केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त मोर्चा बनाने का प्रयास कर रहे विपक्षी गठबंधन को चुनावी राज्यों में गंभीर अंदरूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी दलों ने गांधी जयंती के मौके पर राजधानी दिल्ली और मुंबई की सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश की थी। इसके बावजूद चुनावी बिसात पर उतरने से पहले ही सहयोगी दलों के बीच आपसी मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में जहां सीट बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है, वहीं पंजाब में कांग्रेस पार्टी के भीतर गुटबाजी और नेतृत्व परिवर्तन ने राज्य की राजनीतिक सरगर्मी को पूरी तरह बढ़ा दिया है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई
गांधी जयंती यानी दो अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने जोरदार विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। हालांकि दिल्ली पुलिस ने इस प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। पुलिस प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए प्रदर्शन स्थल से भीड़ को हटा दिया और लगभग एक हजार लोगों को हिरासत में ले लिया। इस प्रदर्शन में प्रमुख रूप से सौरभ भारद्वाज, आतिशी, संजय सिंह और नेहा बोरा जैसे प्रमुख नेता शामिल थे।
इसके अगले दिन यानी तीन अक्टूबर को नेहा बोरा ने दोपहर एक बजे एक बार फिर कार्यकर्ताओं को जंतर-मंतर पर एकत्रित होने का आह्वान किया था। दिल्ली पुलिस ने इस बार भी किसी तरह के जमावड़े की इजाजत नहीं दी और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करते हुए प्रदर्शनकारियों को वहां जुटने से रोक दिया। इस दौरान लगभग 150 लोगों को हिरासत में लिया गया। राहुल गांधी ने इस पूरे घटनाक्रम में महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस द्वारा बदसलूकी किए जाने का आरोप लगाया, जिसे दिल्ली पुलिस ने सिरे से खारिज कर दिया। पुलिस ने इन विरोध प्रदर्शनों और हंगामे को लेकर कुल तीन एफआईआर दर्ज की हैं। दो दिनों के इस घटनाक्रम में पहले दिन जुटी भीड़ दूसरे दिन घटकर महज कुछ दर्जन लोगों तक ही सिमट गई।
मुंबई में शिवाजी पार्क का मोर्चा और मानवाधिकार आयोग का नोटिस
राजधानी दिल्ली की तरह ही मुंबई के शिवाजी पार्क में भी इसी मुद्दे पर विपक्षी खेमे की ओर से विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था। इस प्रदर्शन के दौरान अभिजीत दिपके ने ज्ञानेश कुमार के मामले का हवाला देते हुए दिल्ली पुलिस और प्रधानमंत्री को निशाने पर लिया। अभिजीत दिपके ने हालांकि मुंबई पुलिस की कार्यशैली की सराहना की थी, लेकिन यह प्रदर्शन कानूनी और प्रशासनिक पचड़े में फंस गया। मुंबई पुलिस ने इस आयोजन के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज कर ली।
इसके साथ ही मुंबई के प्रदर्शन में नाबालिग बच्चों के इस्तेमाल को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया। सेवा न्याय उत्थान फाउंडेशन के हेड ऑफ इंटरवेंशन सतीश वैद ने इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों और वीडियो फुटेज का हवाला देते हुए दावा किया गया कि भीड़ के ऊपर एक बच्चे को उठाकर भड़काऊ नारेबाजी कराई गई। इसके अलावा यह आरोप भी लगाया गया कि पुलिस की संभावित कार्रवाई से बचने और बच्चों को ढाल के रूप में इस्तेमाल करने की योजना पहले से ही ग्रुप चैट में बनाई गई थी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए सात दिनों के भीतर संबंधित अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
पंजाब में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग का इस्तीफा और नया नेतृत्व
सड़क पर दिखाई जा रही कथित एकजुटता के विपरीत राज्यों के चुनावी धरातल पर विपक्षी दलों के बीच कोई तालमेल नजर नहीं आ रहा है। पंजाब में कांग्रेस पार्टी का संगठनात्मक ढांचा भारी अंदरूनी कलह से जूझ रहा है। पार्टी हाईकमान के हस्तक्षेप के बाद अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने अक्टूबर 2026 के पहले हफ्ते में पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा दे दिया। राजा वड़िंग अप्रैल 2022 से इस पद पर बने हुए थे, जब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता गंवाकर आम आदमी पार्टी से हार गई थी।
हाईकमान ने नेतृत्व में बदलाव करते हुए पूर्व हॉकी कप्तान परगट सिंह को पंजाब कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। साल 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरने से पहले इस तरह के बड़े संगठनात्मक फेरबदल ने पंजाब के राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है।
चन्नी बनाम वड़िंग गुट की खींचतान और सियासी समीकरण
पंजाब कांग्रेस के भीतर लंबे समय से पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के खेमों के बीच खींचतान चल रही थी। चरणजीत सिंह चन्नी का खेमा लगातार राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद पर बनाए रखने का विरोध कर रहा था। दोनों गुटों के बीच जमीन पर अपना वर्चस्व साबित करने, होर्डिंग्स-पोस्टर्स लगाने और सार्वजनिक बयानों को लेकर टकराव पिछले कई महीनों से बना हुआ था।
यह अंदरूनी खींचतान केवल दो नेताओं के बीच की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक और राजनीतिक समीकरण भी जुड़े हैं। चरणजीत सिंह चन्नी राज्य में दलित राजनीति के प्रमुख चेहरे के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहते हैं, जबकि राजा वड़िंग जाट सिख समुदाय के राजनीतिक प्रभाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी खींचतान के कारण विरोधी दल कांग्रेस को अंदर से बिखरी हुई पार्टी करार दे रहे हैं। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को भी आंतरिक रूप से बिखरा हुआ संगठन बता रही है।
पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का आमना-सामना
राष्ट्रीय स्तर पर भले ही दोनों दल एक साथ कदमताल करने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन पंजाब की जमीन पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे के खिलाफ पूरी तरह आक्रामक हैं। पदभार संभालते ही पंजाब कांग्रेस के नए अध्यक्ष परगट सिंह ने सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी पर सीधा हमला बोला है। कांग्रेस का आरोप है कि आम आदमी पार्टी के शासनकाल में पंजाब की कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है।
कांग्रेस नेताओं का दावा है कि वे साल 2027 के चुनाव में वापसी कर सरकार बनाने में सफल होंगे। हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि पार्टी को पहले अपनी अंदरूनी गुटबाजी और मतभेदों को सुलझाना होगा। साल 2022 में चुनावी हार झेल चुकी कांग्रेस के सामने एक तरफ अपनी आंतरिक दरारें भरने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ उसी दल से मुकाबला करने की मजबूरी है जिसके साथ वह दिल्ली में मंच साझा करती रही है।
उत्तर प्रदेश में सीटों पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में तनातनी
पंजाब के अलावा उत्तर प्रदेश में भी विपक्षी गठबंधन के बीच दरारें साफ दिखाई दे रही हैं। उत्तर प्रदेश में सहयोगी दल समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस की सियासी महत्वाकांक्षाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य में कांग्रेस 150 विधानसभा सीटों की मांग पर अड़ी हुई है, जबकि समाजवादी पार्टी उसे 50 सीटें देने के पक्ष में भी नहीं दिख रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने संगठन और नेतृत्व में बदलाव जरूर किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर सहयोगी दल उसे उसकी सीमित ताकत का अहसास करा रहे हैं। ऐसे में आगामी चुनावी परीक्षाओं से पहले विपक्ष की साझा रणनीति राज्यों के स्तर पर बिखरती हुई नजर आ रही है।



















