डेयरी व्यवसाय से जुड़े किसानों और पशुपालकों के सामने अक्सर यह समस्या आती है कि अच्छी भली दुधारू गाय का दूध अचानक घटने लगता है। कई बार मवेशी पालक हड़बड़ाहट में बिना सोचे समझे केवल दाने की मात्रा बढ़ा देते हैं, जिससे समस्या हल होने के बजाय पशु का हाजमा खराब हो सकता है। असल में दूध की मात्रा में आने वाले इस अचानक बदलाव के पीछे पोषण का असंतुलन, चारे की खराब गुणवत्ता, खनिजों का अभाव या फिर कोई भीतरी बीमारी जिम्मेदार हो सकती है। सही समय पर पशु की शारीरिक दशा को पहचानकर और उसकी आहार योजना को व्यवस्थित करके इस परेशानी को आसानी से दूर किया जा सकता है।
दूध उत्पादन में आनुवंशिकी और नस्ल का महत्व
पशु चिकित्सकों का स्पष्ट मानना है कि किसी भी गोवंश की दुग्ध क्षमता में उसके जींस की बहुत बड़ी भूमिका रहती है। एक उच्च क्षमता वाली गाय अपनी भावी पीढ़ी को भी बेहतर उत्पादन के गुण दे सकती है, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि केवल खानपान बदलकर किसी साधारण नस्ल के मवेशी से असीमित उत्पादन हासिल किया जा सकता है। वास्तविकता यही है कि किसी भी मवेशी का असली प्रदर्शन उसकी नस्ल, उसके शरीर की बनावट, रोजाना मिलने वाले आहार और उसकी सामान्य देखभाल के तालमेल पर टिका होता है।
यदि किसी पशुपालक के पास कम दूध देने वाली पारंपरिक देसी नस्ल की गायें हैं, तो उनकी अगली पीढ़ी को सुधारने के लिए आधुनिक तकनीक अपनाई जा सकती है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित सांड के वीर्य से कृत्रिम गर्भाधान कराना एक बेहद कारगर विकल्प साबित होता है। इस प्रक्रिया से जन्म लेने वाली बछिया में अपनी मां के मुकाबले कहीं अधिक दूध देने के आनुवंशिक गुण विकसित होने की पूरी संभावना रहती है। हालांकि बछिया बड़ी होकर कितना लीटर दूध देगी, यह पूरी तरह से उसके बड़े होने के दौरान मिलने वाले संतुलित आहार, नियमित रखरखाव और बीमारियों से बचाव पर भी निर्भर करेगा।
उत्पादन घटने के असली कारणों की पड़ताल
जब नियमित रूप से भरपूर दूध देने वाला कोई दुधारू पशु अचानक अपनी उपज आधी या उससे भी कम कर दे, तो सबसे पहला काम समस्या की जड़ तक पहुंचना होना चाहिए। साहीवाल और गिर जैसी भारत की अव्वल दुधारू नस्लों में भी यदि पोषक तत्वों की कमी हो जाए या पेट में कोई विकार आ जाए, तो उनका दूध फौरन गिर जाता है। पशुपालक को यह बारीकी से देखना चाहिए कि गाय किस अवस्था में है, क्या उसने चारा खाना कम कर दिया है, क्या गोबर की बनावट में बदलाव आया है, या फिर उसके थन में कोई सूजन तो नहीं है। ऐसी स्थिति में घरेलू नुस्खे आजमाने के बजाय पंजीकृत पशु डॉक्टर को दिखाकर जांच करानी चाहिए ताकि सही कारण सामने आ सके।
संतुलित दाना और खली का सही गणित
दुधारू गाय को उसकी दैनिक शारीरिक जरूरत और दूध की मात्रा के अनुपात में ही दाना मिश्रण देना अनिवार्य होता है। पशु के आहार में ऊर्जा और प्रोटीन का सही संतुलन बनाए रखना सबसे अहम पहलू है। पशु आहार तैयार करते समय उसमें बिनौला खली और सरसों खली जैसी चीजों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि ये घटक शरीर को भरपूर ताकत और फैट निर्माण में सहयोग देते हैं।
दाना देने का एक सामान्य वैज्ञानिक पैमाना यह है कि यदि कोई गाय प्रतिदिन 10 लीटर दूध दे रही है, तो उसे लगभग 4 से 5 किलो पौष्टिक दाने की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त उसके अपने शरीर के पोषण और रखरखाव के लिए अलग से आहार देना पड़ता है। हालांकि आहार की यह मात्रा हर पशु के कुल शारीरिक वजन, उसकी मौजूदा शारीरिक अवस्था और उसे दिए जा रहे सूखे व गीले चारे की गुणवत्ता के आधार पर थोड़ी बहुत घट या बढ़ सकती है।
बरसीम और लूसर्न जैसे पौष्टिक हरे चारे की उपयोगिता
पशु आहार में केवल सूखा भूसा और दाना शामिल करने से दुधारू पशु का स्वास्थ्य लंबे समय तक ठीक नहीं रह सकता। दूध की पैदावार और पशु की पाचन शक्ति को दुरुस्त रखने में रसीले हरे चारे की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। चारे की उन्नत फसलों में बरसीम और लूसर्न, जिसे सामान्य भाषा में अल्फाल्फा भी कहा जाता है, पोषक तत्वों का सबसे उत्तम भंडार माने जाते हैं।
इन हरे चारों में सुपाच्य प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और प्राकृतिक खनिज भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। जब किसान अपने मवेशी को गुणवत्तापूर्ण दाने के साथ नियमित रूप से पर्याप्त मात्रा में बरसीम अथवा लूसर्न खिलाते हैं, तो पशु के रूमेन में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु सक्रिय रहते हैं। इससे पशु जो भी खाता है, उसका पूरा पोषण उसके शरीर और दूध में तब्दील हो पाता है।
कैल्शियम की कमी और चिकित्सीय परामर्श
जो गायें अधिक मात्रा में दूध देती हैं, उनके शरीर से दूध के साथ भारी मात्रा में कैल्शियम बाहर निकलता है। यदि आहार में इस तत्व की भरपाई न की जाए, तो पशु के रक्त में कैल्शियम का स्तर एकाएक गिर सकता है, जिससे उसकी दूध देने की क्षमता एकदम लड़खड़ा जाती है। शरीर में कमजोरी आने से पशु उठने-बैठने में भी लाचार हो सकता है।
इस कमी को दूर करने के लिए जरूरत के हिसाब से मुंह से पिलाए जाने वाले सप्लीमेंट या गंभीर मामलों में सीधे नसों में इंजेक्शन दिए जाते हैं। हालांकि पशुपालकों को इस बात की सख्त ताकीद की जाती है कि बिना डॉक्टर की देखरेख के कभी भी कैल्शियम का इंजेक्शन खुद न लगाएं। कैल्शियम की खुराक और उसे देने का तरीका हमेशा पशु की वास्तविक शारीरिक हालत और वजन की चिकित्सकीय जांच के बाद ही तय किया जाना चाहिए।
नियमित देखभाल और निगरानी से ही टिकेगा उत्पादन
डेयरी के मुनाफे को बरकरार रखने के लिए पशु की दैनिक दिनचर्या और व्यवहार पर नजर रखना सबसे पहली शर्त है। जब भी दूध में कोई अप्रत्याशित गिरावट दिखाई दे, तो बिना सोचे समझे केवल खली या दाना ठूंसने की गलती न करें। सबसे पहले उसकी वजह पहचानें, चारे में बरसीम या लूसर्न जैसे हरे चारे को शामिल करें और जरूरत महसूस होने पर पशु चिकित्सक की राय लेकर ही आहार में फेरबदल करें। सही नस्ल, वैज्ञानिक पोषण और समय पर स्वास्थ्य प्रबंधन ही दुधारू पशु को स्वस्थ रखकर उसकी पूरी उत्पादन क्षमता हासिल करने का एकमात्र सुरक्षित मार्ग है।
























