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सर्व पितृ अमावस्या पर हरिद्वार के इन प्रमुख गंगा घाटों पर भी कर सकते हैं श्राद्ध और पिंडदानउत्तराखंड
9 अक्तू॰ 2026, 5:26 pm (28 दिन पहले)· 1

सर्व पितृ अमावस्या पर हरिद्वार के इन प्रमुख गंगा घाटों पर भी कर सकते हैं श्राद्ध और पिंडदान

आश्विन अमावस्या यानी 10 अक्टूबर को सर्व पितृ विसर्जन के मौके पर हरिद्वार के प्रमुख तीर्थों के अलावा अन्य गंगा घाटों पर भी तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है।

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि, जिसे सर्व पितृ विसर्जन अमावस्या कहा जाता है, 10 अक्टूबर को पड़ रही है। पूरे संवत काल के दौरान आने वाली हर अमावस्या में आश्विन मास की इस तिथि को सबसे अधिक कल्याणकारी, फलदायी और पवित्र स्थान दिया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो लोग अपने पूर्वजों की देहावसान तिथि भूल चुके हैं या जिन ज्ञात और अज्ञात पितरों का स्मरण शेष रह गया है, उन सभी के निमित्त इस पावन दिन पिंडदान, तर्पण, हवन और श्राद्ध कर्म संपन्न किए जाते हैं। ऐसा करने से पितर पूरी तरह संतुष्ट होते हैं। शास्त्रों का विधान बताता है कि पितृपक्ष के इस अंतिम पड़ाव पर पितृ लोक से पधारे सभी पूर्वज अपने परिजनों से विदा लेते हैं। इस मौके पर पूरी आस्था से किया गया दान और जलांजलि पितरों को मोक्ष दिलाती है, वहीं उनके वंशजों को पितृदोष से छुटकारा और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

पितृ कर्म के लिए धर्मनगरी के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थल

हरिद्वार की ज्योतिषाचार्य और कर्मकांड की प्रकांड पंडित हेमा शुक्ला के अनुसार, धार्मिक ग्रंथों में धर्मनगरी हरिद्वार के कुछ विशेष तीर्थ स्थलों को पितृ कार्यों के लिए सर्वोत्तम दर्जा दिया गया है। पूरे हरिद्वार में प्राचीन नारायणी शिला को पितरों के उद्धार का सबसे मुख्य केंद्र माना जाता है। इसके अतिरिक्त, हर की पौड़ी क्षेत्र में स्थित कुशावर्त घाट, ब्रह्मकुंड घाट और अस्थि विसर्जन घाट पर पितरों के नाम से किया गया श्राद्ध कर्म वंशजों को अक्षय फल प्रदान करता है। इसी तरह नीलधारा के समीप चंडी घाट पर भी पिंडदान और जलांजलि अर्पित करने से पूर्वज प्रसन्न होकर अपने लोक को प्रस्थान करते हैं। इन पवित्र स्थानों पर विधिपूर्वक अनुष्ठान संपन्न कराने से पितरों को सीधे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

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प्रमुख तीर्थों पर अत्यधिक भीड़ होने पर श्रद्धालु क्या विकल्प चुनें

सर्व पितृ विसर्जन अमावस्या के अवसर पर देश के विभिन्न कोनों और विदेशों से भी लाखों की संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचते हैं। इस भारी आवक के कारण नारायणी शिला और हर की पौड़ी के प्रमुख घाटों पर अत्यधिक भीड़ जमा हो जाती है और अनुष्ठान के लिए स्थान का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है। ऐसी स्थिति के लिए ज्योतिषाचार्य हेमा शुक्ला बताती हैं कि यदि श्रद्धालुओं को मुख्य धार्मिक स्थलों पर बैठने या कर्मकांड कराने की जगह न मिल पाए, तो उन्हें कतई व्यथित होने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी कारणवश मुख्य स्थलों पर पूजा संभव न हो, तो श्रद्धालु हरिद्वार में गंगा के किसी भी अन्य घाट पर पितरों के निमित्त हवन, तर्पण और पिंडदान संपन्न करा सकते हैं। गंगा के किसी भी पावन तट पर श्रद्धाभाव से किए गए इन अनुष्ठानों से भी पितरों की तृप्ति होती है और वे सुखपूर्वक अपने लोक लौट जाते हैं।

सवाल-जवाब

सर्व पितृ विसर्जन अमावस्या किस तिथि को है?
सर्व पितृ विसर्जन अमावस्या 10 अक्टूबर को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ रही है।
इस दिन किन पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है?
इस दिन सभी ज्ञात-अज्ञात, भूले-बिसरे और जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, उन सभी पूर्वजों के निमित्त कर्मकांड किए जाते हैं।
हरिद्वार में पितृ उद्धार के लिए सबसे प्रमुख स्थल कौन सा है?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार हरिद्वार में प्राचीन नारायणी शिला पितृ उद्धार का सबसे मुख्य स्थल है।
हर की पौड़ी क्षेत्र के कौन से घाट पितृ कर्म के लिए बताए गए हैं?
हर की पौड़ी के कुशावर्त घाट, ब्रह्मकुंड घाट और अस्थि विसर्जन घाट पर श्राद्ध कर्म करने का विधान है।
यदि मुख्य तीर्थ स्थलों पर बहुत भीड़ हो तो क्या करें?
यदि प्रमुख स्थलों पर जगह न मिले तो श्रद्धालु हरिद्वार में गंगा के किसी भी अन्य घाट पर पिंडदान और तर्पण करा सकते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rohan Gupta@rohan-gupta·27 दिन पहले

पिछली बार भीड़ देखकर नारायणी शिला से वापस लौटना पड़ा था। अच्छा है कि किसी भी घाट पर तर्पण करने का विकल्प मिल गया।

Ravikash Gupta@ravikash·27 दिन पहले

भीड़भाड़ से बचने के लिए दूसरे घाटों का विकल्प बहुत सही है, मन की श्रद्धा मुख्य है स्थान नहीं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·27 दिन पहले

रविकेश जी, आपकी बात ठीक है पर हरिद्वार में मुख्य घाटों की अपनी मान्यता है, हर जगह एक जैसा फल कैसे मिल सकता है?

Karan Malhotra@karan-malhotra·27 दिन पहले

भीड़भाड़ के चक्कर में परेशान होने की जरूरत नहीं है, वैसे भी हरिद्वार में गंगा किनारे हर जगह उतनी ही पवित्रता मिलती है जितनी मुख्य घाटों पर।

Rohan Verma@rohan-verma·27 दिन पहले

करण भाई, बिल्कुल सही कहा आपने। पिछली बार भीड़ देखकर मैं कुशावर्त घाट की बजाय पास के ही एक छोटे घाट पर चला गया था, वहाँ सचमुच बहुत शांति से पूजा हो गई थी।

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