लोकसभा में विपक्ष के नेता की जिम्मेदारी संभालने के बाद से राहुल गांधी केंद्र सरकार के खिलाफ लगातार तीखे तेवर अपनाए हुए हैं। पार्टी की गतिविधियों को केवल विधायी बहसों तक सीमित रखने के बजाय वे कार्यकर्ताओं और सांसदों को जन आंदोलनों से जोड़ने पर जोर दे रहे हैं। पहले कन्याकुमारी से कश्मीर तक निकली 'भारत जोड़ो यात्रा' और उसके उपरांत राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा स्नातक यानी NEET-UG प्रश्नपत्र लीक प्रकरण पर जंतर-मंतर पर हुए धरने में विपक्षी एकजुटता दिखी थी। उस दौरान कॉकरोच जनता पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस व अन्य घटक दलों के प्रतिनिधि मैदान में उतरे थे। हालिया दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर विपक्षी खेमे ने अपने तेवर और तीखे किए हैं। शीर्ष अदालत तक निकाले गए पैदल मार्च और याचिका दाखिल करने के सिलसिले के बीच पार्टी के भीतर एक नई आंतरिक समीक्षा प्रक्रिया शुरू हो गई है।
मैदानी मौजूदगी का लेखा-जोखा और सख्त हिदायत
विपक्षी गठबंधन के घटक दलों ने चुनाव आयोग के दफ्तर की तरफ कूच करने की कोशिश की थी। इसके ठीक अगले दिन राष्ट्रपति भवन की ओर भी एक बड़ा मार्च निकाला गया था। हालांकि शुरुआती दो दिनों के प्रदर्शनों के दौरान कई प्रमुख चेहरों के गायब रहने की बात सामने आई। इसी पृष्ठभूमि में राहुल गांधी ने संगठन के शीर्ष नेता केसी वेणुगोपाल को उन तमाम सांसदों का विवरण जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी, जो प्रदर्शन में शामिल हुए या फिर बिना किसी ठोस वजह के नदारद रहे।
इस कवायद का सीधा मकसद उन जनप्रतिनिधियों को स्पष्ट संकेत देना है जो केवल सोशल मीडिया मंचों पर बयानबाजी तक सीमित रहते हैं लेकिन सड़कों के संघर्ष से दूरी बना लेते हैं। पूर्व में भी कुछ वरिष्ठ नेताओं की ऐसी कार्यशैली को लेकर अंदरूनी शिकायतें सामने आई थीं। जब यह संदेश नीचे तक पहुंचा कि शीर्ष नेतृत्व व्यक्तिगत तौर पर हर सांसद की शारीरिक मौजूदगी का रिकॉर्ड रख रहा है, तो उसका असर तुरंत दिखा। कई ऐसे चेहरे भी बाद के प्रदर्शनों में कतार में खड़े नजर आए, जो आमतौर पर सड़क के आंदोलनों से बचते रहे हैं।
निर्णय लेने वाली कोर टीम का आंतरिक ढांचा
संसदीय रणनीति और जमीनी अभियानों के बीच तालमेल बैठाने के लिए राहुल गांधी के इर्द-गिर्द एक सशक्त कोर टीम काम कर रही है। नियमित विमर्श और रणनीति तय करने वाले इस समूह में कई अनुभवी व रणनीतिक चेहरे शामिल हैं।
- केसी वेणुगोपाल: संगठन महासचिव के तौर पर पार्टी तंत्र के भीतर राहुल गांधी की सबसे विश्वसनीय आंख और कान माने जाते हैं। वे संगठनात्मक अनुशासन और समन्वय की मुख्य धुरी हैं।
- अलंकार सवाई: सार्वजनिक मंचों से लेकर अंदरूनी बैठकों तक अक्सर साथ दिखने वाले सवाई पर्दे के पीछे से रणनीतिक ताना-बाना बुनने का कार्यभार संभालते हैं।
- श्रीवत्स: वे केवल एक नाम का प्रयोग करते हैं और राहुल गांधी की संपूर्ण संचार व संवाद टीम का नेतृत्व करते हैं। प्रचार और नैरेटिव तय करने में इनकी सीधी भूमिका रहती है।
- केबी बायजू: विशेष सुरक्षा समूह यानी एसपीजी के पूर्व अधिकारी रहे बायजू दौरों, सुरक्षा और अभियानों से जुड़े लॉजिस्टिक्स का सूक्ष्म प्रबंधन करते हैं।
- वाड्रा: कोर बैठकों का हिस्सा रहकर रणनीतिक चर्चाओं में नियमित तौर पर भागीदार बनते हैं।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक हाल के समय में इस कोर समूह के साथ बैठकों का दौर काफी तेज हो गया है, जहां फैसलों को फौरन जमीन पर उतारने की रूपरेखा तैयार की जाती है।
बहानेबाजी पर रोक और राज्यों से कार्यकर्ताओं की लामबंदी
सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय तक निकाले गए मार्च से पहले ही सांसदों को कड़ा निर्देश जारी कर दिया गया था। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की ओर से साफ संदेश दिया गया कि किसी भी तरह का टालमटोल या गैरहाजिरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। नेताओं को पहले ही सचेत कर दिया गया था कि पुलिस द्वारा रोके जाने या हिरासत में लिए जाने की दलीलें नहीं चलेंगी और हर हाल में तय समय पर पहुंचना अनिवार्य होगा।
कार्यकर्ताओं की सहभागिता बढ़ाने के लिए रणनीतिक बंदोबस्त भी किए गए। अंतरराज्यीय सीमाओं पर पुलिस द्वारा रोके जाने के खतरे को भांपते हुए कार्यकर्ताओं को रविवार रात ही राजधानी में ठहराने का प्रबंध किया गया। 24 अकबर रोड स्थित पार्टी मुख्यालय के दरवाजे खोल दिए गए। सबसे ज्यादा उपस्थिति हरियाणा से दर्ज की गई, जहां राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा और उनके सांसद पुत्र दीपेंद्र हुड्डा ने दिल्ली स्थित अपने आवासों में कार्यकर्ताओं के ठहरने की पूरी व्यवस्था की। इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश के सांसदों ने भी अपने आवासों पर कार्यकर्ताओं के रुकने और खाने-पीने के इंतजाम किए, जिससे सोमवार के मार्च में भारी भीड़ जुटाई जा सकी।


















