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सीमा विवाद के बीच मुकरोह में असम का सर्वे रुका, निवासी मेघालय का हिस्सा होने का दावा करते हैंअसम
15 सित॰ 2026, 5:40 pm (16 दिन पहले)· 1

सीमा विवाद के बीच मुकरोह में असम का सर्वे रुका, निवासी मेघालय का हिस्सा होने का दावा करते हैं

असम-मेघालय सीमा पर स्थित विवादित गाँव मुकरोह में सोमवार घरों से जानकारी जुटाने की कार्रवाई को स्थानीय खासी निवासियों ने रोक दिया। उनका पक्ष है कि गाँव असम या करबी आंगलोंग ऑटोनॉमस काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में नहीं, बल्कि मेघालय में आता है।

शिलांग: असम और मेघालय की सीमा पर बसे विवादित गाँव मुकरोह में सोमवार असम के अधिकारियों को घर-घर जानकारी जुटाने की कार्रवाई करने नहीं दिया गया। स्थानीय निवासियों ने कहा कि इलाका मेघालय के अधिकार क्षेत्र में आता है, असम के अंतर्गत नहीं।

घर-घर जानकारी संकलन पर आपत्ति

असम सरकार के अधिकारी गाँव के घरों से जनसंख्या-संबंधी विवरण इकट्ठा कर रहे थे। यह कार्रवाई केवल इलाके का दौरा नहीं थी, बल्कि अलग-अलग घरों से जानकारी लेने से जुड़ी थी। मेघालय में बस्ती को मुकरोह और असम में मोकरू कहा जाता है।

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स्थानीय खासी समुदाय के लोगों ने अधिकारियों की मौजूदगी का विरोध किया और गणना में सहयोग करने से साफ इनकार कर दिया। उनके विरोध के कारण कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। उनका पक्ष है कि मुकरोह न तो असम के प्रशासनिक नियंत्रण में है और न ही करबी आंगलोंग ऑटोनॉमस काउंसिल (KAAC) के अधिकार क्षेत्र में आता है।

गणनाकर्ता को नुकसान पहुंचाने का आरोप

मुठभेड़ के दौरान एक गणनाकर्ता को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकी देने का आरोप सामने आया। इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी, इसलिए धमकी से जुड़ा आरोप स्थापित नहीं माना जा सकता।

मेघालय से मदद के पुराने संबंध

निवासी मेघालय प्रशासन से अपने लंबे समय से जुड़े होने की बात करते हैं और कहते हैं कि सालों से उन्हें राज्य की ओर से सरकारी सहायता मिलती रही है। उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत आवासीय लाभ मिलने का खास हवाला दिया। उनका दावा है कि असम की ओर से ऐसी समान सहायता नहीं मिली। यही संबंध उनके लिए मेघालय से अपनी प्रशासनिक पहचान जोड़ने का आधार बनता है।

सीमा विवाद फिर चर्चा में

स्थानीय समुदाय का मानना है कि वह न करबी आंगलोंग ऑटोनॉमस काउंसिल और न असम प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसी विचार ने घरों से जानकारी संकलन के विरोध को दिशा दी। सोमवार की घटना ने मुकरोह की विवादित हैसियत को फिर से ध्यान में ला दिया है। गाँव अभी भी असम और मेघालय के बीच लंबे समय से चल रहे व्यापक सीमा विवाद का हिस्सा है।

सवाल-जवाब

मुकरोह में सोमवार कौन सी कार्रवाई रोकी गई?
असम के अधिकारियों को घरों से जनसंख्या-संबंधी जानकारी इकट्ठी करने से रोका गया। स्थानीय निवासियों ने अधिकारियों के साथ सहयोग करने से इनकार कर दिया।
मुकरोह गाँव कहां स्थित है?
गाँव असम और मेघालय की सीमा पर स्थित है और उसकी प्रशासनिक हैसियत विवादित है।
गाँव को असम और मेघालय में किस नाम से जाना जाता है?
मेघालय में इसे मुकरोह कहा जाता है, जबकि असम में इसी बस्ती को मोकरू कहा जाता है।
निवासियों ने जानकारी संकलन में सहयोग क्यों नहीं किया?
उनका दावा है कि गाँव असम या करबी आंगलोंग ऑटोनॉमस काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में नहीं, बल्कि मेघालय में आता है। इसलिए उन्होंने अधिकारियों का विरोध किया।
क्या गणनाकर्ता को धमकी देने का आरोप साबित हुआ?
नहीं। एक गणनाकर्ता को शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकी देने का आरोप लगा, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी।
निवासियों ने मेघालय से किस सहायता का हवाला दिया?
उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत आवासीय लाभ मिलने की बात कही। उनका दावा है कि असम से ऐसी समान सहायता नहीं मिली।
मुकरोह का मामला किस बड़े विवाद से जुड़ा है?
यह असम और मेघालय के बीच लंबे समय से चल रहे व्यापक सीमा विवाद का हिस्सा है। सोमवार की घटना ने गाँव की विवादित हैसियत को फिर चर्चा में ला दिया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·14 दिन पहले

पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्रीय सिनेमा अक्सर सीमावर्ती क्षेत्रों के जटिल मुद्दों और स्थानीय जनजीवन से गहराई से जुड़े होते हैं। मुकरोह जैसी घटनाओं का असर न केवल प्रशासन पर पड़ता है, बल्कि यह क्षेत्रीय फिल्म निर्माण, सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण और ग्राउंड शूटिंग के लिए भी बड़ी चुनौतियाँ खड़ी करता है। उत्तर-पूर्वी सिनेमा और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर उभरती कहानियाँ इसी तरह के जमीनी प्रशासनिक तनावों और पहचान के संघर्ष को दर्शाती हैं। मीडिया और फिल्म जगत को ऐसे संवेदनशील विषयों को बिना सनसनी फैलाए, क्षेत्रीय बारीकियों के साथ प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·14 दिन पहले

सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशासनिक अस्पष्टता और क्षेत्राधिकार के विवाद न केवल शासन व्यवस्था के लिए चुनौती बनते हैं, बल्कि स्थानीय आर्थिक विकास और सरकारी योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन को भी प्रभावित करते हैं। मुकरोह की घटना यह दर्शाती है कि जब तक प्रशासनिक सीमाएं स्पष्ट नहीं होंगी, तब तक जन कल्याणकारी योजनाओं का वितरण और सीमांत इलाकों में विकास तथा स्थिरता बनाए रखना एक जटिल कार्य बना रहेगा।

Vikram Yadav@vikram-yadav·14 दिन पहले

रविकाश जी के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह घटना स्पष्ट करती है कि सीमांत क्षेत्रों में क्षेत्राधिकार का विवाद केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक साख और नागरिक विश्वास का विषय है। जब स्थानीय आबादी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ के आधार पर अपनी राज्य से संबद्धता तय करती है, तब एकतरफा प्रशासनिक प्रयास या सर्वे आपसी अविश्वास और प्रतिरोध को जन्म देते हैं। आगे चलकर यदि दोनों राज्य संयुक्त समन्वय तंत्र और पूर्व-संवाद स्थापित किए बिना कोई कदम उठाएंगे, तो ऐसी ज़मीनी झड़पें बार-बार दोहराई जाएंगी। स्थायी समाधान के लिए पारदर्शी प्रशासनिक संवाद और संयुक्त समीक्षा ही एकमात्र रास्ता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·14 दिन पहले

संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में बिना पूर्व अंतरराज्यीय पुलिस समन्वय और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के प्रशासनिक सर्वे या जनसांख्यिकीय डेटा संकलन शुरू करना कानून-व्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम पैदा करता है। मुकरोह जैसे विवादित इलाकों में स्थानीय विरोध और गणनाकर्ताओं को मिली कथित धमकियाँ दर्शाती हैं कि प्रशासनिक मतभेद कभी भी हिंसक झड़प में बदल सकते हैं। सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने और जमीनी स्तर पर टकराव रोकने के लिए दोनों राज्यों के प्रशासन को कानूनी स्पष्टता और संयुक्त सुरक्षा रणनीति के साथ ही ऐसे अभियानों को आगे बढ़ाना चाहिए।

Arjun Mehta@arjun-mehta·14 दिन पहले

करण की बात को आगे बढ़ाते हुए, यह घटना दर्शाती है कि उच्च स्तरीय सीमा वार्ताओं और जमीनी प्रशासनिक कार्रवाइयों के बीच कितना अंतर है। विवादित क्षेत्रों में बिना द्विपक्षीय राजनीतिक सहमति के कोई भी जनसांख्यिकीय सर्वे या योजना वितरण पहचान के संवेदनशील मुद्दों को भड़का सकता है। जब तक दोनों राज्य अंतर-राज्यीय सीमा समझौतों के तहत एक स्पष्ट अंतरिम ढांचा लागू नहीं करते, तब तक ऐसे एकतरफा कदम क्षेत्रीय शांति और वार्ता प्रक्रिया को बाधित करेंगे।

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