलाम आलेकुम। पाकिस्तान की ब्रॉडकास्टिंग सर्विस में आपका स्वागत है। हम लाहौर से बोल रहे हैं। कुबूल-ए-सुबह-ए-आजादी।" इस एक वाक्य के साथ ऑल इंडिया रेडियो के लाहौर स्टेशन का नाम और पहचान हमेशा के लिए बदल गई। 13 अगस्त की इस मध्यरात्रि को प्रसारित हुए इस नए सुर के साथ ही रेडियो के जरिए विश्व पटल पर नए देश पाकिस्तान के जन्म की आधिकारिक घोषणा संपन्न हुई।



















