मानसून की बारिश के साथ ही गन्ने की खेती करने वाले किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती सामने आती है। इस मौसम में गन्ने की फसल पर लाल सड़न रोग, जिसे रेड रॉट भी कहा जाता है, का प्रकोप तेजी से बढ़ने लगता है। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर स्थित गन्ना शोध संस्थान के प्रसार अधिकारी डॉ संजीव कुमार पाठक ने बताया है कि अगर सही समय पर ध्यान न दिया जाए, तो यह विनाशकारी बीमारी पूरे के पूरे खेत को सुखाकर नष्ट कर सकती है। खासकर जब पास के किसी खेत में यह संक्रमण फैल चुका हो, तो पड़ोसी किसानों को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होती है। खेत में जलभराव और बहता हुआ पानी इस रोग को एक जगह से दूसरी जगह फैलाने का मुख्य माध्यम बनता है, इसलिए शुरुआती लक्षणों को पहचानकर तत्काल रोकथाम के कदम उठाना अनिवार्य है।
लाल सड़न रोग की समय पर पहचान और शुरुआती संकेत
गन्ने में लाल सड़न रोग का शुरुआती संक्रमण तो मार्च या अप्रैल के दौरान बुआई के तुरंत बाद ही शुरू हो जाता है, लेकिन इसके लक्षण स्पष्ट रूप से मानसून के दौरान दिखाई देते हैं। बारिश के दिनों में जब पौधे में तेजी से वृद्धि होती है, तब पत्तियां अपना रंग बदलने लगती हैं। गन्ने के अगोले की तीसरी और चौथी पत्ती, जिसे पौधे की मुख्य सक्रिय पत्ती माना जाता है, पर इसका प्रभाव सबसे पहले नजर आता है। इन पत्तियों के किनारे धीरे-धीरे सूखना शुरू होते हैं। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, पूरा अगोला सूखकर भूरा और पीला पड़ जाता है। किसानों को चाहिए कि वे अपने खेतों का नियमित निरीक्षण करते रहें और पत्तियों के सूखने के संकेत मिलते ही सतर्क हो जाएं।
तने को चीरकर करें पक्की जांच और प्रमुख लक्षण
यदि पत्तियों के सूखने पर संशय हो, तो इस बीमारी की पक्की और सटीक पहचान गन्ने के तने की अंदरूनी स्थिति से की जाती है। प्रभावित गन्ने के तने को बीच से फाड़कर देखने पर अंदर का गूदा गहरा लाल दिखाई देता है। इस लाल रंग के गूदे के बीच-बीच में सफेद रंग के आड़े धब्बे स्पष्ट रूप से बने होते हैं। यह सफेद धब्बे और लाल गूदा रेड रॉट की उपस्थिति का अचूक प्रमाण हैं। फंगस के कारण तने की अंदरूनी कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं, जिससे पौधे में पानी और पोषक तत्वों का संवहन पूरी तरह रुक जाता है। यही कारण है कि स्वस्थ दिखने वाला गन्ना भी अचानक सूखने लगता है।
संक्रमित पौधों को उखाड़कर नष्ट करने की सही प्रक्रिया
खेत में अगर एक या दो पौधों में भी लाल सड़न के लक्षण दिखाई दें, तो बिना किसी ढिलाई या संकोच के तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। किसान को प्रभावित गन्ने के पूरे थान को जड़ सहित उखाड़ लेना चाहिए। उखाड़े गए बीमार पौधों को खेत के अंदर छोड़ने की बजाय खेत से काफी दूर ले जाकर किसी गड्ढे में दबाकर या जलाकर पूरी तरह नष्ट कर देना चाहिए। पौधे को उखाड़ने के बाद उस स्थान पर मिट्टी में मौजूद रोगाणुओं को खत्म करने के लिए 10 से 20 ग्राम ब्लीचिंग पाउडर डालना बहुत जरूरी है। ब्लीचिंग पाउडर डालने के बाद उस जगह को ताजी मिट्टी से ढक देना चाहिए ताकि आसपास के स्वस्थ पौधों की जड़ों तक फंगस न पहुंचे।
खेतों की मजबूत मेड़बंदी और बहते पानी पर रोक
रेड रॉट बीमारी का फंगल संक्रमण खेत में बहते हुए बरसाती पानी के साथ बहुत तेजी से एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचता है। यदि पड़ोसी के खेत में यह रोग लग चुका है, तो वहां का पानी बहकर आपके खेत में आने पर पूरा खेत संक्रमित हो सकता है। इससे बचने के लिए अपने खेत की चारों दिशाओं में मजबूत मेड़बंदी करना अनिवार्य है। खेत के पानी को बाहर जाने से रोकने और बाहरी पानी को अंदर आने से रोकने से बीमारी का फैलाव तुरंत थम जाता है। अपनी फसल की सुरक्षा के साथ-साथ यह कदम आसपास के अन्य खेतों को भी तबाही से बचाने में मदद करता है।
ट्राइकोडर्मा से जैविक मृदा उपचार और दीर्घकालिक सुरक्षा
फसल को फंगल संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए मिट्टी का जैविक उपचार एक अत्यंत प्रभावी माध्यम है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून के दौरान खेत की मिट्टी में 5 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति एकड़ की दर से मिला देना चाहिए। ट्राइकोडर्मा एक मित्र फंगस है जो मिट्टी में पनपने वाले हानिकारक रोगजनक फंगस को स्वाभाविक रूप से समाप्त कर देता है। बरसात के समय जब मिट्टी में पर्याप्त नमी होती है, तब ट्राइकोडर्मा का प्रयोग करने से मृदा संक्रमण पर तेजी से रोक लगती है और गन्ने की फसल लंबे समय तक स्वस्थ बनी रहती है। समय पर सही प्रबंधन करके किसान अपनी मेहनत और लागत दोनों को सुरक्षित रख सकते हैं।



















