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शंकराचार्य मंदिर मार्ग पर मजार के जीर्णोद्धार पर गरमाई सियासत, उठे गंभीर सवालजम्मू-कश्मीर
29 अक्तू॰ 2026, 10:07 pm (8 दिन पहले)· 5

शंकराचार्य मंदिर मार्ग पर मजार के जीर्णोद्धार पर गरमाई सियासत, उठे गंभीर सवाल

शंकराचार्य मंदिर के रास्ते पर स्थित एक मजार के नवीनीकरण को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा और लोक जनशक्ति पार्टी ने इस पर सवाल उठाए हैं, जबकि ग्रैंड मुफ्ती ने इसे ऐतिहासिक स्थल बताया है।

जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर के प्रसिद्ध शंकराचार्य मंदिर तक जाने वाले मार्ग पर स्थित एक मजार और कब्रिस्तान के जीर्णोद्धार को लेकर राजनीतिक और धार्मिक हलकों में बहस छिड़ गई है। डल झील के करीब जबरवान पहाड़ियों में स्थित इस स्थल के नवीनीकरण के लिए प्रशासन द्वारा उठाए गए कदमों पर कई पक्षों ने आपत्ति जताई है, जबकि स्थानीय धार्मिक नेताओं ने इसका समर्थन किया है।

विवाद की मुख्य वजह

यह पूरा मामला शंकराचार्य मंदिर से करीब 3 किलोमीटर पहले सड़क के किनारे स्थित 'सैय्यद उस्मान साहिब' की मजार से जुड़ा है। प्रशासन ने इस जंगली क्षेत्र में स्थित कब्रिस्तान और मजार के विकास व नवीनीकरण कार्य के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ठेका दे दिया था। इस जगह पर कई कब्रें और एक बड़ी मजार बनी हुई है, जिसके पास पहले एक साइनबोर्ड भी लगाया गया था। हालांकि, बढ़ते विवाद के बाद उस बोर्ड से नाम हटा दिया गया और फिलहाल राजस्व विभाग को मामला सौंपे जाने के कारण काम रोक दिया गया है।

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कश्मीरी पंडितों और भाजपा की आपत्ति

कश्मीरी पंडित संगठनों ने सबसे पहले इस निर्माण कार्य के खिलाफ आवाज उठाई। उनका तर्क है कि यह ढांचा नया है और पहले यहां ऐसा कोई स्थान मौजूद नहीं था। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी की स्थानीय इकाई ने भी इस प्रोजेक्ट के लिए 44.37 लाख रुपये की राशि मंजूर किए जाने पर नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार से तीखे सवाल पूछे। भाजपा नेताओं का कहना है कि यह कोई प्राचीन स्थल नहीं है और वहां दिखने वाली कब्रें हाल ही में बनाई गई हैं।

भाजपा और अन्य नेताओं के आरोप

भाजपा प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने आरोप लगाया कि नेशनल कॉन्फ्रेंस का पुराना इतिहास ऐसे मामलों में संदिग्ध रहा है। उन्होंने कहा कि पार्टी ने पहले भी शंकराचार्य पहाड़ी को 'तख्त-ए-सुलेमान' और हरि पर्वत को 'कोह-ए-मरान' जैसे नामों से पुकारा है। प्रशासन को यह स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि इस निर्माण का उद्देश्य क्या है, इसे किसने मंजूरी दी और इसके लिए किसने प्रस्ताव रखा। लोक जनशक्ति पार्टी के नेता संजय सराफ ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बताया कि वह पिछले तीन दशकों से इस रास्ते से आ-जा रहे हैं, लेकिन हाल ही में उन्हें इस कथित जियारत के बारे में पता चला। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां क्रेट रखकर और उस पर कपड़ा डालकर उसे नया रूप देने की कोशिश की जा रही है, जबकि यदि कोई पुराना रिकॉर्ड है तो वह पारदर्शी तरीके से सामने आना चाहिए।

धार्मिक गुरुओं और स्थानीय लोगों का पक्ष

दूसरी तरफ, कश्मीर के ग्रैंड मुफ्ती नासिर-उल-इस्लाम ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि यह कब्रिस्तान और मजारें बेहद पुरानी हैं। उन्होंने बताया कि वहां सैयद असदुल्लाह बुखारी और सैयद उस्मान साहब की कब्रें हैं, जो हजरत मीर सैयद अली हमदानी के साथी थे। मुफ्ती ने कहा कि इस मामले का शंकराचार्य या वन भूमि से कोई लेना-देना नहीं है और इस ऐतिहासिक धरोहर के जीर्णोद्धार के काम में बाधा डालने से लोगों की भावनाएं आहत हो सकती हैं।

सवाल-जवाब

यह विवाद किस जगह से जुड़ा है?
यह विवाद श्रीनगर में डल झील के पास जबरवान पहाड़ियों में शंकराचार्य मंदिर जाने वाले रास्ते पर स्थित एक मजार से जुड़ा है।
इस नवीनीकरण परियोजना के लिए कितनी राशि स्वीकृत की गई थी?
इस परियोजना के लिए 44.37 लाख रुपये की राशि मंजूर की गई थी।
किन राजनीतिक दलों ने इस पर सवाल उठाए हैं?
भारतीय जनता पार्टी और लोक जनशक्ति पार्टी ने इस निर्माण कार्य और फंड आवंटन पर सवाल उठाए हैं।
ग्रैंड मुफ्ती नासिर-उल-इस्लाम का इस बारे में क्या कहना है?
ग्रैंड मुफ्ती का कहना है कि यह मजार पुरानी है और वहां सैयद असदुल्लाह बुखारी और सैयद उस्मान साहब की कब्रें मौजूद हैं।
फिलहाल इस मामले में क्या कार्रवाई की गई है?
मामला राजस्व विभाग को सौंपे जाने के कारण फिलहाल वहां कोई निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Amit Patel@amit-patel·7 दिन पहले

मैं पिछले महीने ही उस रास्ते से शंकराचार्य मंदिर गया था, वहाँ सचमुच ऐसा कोई ढांचा ध्यान में नहीं आया था। चुनाव के वक्त ऐसी बातें अचानक क्यों उठ खड़ी होती हैं?

Arjun Mehta@arjun-mehta·7 दिन पहले

साइनबोर्ड से नाम हटाना — यह 'हम कुछ गलत नहीं कर रहे' वाला रवैया नहीं लगता।

Ravikash Gupta@ravikash·7 दिन पहले

Arjun भाई, आपकी बात समझ आती है — पर बोर्ड हटाना शायद विवाद से बचने की कोशिश भी हो सकती है, सबूत मिटाने की नीयत ज़रूरी नहीं। असली सवाल तो टेंडर और मंज़ूरी का है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·7 दिन पहले

रास्ते की पुरानी मजारों पर अचानक से फंड कैसे मिलने लगा, इस पर थोड़ा शक है मुझे।

Rohan Verma@rohan-verma·7 दिन पहले

करण भाई, यूपी में भी विकास के नाम पर ऐसे ही अचानक नए बोर्ड और ढांचे खड़े होने लगते हैं, शक होना लाजिमी है।

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