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सरोवर नगरी में सितंबर 2026 में सजेगा नन्दा देवी महोत्सव, सोर घाटी का लखिया भूत और पारंपरिक छोलिया नृत्य रहेंगे खास आकर्षणउत्तराखंड
15 सित॰ 2026, 2:54 pm (7 दिन पहले)· 0

सरोवर नगरी में सितंबर 2026 में सजेगा नन्दा देवी महोत्सव, सोर घाटी का लखिया भूत और पारंपरिक छोलिया नृत्य रहेंगे खास आकर्षण

नैनीताल में 16 से 23 सितंबर 2026 तक भव्य श्री नन्दा देवी महोत्सव आयोजित किया जाएगा, जिसमें मां नन्दा-सुनन्दा की पूजा के साथ पिथौरागढ़ की सोर घाटी के प्रसिद्ध लखिया भूत की झांकी और स्थानीय लोक कलाएं आकर्षण का केंद्र बनेंगी।

उत्तराखंड की प्रसिद्ध सरोवर नगरी नैनीताल में वर्ष 2026 का नन्दा देवी महोत्सव आस्था, भक्ति और कुमाऊं की समृद्ध लोकसंस्कृति के अनूठे संगम के रूप में आयोजित होने जा रहा है। इस ऐतिहासिक पर्व में जहां एक ओर मां नन्दा-सुनन्दा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और मुख्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड की विलुप्त होती लोककलाओं, पारंपरिक लोकगीतों, नृत्यों और प्राचीन मान्यताओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। इस बार के आयोजन की सबसे खास बात यह है कि पिथौरागढ़ जिले की प्रसिद्ध सोर घाटी का ऐतिहासिक 'लखिया भूत' पहली बार नैनीताल की सड़कों पर अपनी पारम्परिक झांकी के साथ जनसमुदाय के सामने प्रस्तुत होगा।

यह भव्य आयोजन श्री राम सेवक सभा के तत्वावधान में 16 सितंबर से 23 सितंबर 2026 तक आयोजित किया जाएगा। पूरे आठ दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव के दौरान कई धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, भव्य झांकियां, नगर भ्रमण, दीपदान और विविध पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। आयोजकों का प्राथमिक उद्देश्य इस सांस्कृतिक धरोहर को आज की आधुनिक पीढ़ी से जोड़ना और डिजिटल माध्यमों के जरिए पर्वतीय संस्कृति की वास्तविक पहचान को व्यापक जनमानस तक पहुंचाना है।

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पिथौरागढ़ की सोर घाटी का लखिया भूत बनेगा विशेष आकर्षण

इस वर्ष के सांस्कृतिक आयोजनों में पिथौरागढ़ की सोर घाटी के सुप्रसिद्ध 'लखिया भूत' की प्रस्तुति सबसे बड़ा आकर्षण रहने वाली है। इसे विशेष झांकी और पारंपरिक अभिनय माध्यमों के जरिए नैनीताल की सड़कों पर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के समक्ष लाया जाएगा। कुमाऊंनी लोक परंपराओं और जनमान्यता में लखिया भूत की एक विशिष्ट और पवित्र सांस्कृतिक पहचान है।

आयोजकों के अनुसार, इस तरह की लोक प्रस्तुतियों का उद्देश्य केवल जनसाधारण का मनोरंजन करना नहीं है, बल्कि इनके माध्यम से पहाड़ों की प्राचीन रीति-रिवाजों, विश्वासों और लोककथाओं को भावी पीढ़ी तक पहुंचाना है। विशेष रूप से आज के युवाओं और किशोरों में अपनी लोकसंस्कृति के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि वे अपनी जड़ों और पर्वतीय इतिहास को अधिक गहराई से समझ सकें।

युवा पीढ़ी और जेन जेड को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की पहल

नन्दा देवी महोत्सव 2026 को इस प्रकार से डिजाइन किया जा रहा है कि यह पारंपरिक मर्यादाओं को कायम रखते हुए नई पीढ़ी को आकर्षित कर सके। आयोजकों ने विशेष रूप से जेन जेड को इस महोत्सव से जोड़ने के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को इस रूप में ढाला जा रहा है कि युवा उन्हें आसानी से समझ सकें और सोशल मीडिया व विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से दुनिया भर में साझा कर सकें।

डिजिटल युग में लोक कलाओं के प्रचार-प्रसार का यह तरीका न केवल युवाओं को अपनी ओर खींच रहा है, बल्कि उत्तराखंड की लोक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने में भी मददगार साबित होगा। इस पहल के जरिए नई पीढ़ी केवल दर्शक बनकर नहीं रहेगी, बल्कि अपनी लोक संस्कृति की ब्रांड एंबेसडर बनकर उभर सकती है।

स्थानीय लोककलाएं, छोलिया नृत्य और पारंपरिक लोकगीतों की गूंज

आठ दिवसीय इस आयोजन में स्थानीय लोक कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए विशेष मंच प्रदान किया जाएगा। महोत्सव के सांस्कृतिक मंच पर उत्तराखंड की पारंपरिक गायन और नृत्य विधाओं की घूम देखने को मिलेगी, जिसमें मुख्य रूप से छोलिया नृत्य, बैर गीत, चांचरी और झोड़ा की प्रस्तुतियां शामिल हैं। कलाकार पारंपरिक कुमाऊंनी वेशभूषा और डमरू, रणसिंगा व हुड़का जैसे लोक वाद्ययंत्रों की थाप पर अपनी प्रस्तुतियां देंगे।

श्री राम सेवक सभा के सम्मानित सदस्य मुकेश जोशी मंटू ने बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक आयोजनों का संयोजन इसलिए किया गया है ताकि हमारी समृद्ध लोक परंपराएं निरंतर आगे बढ़ती रहें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्थानीय कलाकारों को प्राथमिक मंच देने के साथ-साथ राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले सांस्कृतिक दलों को भी आमंत्रित किया गया है। इस पूरे आयोजन को सुचारू रूप से संपन्न कराने में स्थानीय जिला प्रशासन और उत्तराखंड पर्यटन विभाग का पूर्ण सहयोग प्राप्त हो रहा है।

कदली वृक्ष से प्रतिमा निर्माण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश

श्री नन्दा देवी महोत्सव की सबसे पवित्र और अनिवार्य परंपराओं में से एक है कदली (केले) के वृक्ष से मां नन्दा और मां सुनन्दा की दिव्य प्रतिमाओं का निर्माण। उत्सव के निर्धारित दिवस पर पारंपरिक विधि-विधान और धार्मिक मंत्रोच्चार के साथ कदली वृक्ष को लाया जाता है, जिसके पश्चात कुशल शिल्पकार और पुजारी इसी वृक्ष के तने से मां नन्दा-सुनन्दा की मूर्तियों को गढ़ते हैं।

सभा के वरिष्ठ सदस्य प्रो. ललित तिवारी ने इस परंपरा के दार्शनिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नन्दा देवी महोत्सव केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह हिमालयी पर्यावरण, लोक परंपराओं और यहां के मानव जीवन के घनिष्ठ अंतर्संबंध का प्रतीक है। कदली वृक्ष से प्रतिमा निर्माण की यह अनूठी प्रथा यह संदेश देती है कि मानव जाति का अस्तित्व हिमालय की सुरक्षा पर टिका हुआ है। यदि हमारे पर्वत और पर्यावरण सुरक्षित रहेंगे, तभी मानव जीवन भी सुरक्षित और समृद्ध रह सकता है।

भाद्रपद अष्टमी पर प्रतिमा स्थापना, हवन और महाभंडारा

धार्मिक समय सारिणी के अनुसार, भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को ब्रह्ममुहूर्त के पावन समय के पश्चात मां नन्दा-सुनन्दा की नवनिर्मित प्रतिमाओं की विधि-विधानपूर्वक स्थापना की जाएगी। इसके बाद मुख्य पूजा, वैदिक हवन और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे। इसके उपरांत विशाल महाभंडारे का आयोजन किया जाएगा, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करेंगे।

इस प्रकार, सितंबर 2026 में आयोजित होने वाला यह महोत्सव नैनीताल में भक्तिमय वातावरण का निर्माण करने के साथ-साथ पर्यटकों और स्थानीय निवासियों को कुमाऊंनी लोक विरासत के अद्वितीय रंगों से सराबोर करेगा। परंपरा, कला और आधुनिक तकनीक के मेल से यह आयोजन उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा।

सवाल-जवाब

नैनीताल में श्री नन्दा देवी महोत्सव 2026 का आयोजन कब से कब तक होगा?
यह महोत्सव 16 सितंबर से 23 सितंबर 2026 तक सरोवर नगरी नैनीताल में आयोजित किया जाएगा।
इस वर्ष महोत्सव में पिथौरागढ़ की सोर घाटी से क्या खास लाया जा रहा है?
पिथौरागढ़ की सोर घाटी का प्रसिद्ध 'लखिया भूत' विशेष झांकी और पारंपरिक प्रस्तुति के माध्यम से नैनीताल की सड़कों पर दिखाई देगा।
मां नन्दा-सुनन्दा की प्रतिमाओं का निर्माण किस वृक्ष से किया जाता है?
धार्मिक परंपरा के अनुसार विधि-विधान से लाए गए कदली (केले) के वृक्ष के तने से मां नन्दा और सुनन्दा की प्रतिमाएं गढ़ी जाती हैं।
प्रतिमाओं की स्थापना किस दिन और किस समय संपन्न होगी?
भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को ब्रह्ममुहूर्त के पावन समय के बाद मां नन्दा-सुनन्दा की प्रतिमाओं की विधि-विधान से स्थापना की जाएगी।
महोत्सव के दौरान कौन-कौन सी लोक कलाएं देखने को मिलेंगी?
आयोजन में छोलिया नृत्य, बैर गीत, चांचरी और झोड़ा जैसी प्रसिद्ध कुमाऊंनी लोक गायन व नृत्य विधाओं की प्रस्तुतियां होंगी।
इस महोत्सव का मुख्य आयोजक कौन है?
इस महोत्सव का आयोजन श्री राम सेवक सभा द्वारा जिला प्रशासन और उत्तराखंड पर्यटन विभाग के सहयोग से किया जा रहा है।
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