धान की सीधी बुवाई (DSR) प्रणाली अपनाने वाले किसानों के सामने मोथा घास एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रही है। इसे फसलों के लिए एक साइलेंट किलर माना जाता है क्योंकि यह बहुत तेजी से फैलकर मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों को खुद सोख लेती है। इसके चलते धान के पौधे कमजोर पड़ने लगते हैं और अंततः सूख जाते हैं, जिससे पूरी पैदावार पर बेहद बुरा असर पड़ता है।
खड़ी फसल में रासायनिक छिड़काव का सही तरीका
किसान सलाहकार चंद्रभूषण पांडे का कहना है कि सिर्फ रासायनिक दवाओं पर निर्भर रहकर इस जिद्दी खरपतवार से छुटकारा नहीं पाया जा सकता। इसके लिए एकीकृत प्रबंधन अपनाना जरूरी है। जब फसल खेत में खड़ी हो, तब हेलोसल्फ्यूरॉन मिथाइल 75% WG का प्रयोग प्रभावी साबित होता है। इस दवा का छिड़काव करते समय खेत में हल्की नमी होना आवश्यक है, ताकि दवा सीधे जड़ों तक पहुंच सके और पौधे पर तुरंत असर दिखाए।
जमीन के नीचे छिपी गांठों पर ऐसे करें हमला
मोथा घास की असली ताकत जमीन के नीचे बनी इसकी गांठें या ट्यूबर होती हैं। अगर ऊपर से पौधे को काट या उखाड़ भी दिया जाए, तो जमीन में दबी गांठें पूरी तरह सुरक्षित रहती हैं और कुछ ही दिनों में दोबारा पनप जाती हैं। चंद्रभूषण पांडे के अनुसार, धान की कटाई के बाद जब खेत खाली हो जाए, तब ग्लाइफोसेट का छिड़काव करना चाहिए। यह दवा पौधे के निचले हिस्से और जड़ों तक पहुंचकर इन गांठों को नष्ट कर देती है।
जैविक उपाय और गहरी जुताई से पाएं राहत
किसान सलाहकार अवनीश पटेल के मुताबिक, समय-समय पर की जाने वाली निराई-गुड़ाई भी इस घास के विकास चक्र को तोड़ने में काफी कारगर है। खुरपी से घास को जड़ समेत उखाड़ने पर जमीन के अंदर की गांठें बाहर आ जाती हैं, जिससे इसका दोबारा उगना मुश्किल हो जाता है। जैविक खेती करने वाले किसानों के लिए यह एक सुरक्षित तरीका है। इसके अलावा, गर्मी के मौसम में खेत की गहरी जुताई करना बहुत फायदेमंद रहता है। तेज धूप में जमीन के अंदर छिपी गांठें बाहर आकर सूख जाती हैं और हमेशा के लिए खत्म हो जाती हैं।



















