जम्मू और कश्मीर की घाटी में सरकारी नौकरियों में तैनात कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाते हुए एक बार फिर गंभीर धमकी जारी की गई है। सोशल मीडिया पर सामने आए एक नए पत्र के माध्यम से यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल नामक संगठन ने कर्मचारियों को सीधे तौर पर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल वास्तव में पाकिस्तान से संचालित होने वाले आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का ही एक डिजिटल प्रॉक्सी समूह है। इस नए पत्र में खास तौर पर उन कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को निशाना बनाया गया है जो हाल के दिनों में अपने लिए सुरक्षित आवास और सुरक्षा की मांग को लेकर घाटी में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। पिछले दो महीनों के दौरान सामने आई ऐसी धमकियों के सिलसिले में यह पांचवीं घटना है, जिससे वहां कार्यरत कर्मचारियों के बीच चिंता बढ़ गई है।
लश्कर के प्रॉक्सी संगठन का धमकी भरा खत और उसके दावे
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित यह पत्र लगभग 10 सितंबर 2026 की तारीख का बताया गया है। इस पत्र पर "अहमद बिलाल, मीडिया कोऑर्डिनेटर, सोल्जर ऑफ रेजिस्टेंस" के हस्ताक्षर दर्ज हैं और इसकी शुरुआत धार्मिक अभिवादन "अस्सलाम-उ-अलैकुम" से की गई है। पत्र के मुख्य भाग में प्रदर्शनकारी कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के प्रति काफी आक्रामक भाषा का उपयोग किया गया है। उन्हें "व्हाइट-कॉलर आतंकवादी प्रवासी पंडित" कहते हुए संबोधित किया गया है। पत्र में कर्मचारियों द्वारा अलग बस्तियों या सुरक्षित सरकारी ट्रांजिट आवास की मांग को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया है और इसे एक साजिश करार दिया गया है। संगठन का दावा है कि सुरक्षित रिहाइशी बस्तियां बनाना "राज्य के भीतर एक और राज्य का निर्माण करने की सोची-समझी योजना" है।
धमकी भरे इस खत में यह आरोप भी लगाया गया है कि यह सब भारत सरकार की एक प्रायोजित योजना का हिस्सा है। पत्र के अनुसार, इस योजना का मकसद स्थानीय कश्मीरियों के साथ रहने वाले हिंदू समुदाय के लोगों के बीच असुरक्षा की झूठी भावना पैदा करना है, ताकि सुरक्षा बलों को स्थानीय आबादी के खिलाफ कड़े कदम उठाने और व्यापक छूट पाने का आधार मिल सके। आतंकी समूह ने अपनी इस दलील को आगे बढ़ाते हुए इसकी तुलना "इजरायली सेटलमेंट मॉडल" से की है। उनका दावा है कि प्रवासी पंडितों के पुनर्वास और डोमिसाइल प्रमाण पत्र जारी करने की आड़ में बाहरी लोगों को बसाया जा रहा है, ताकि क्षेत्र की जनसांख्यिकीय संरचना को बदला जा सके।
कर्मचारियों के नाम, पते और तस्वीरें की गईं सार्वजनिक
इस ताजा खत में कर्मचारियों पर 1990 के दशक से पीड़ित होने का नाटक करने का आरोप भी लगाया गया है। आतंकी गुट ने कहा है कि ये कर्मचारी केंद्र सरकार की नीतियों का समर्थन करते हुए क्षेत्र के माहौल को प्रभावित कर रहे हैं। खत में यह दावा भी किया गया है कि संगठन के पास कर्मचारियों के ठिकाने, उनके परिवार के सदस्यों के संपर्क विवरण, रहने के स्थान और दैनिक गतिविधियों की पूरी जानकारी मौजूद है। पत्र में चेतावनी दी गई है कि वे जब चाहें निशाना बना सकते हैं। इसमें स्थानीय लोगों से माफी मांगने के लिए सीमित समय तय करने की बात कहते हुए चेतावनी दी गई है कि गृह मंत्रालय या दिल्ली प्रशासन उन्हें नहीं बचा पाएगा और श्मशान घाट तक को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी गई है।
सुरक्षा विश्लेषकों का ध्यान इस बात ने सबसे ज्यादा खींचा है कि पिछले दो महीनों में जारी किए गए पत्रों में कर्मचारियों की व्यक्तिगत जानकारियां बहुत सटीक तरीके से साझा की गई हैं। पहले के चार पत्रों में राजस्व और परिवहन जैसे महत्वपूर्ण सरकारी विभागों में कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के नाम, उनके मोबाइल नंबर, श्रीनगर तथा जम्मू में स्थित उनके घरों के पते और उनकी गाड़ियों के पंजीयन नंबर तक जारी कर दिए गए थे। अब इस नए पत्र में कर्मचारियों की तस्वीरें भी सार्वजनिक की गई हैं, जो यह दर्शाती हैं कि आतंकवादियों के पास स्थानीय स्तर पर कोई खुफिया तंत्र या मददगार मौजूद हैं। पत्र में प्रधानमंत्री के विशेष रोजगार और पुनर्वास पैकेज के तहत नौकरियां जारी रखने पर गंभीर दुष्परिणामों की चेतावनी दी गई है।
श्रीनगर में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों का प्रदर्शन और मांगें
यह पूरा विवाद और धमकी भरा सिलसिला तब तेज हुआ जब प्रधानमंत्री पैकेज के तहत नौकरियां पाकर घाटी में लौटे कर्मचारियों ने श्रीनगर के प्रेस एन्क्लेव में विरोध प्रदर्शन किया। ये कर्मचारी वर्तमान में निजी किराए के मकानों में रह रहे हैं और लगातार मिल रही धमकियों के कारण खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि सरकार उनके लिए निर्मित किए जा रहे सुरक्षित ट्रांजिट आवासों का आवंटन तुरंत और तेजी से करे ताकि वे सुरक्षित वातावरण में रह सकें।
प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों ने अपनी सुरक्षा और आवास आवंटन की मांगों को पूरा करने के लिए 30 सितंबर तक की समय-सीमा निर्धारित की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित तिथि तक उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे धरने पर बैठने और भूख हड़ताल करने के लिए मजबूर होंगे। इसके साथ ही उन्होंने मांग की है कि सोशल मीडिया पर उनकी व्यक्तिगत जानकारी उजागर करने वाले इस मामले में पुलिस की साइबर अपराध इकाई द्वारा एफआईआर दर्ज कर त्वरित कानूनी कार्रवाई की जाए। उन्होंने अपने कार्यस्थलों, आवासीय क्षेत्रों और दैनिक आवाजाही के मार्गों पर पर्याप्त सुरक्षा बल तैनात करने का भी आग्रह किया है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई
केंद्र सरकार, जम्मू-कश्मीर प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों ने इस पूरे मामले को आतंकवाद और मनोवैज्ञानिक युद्ध की एक गंभीर कोशिश के रूप में लिया है। अधिकारियों का मानना है कि इन धमकियों का मुख्य उद्देश्य कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की प्रक्रिया को रोकना, जनसांख्यिकीय स्थिति को सामान्य बनाने के प्रयासों को बाधित करना और घाटी के सामाजिक व प्रशासनिक जीवन में उनके एकीकरण को रोकना है। इसलिए घाटी में कार्यरत सभी अल्पसंख्यकों और पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा कर उसे कड़ा कर दिया गया है।
दूसरी ओर, जम्मू-कश्मीर की स्थानीय राजनीति में इस मुद्दे पर अलग राय भी देखने को मिली है। सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस सहित कुछ स्थानीय राजनीतिक दलों के नेताओं ने इन पत्रों के जारी होने के समय और इनकी प्रामाणिकता पर सवाल खड़े किए हैं। कुछ नेताओं का कहना है कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की चल रही राजनीतिक चर्चा के बीच ऐसी धमकियां सामने आना किसी राजनीतिक मकसद की ओर भी इशारा कर सकता है। बहरहाल, सुरक्षा एजेंसियां यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल के डिजिटल नेटवर्क, इंटरनेट प्रोटोकॉल और लोकल नेटवर्क की गहनता से जांच कर रही हैं ताकि सीमा पार बैठे आतंकियों को स्थानीय कर्मचारियों की गोपनीय जानकारी पहुंचाने वाले तत्वों का पर्दाफाश किया जा सके।





















