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सरगुजा में भादो एकादशी पर कर्मा पर्व की धूम, युवतियों ने रखा निर्जला उपवासछत्तीसगढ़
23 सित॰ 2026, 11:21 am (2 दिन पहले)· 0

सरगुजा में भादो एकादशी पर कर्मा पर्व की धूम, युवतियों ने रखा निर्जला उपवास

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में प्रकृति और अच्छी फसल की कामना के साथ कर्मा पूजा मनाई गई, जहां युवतियों ने कठिन निर्जला व्रत रखकर कर्म देवता की आराधना की।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपराओं को ग्रामीण और आदिवासी समाज आज भी पूरी निष्ठा से संजोए हुए है। भादो मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि यानी एकादशी को मनाए जाने वाले कर्मा पूजा पर्व पर इस बार भी व्यापक उत्साह देखने को मिला। अच्छी पैदावार, गांव में सुख-शांति तथा परिवार की संपन्नता की कामना को लेकर ग्रामीण कर्म देवता की शरण में पहुंचे। इस पावन अवसर पर अविवाहित कन्याओं ने कठोर निर्जला उपवास रखकर अपनी अटूट आस्था प्रकट की।

प्रकृति आराधना और कई समुदायों का साझा पर्व

स्थानीय परंपराओं के जानकार सिकंदर प्रजापति के अनुसार कर्मा पूजा पूर्वजों के दौर से निरंतर चली आ रही एक समृद्ध विरासत है। यह धार्मिक अनुष्ठान हर साल भादो माह की एकादशी तिथि को ही संपन्न होता है। इस उत्सव में केवल एक वर्ग नहीं, बल्कि मांझी, मजवार, कंवर, कुम्हार और गोंड समाज सहित हिंदू समाज के विभिन्न समुदाय पूरी एकजुटता के साथ भागीदार बनते हैं। कर्मा पर्व का सीधा संबंध प्रकृति, पर्यावरण और कृषि चक्र से जुड़ा हुआ है। ग्रामीण मान्यताओं के तहत धान की भरपूर पैदावार, क्षेत्र में खुशहाली और जन-कल्याण की प्रार्थना के साथ कर्म देव का आह्वान किया जाता है। ग्रामीण इसे पूर्वजों की धरोहर और मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत पर्व मानते हैं। विधिवत पूजन अनुष्ठान पूर्ण होने के उपरांत व्रत खोलने और श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण का क्रम भी पारंपरिक रीति से पूरा किया जाता है।

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दिनभर निर्जला साधना और सांझ की तैयारियां

इस अनुष्ठान में अविवाहित युवतियों की मुख्य भूमिका रहती है, जो सुबह से ही निर्जला व्रत का संकल्प लेती हैं। पूरे दिन अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहण किए बिना युवतियां उपवास का पालन करती हैं। दिन ढलने के बाद शाम को स्नान कर शुद्धि की जाती है, जिसके बाद पूजा-अर्चना की विधिवत तैयारियां जोर-शोर से शुरू होती हैं।

जंगल से डाली लाने के सख्त नियम

शाम ढलते ही करीब 7 से 8 बजे के बीच वन क्षेत्र से कर्म वृक्ष की डाली लाने की विशेष प्रक्रिया आरंभ होती है। इस विधान में सख्त नियमों का पालन अनिवार्य माना गया है। कर्म की डाली को किसी कुल्हाड़ी या धारदार हथियार से काटने के बजाय हाथों से आदरपूर्वक तोड़कर लाया जाता है। जंगल से लाते समय इस पावन डाली को किसी भी सूरत में जमीन पर नहीं रखा जाता, बल्कि कंधों पर धारण कर सीधे घर और आंगन तक पहुंचाया जाता है।

दूध से अभिषेक और छत के छप्पर में स्थापना

घर के प्रांगण में डाली के पहुंचते ही उसका आदर-सत्कार किया जाता है। कर्म देव के प्रतीक रूप इस डाली को एक स्वच्छ थाली में स्थापित कर पवित्र दूध से स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात पूजा-अर्चना के विधान संपन्न होते हैं और फिर इसे घर के छप्पर पर सुरक्षित स्थापित कर दिया जाता है। इस तरह पूरे विधि-विधान से कर्मा देव की अगवानी कर ग्रामीण अपनी समृद्ध लोक संस्कृति की रक्षा करते हैं।

सवाल-जवाब

कर्मा पूजा किस तिथि को मनाई जाती है?
यह पावन पर्व हर साल भादो माह की ग्यारहवीं तिथि यानी एकादशी के दिन मनाया जाता है।
इस पूजा में कौन से समुदाय भाग लेते हैं?
इस उत्सव में मांझी, मजवार, कंवर, कुम्हार और गोंड समाज सहित हिंदू समाज के कई समुदाय सम्मिलित होते हैं।
युवतियां किस प्रकार का व्रत रखती हैं?
अविवाहित युवतियां सुबह से शाम तक बिना अन्न और जल ग्रहण किए निर्जला उपवास रखती हैं।
कर्म की डाली जंगल से कब और कैसे लाई जाती है?
शाम 7 से 8 बजे के बीच डाली को बिना काटे, हाथों से तोड़कर लाया जाता है और जमीन पर रखे बिना कंधों पर ढोया जाता है।
घर लाकर कर्म डाली की स्थापना कैसे की जाती है?
डाली को थाली में रखकर दूध से स्नान कराया जाता है और पूजा के बाद घर के छप्पर में स्थापित किया जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·1 दिन पहले

बिना पानी के पूरे दिन रहना सेहत के लिए थोड़ा भारी पड़ सकता है, खासकर आज के समय में। परंपराओं का सम्मान अपनी जगह है, पर युवा पीढ़ी की सेहत को लेकर भी थोड़ा सोचना चाहिए।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 दिन पहले

प्रकृति और लोक संस्कृति को बचाए रखने का ऐसा जज्बा वाकई दिल जीत लेता है, युवतियों की निष्ठा गजब है।

Ravikash Gupta@ravikash·1 दिन पहले

अजुन भाई, बिल्कुल सही कहा आपने! पिछली बार जब मैं छत्तीसगढ़ गया था, तो मैंने खुद इन युवतियों की ऐसी अटूट निष्ठा और समर्पण अपनी आँखों से देखा था।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

बिना औजार के हाथों से डाली तोड़कर लाना और जमीन पर न रखना, परंपरा का यह अनुशासन बहुत प्यारा लगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

रोहन भाई, सच कहा आपने। जब मैं पिछली बार सरगुजा गया था, तो मैंने खुद देखा था कि कैसे युवतियां बिना पानी पिए पूरे दिन इतनी आस्था से यह पूजा करती हैं।

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