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साढ़े तीन दशक बाद अपनी जन्मभूमि लौटे कश्मीरी पंडित, घर की जगह न पहचान पाए तो छलक पड़े आंसूजम्मू-कश्मीर
13 जून 2026, 3:39 am (92 दिन पहले)· 1

साढ़े तीन दशक बाद अपनी जन्मभूमि लौटे कश्मीरी पंडित, घर की जगह न पहचान पाए तो छलक पड़े आंसू

'प्रगाश हेरिटेज टूर' के तहत 36 साल बाद कश्मीर लौटे पंडितों ने श्रीनगर के गणपत्यार मंदिर में पूजा की और घर वापसी की उम्मीद जताई। कई लोग अपने जले हुए घरों की जगह तक नहीं पहचान पाए।

पूरे 36 साल बाद कश्मीरी पंडितों ने अपनी कश्मीर वापसी की वह कहानी साझा की है जिसे शब्दों में पिरोना आसान नहीं। यह उस पीड़ा की दास्तान है जो इस समुदाय और इस इलाके ने साढ़े तीन दशक पहले आतंकवाद के दौर में झेली थी। ये दृश्य श्रीनगर के हब्बा कदल इलाके में बने गणपत्यार मंदिर और आश्रम के हैं, जहां शुक्रवार को पूजा-अर्चना के समय बेहद भावुक नजारा देखने को मिला। 'प्रगाश हेरिटेज टूर' पहल के तहत कश्मीरी पंडितों का एक दल अपनी जन्मभूमि लौटा, जिनमें से कई लोग बीते 36 वर्षों से अपनी मिट्टी से दूर थे।

कश्मीर पहुंचे इस दल में वे पंडित शामिल थे जो 36 साल से अपनी जन्मभूमि से बिछड़े हुए थे और अमेरिका तथा ब्रिटेन जैसे देशों के अलावा मुंबई, दिल्ली और भारत के दूसरे हिस्सों में जा बसे थे। इन सभी ने प्राचीन मंदिर परिसर में जाकर प्रार्थना की और अपने पुरखों की धरती से दोबारा जुड़ते हुए अपने मन की गहरी भावनाएं जाहिर कीं।

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कभी इन्हीं गलियों में बीता था बचपन

एक दौर था जब यह इलाका कश्मीरी पंडितों की सबसे बड़ी बस्ती हुआ करता था। यहां लाखों लोगों ने अपना बचपन गुजारा था और सुबह-शाम मंदिरों में पूजा-पाठ तथा धार्मिक अनुष्ठान होते रहते थे। 36 साल बाद उन्हीं गलियों और मंदिरों में कदम रखने से पंडितों के भीतर घर लौटने की एक नई आस जगी है। आज जब वे यहां पहुंचे तो पुरानी यादें ताजा हो उठीं और साथ ही आंखें भी नम हो गईं। पंडितों ने उन गलियों में पसरा सन्नाटा महसूस किया जो कभी 'आजादी' के नारों से गूंजा करती थीं।

इस दल में शामिल कई लोगों के लिए यह तीन दशक से भी अधिक समय में कश्मीर की पहली यात्रा थी। यह पल पुरानी यादों, गहरे चिंतन और अपनेपन के एहसास से भरा हुआ था, क्योंकि वे अपने बचपन और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी जगहों पर फिर से लौट रहे थे।

इस प्रतिनिधिमंडल में ऐसे लोगों से मुलाकात हुई जिनका बचपन इन्हीं गलियों में बीता था, जो रोज सुबह-शाम इन मंदिरों में पूजा करते और माथा टेकते थे। आज 36 साल बाद कश्मीर और यहां के मंदिरों को देखकर वे इतने भावुक हो गए कि उनकी जुबान पर मौजूद दर्द भरी कहानी शब्दों में नहीं ढल पा रही थी।

'घर जला दिए गए, अब जगह भी नहीं पहचान पाते'

बातचीत के दौरान वीणा वांचो ने अपनी आपबीती बताई। वे 1990 के दशक तक उत्तरी कश्मीर के हंदवाड़ा स्थित वडवन गांव में रहती थीं, जहां उनके 5 घर जला दिए गए। आज वहां बड़े-बड़े फव्वारे (टॉम फाउंटेन) नजर आते हैं और वे अपने घरों की जगह तक नहीं पहचान पा रहीं। वीणा ने कहा, 'कश्मीर हमारी धरती है। हम चाहते हैं कि हमें यहां कोई छोटा-सा घर मिल जाए। हम यहीं रहना चाहते हैं। मरते दम तक हम इसके लिए लड़े, लेकिन कश्मीर नहीं छोड़ा।'

यह पीड़ा अकेली वीणा वांचो की नहीं है। विजंती ठट्टू, जो 1990 के दशक तक श्रीनगर के निशात इलाके में वीएस पब्लिक स्कूल नाम का एक विद्यालय चलाती थीं, उन्होंने भी अपनी बात रखी। विजंती ठट्टू ने कहा, 'हालात अब जरूर बेहतर हुए हैं और यही सही वक्त है कि कश्मीर लौटा जाए। इसके लिए सबका साथ चाहिए। हम चाहते हैं कि कश्मीर में हमें घर मिले ताकि हम अपनी आखिरी सांसें यहीं ले सकें। हमारा घर जला दिया गया है, फिर भी यहां आकर मैं सुकून पाना चाहती हूं।'

वीणा वांचो ने आगे कहा कि 1990 के दशक में यहां निजाम-ए-मुस्तफा के नारे गूंजते थे और हजारों की तादाद में लोग सड़कों पर निकल आते थे। उन्होंने उम्मीद जताई कि आज कश्मीरी मुसलमान उनका साथ दें और उनकी घर वापसी को मुमकिन बनाएं।

संगठनों के सहयोग से हो रहा आयोजन

विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय को उनकी सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक जड़ों से दोबारा जोड़ने के मकसद से यह हेरिटेज टूर कई हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों के सहयोग से कराया जा रहा है। यात्रा में शामिल समुदाय के सदस्यों ने मौजूदा हालात पर भरोसा जताते हुए कहा कि उनकी वापसी के लिए परिस्थितियां अनुकूल लग रही हैं। हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वापसी की किसी भी प्रक्रिया की कामयाबी बड़ी हद तक कश्मीर घाटी की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी के समर्थन और स्वीकार्यता पर निर्भर करेगी।

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