पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में बीजेपी कार्यकर्ता सुजीत मंडल हत्याकांड के मुख्य आरोपी का एनकाउंटर, अस्पताल में मौतपश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना में नाबालिग से दुष्कर्म और ब्लैकमेल का मामला, बागुईआटी थाने में शिकायत दर्जराशिफल 29 अक्टूबर: उच्च के चंद्रमा के प्रभाव से 8 राशियों की बदलेगी किस्मत, हर तरफ से मिलेंगे लाभ के संकेतबिक्रम सिंह मजीठिया की कानूनी मुश्किलें गहरी, आय से अधिक संपत्ति मामले में दाखिल हुई सप्लीमेंट्री चार्जशीटसीवर और सेप्टिक टैंक सफाई के दौरान जान गंवाने वालों के परिजनों को मिलेगा 30 लाख मुआवजा, सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देशमूलांक 4 दैनिक अंकज्योतिष 29 अक्टूबर: डिजिटल लेन-देन में बरतें सावधानी, जल्दबाजी से बचेंमुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के लिए धारा 18 बनी ढाल, सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने रखा अपना पक्षचार राज्यों के विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस को करारा झटका, बीजेपी और सपा का दबदबाअमेरिकी मध्यावधि चुनावों में एलन मस्क का बड़ा दांव, झोंके 7.6 करोड़ डॉलरमूलांक 2 राशिफल 29 अक्टूबर 2026: दिल की बातों और पैसों के लेन-देन में बरतें सावधानी
सुनील यादव की हत्या की जांच में उलझी बलिया पुलिस, अदालत ने तीन नामजद आरोपियों को हिरासत में देने से किया इनकारउत्तर प्रदेश
22 जुल॰ 2026, 12:32 am (99 दिन पहले)· 1

सुनील यादव की हत्या की जांच में उलझी बलिया पुलिस, अदालत ने तीन नामजद आरोपियों को हिरासत में देने से किया इनकार

विशेष न्यायाधीश की अदालत ने पुलिस की उस दलील को खारिज कर दिया है जिसमें तीन आरोपियों को एक ही गैंग का बताकर पूछताछ के लिए कस्टडी मांगी गई थी। बचाव पक्ष ने साबित किया कि ये सभी आपस में कट्टर दुश्मन हैं।

बलिया जिले में पिछले साल हुए बहुचर्चित सुनील यादव हत्याकांड की जांच कर रही पुलिस टीम को एक बड़ा कानूनी झटका लगा है। विशेष न्यायाधीश (गैंगस्टर एक्ट) की अदालत ने पुलिस की उस अहम याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें तीन नामजद आरोपियों की कस्टडी रिमांड की मांग की गई थी। इस फैसले से पुलिस की जांच रणनीति पर सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि अदालत ने जांच अधिकारियों द्वारा पेश की गई दलीलों को हिरासत के लिए नाकाफी करार दिया।

पुलिस की पूछताछ योजना पर फिरा पानी

पुलिस महकमे ने गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज मुक़दमे की गहन पड़ताल के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। जांच अधिकारियों का मुख्य मकसद पंकज राय, लक्ष्मी नारायण चौबे और श्रवण दूबे उर्फ छोटक दूबे को पुलिस हिरासत में लेकर पूछताछ करना था। अभियोजन पक्ष की तरफ से अदालत को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया गया कि ये तीनों व्यक्ति एक ही आपराधिक गिरोह के सक्रिय सदस्य हैं। पुलिस का तर्क था कि इस गिरोह के पूरे नेटवर्क और हत्याकांड के पीछे की गहरी साजिश का पर्दाफाश करने के लिए इन तीनों से आमने-सामने की विस्तृत पूछताछ नितांत आवश्यक है।

ये भी पढ़ें

बचाव पक्ष ने थ्योरी में निकाली खामी

हालांकि, बचाव पक्ष के वकील ने पुलिस की इस पूरी कहानी पर ही जोरदार प्रहार किया। आरोपियों की तरफ से अदालत में पैरवी कर रहे अधिवक्ता केशव नारायण पांडेय उर्फ सुनील ने पुलिस के दावों की धज्जियां उड़ा दीं। उन्होंने न्यायाधीश के समक्ष जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य रखा, वह पुलिस की 'एक ही गैंग' वाली थ्योरी के बिल्कुल उलट था। अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि जिन लोगों को पुलिस एक ही आपराधिक सिंडिकेट का हिस्सा साबित करने पर तुली है, जमीनी हकीकत में वे एक-दूसरे के धुर विरोधी गुटों से ताल्लुक रखते हैं। बचाव पक्ष के अनुसार, ये तीनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन हैं, ऐसे में उनका एक ही गिरोह में साथ मिलकर काम करना पूरी तरह से अतार्किक और तथ्यों के विपरीत है।

सबूतों के अभाव में अर्जी खारिज

बचाव पक्ष के वकील यहीं नहीं रुके। उन्होंने पुलिस द्वारा सौंपे गए सबूतों की भी कड़ी आलोचना की। उन्होंने दलील दी कि पुलिस की तरफ से ऐसा कोई भी ठोस आधार या पुख्ता साक्ष्य रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया है, जो इन आरोपियों को पुलिस रिमांड पर भेजने को उचित ठहरा सके। दोनों पक्षों की लंबी बहस सुनने और पत्रावली पर मौजूद तमाम दस्तावेजों का बारीकी से परीक्षण करने के बाद, अदालत ने पुलिस के तर्कों को वजनदार नहीं माना और रिमांड अर्जी को निरस्त कर दिया। कानूनी जानकारों का मानना है कि रिमांड याचिका का इस तरह खारिज होना जांच एजेंसी के लिए एक बड़ी विफलता है।

गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई पर उठते सवाल

गैंगस्टर एक्ट जैसे गंभीर कानून के तहत पुलिस की कार्रवाई पर अदालत का यह रुख बेहद मायने रखता है। आमतौर पर ऐसे संगीन मामलों में पुलिस को आरोपियों से पूछताछ के लिए कस्टडी मिल जाती है, लेकिन इस मामले में बचाव पक्ष ने पुलिस की बुनियादी थ्योरी में ही छेद कर दिया। विरोधी गुटों के सदस्यों को एक ही गैंग का हिस्सा बताने की पुलिस की चूक उनके लिए भारी पड़ गई। इस अदालती आदेश के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली और सबूत इकट्ठा करने के तरीके पर भी उंगलियां उठने लगी हैं। अब पुलिस महकमे को अदालत के सामने अपने केस को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ेगी, क्योंकि बिना ठोस साक्ष्यों के गैंगस्टर एक्ट के तहत आरोपियों को सजा दिलाना एक टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। फिलहाल, इस मामले में कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह से अदालत के आगामी निर्देशों के अधीन ही आगे बढ़ेगी।

क्या है सुनील यादव मर्डर केस?

इस पूरे मामले की जड़ें पिछले साल की एक खौफनाक वारदात से जुड़ी हैं। 20 सितंबर 2025 को बलिया के हल्दी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली नीरुपुर चट्टी पर एक सनसनीखेज वारदात को अंजाम दिया गया था। टेंट का व्यवसाय करने वाले सुनील यादव को सरेआम गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया था। उस निर्मम हत्या के बाद इलाके में भारी तनाव फैल गया था। इसी जघन्य अपराध को आधार बनाकर स्थानीय पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ शिकंजा कसने के लिए गैंगस्टर एक्ट की धाराएं लगाई थीं। लेकिन अब रिमांड न मिलने से पुलिस को अपनी जांच आगे बढ़ाने के लिए नए सिरे से सबूत जुटाने और कानूनी विकल्प तलाशने होंगे।

सवाल-जवाब

अदालत ने पुलिस की रिमांड अर्जी क्यों खारिज की?
अदालत ने पुलिस द्वारा पेश किए गए सबूतों और तर्कों को रिमांड देने के लिए अपर्याप्त माना। बचाव पक्ष ने यह साबित किया कि आरोपी एक ही गैंग के नहीं बल्कि अलग-अलग गुटों के हैं।
पुलिस किन आरोपियों की रिमांड मांग रही थी?
पुलिस पंकज राय, लक्ष्मी नारायण चौबे और श्रवण दूबे उर्फ छोटक दूबे को हिरासत में लेकर पूछताछ करना चाहती थी।
सुनील यादव कौन थे और उनके साथ क्या हुआ था?
सुनील यादव बलिया के नीरुपुर चट्टी इलाके के एक टेंट व्यवसायी थे, जिनकी 20 सितंबर 2025 को सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
बचाव पक्ष के वकील ने क्या अहम दलील दी?
वकील केशव नारायण पांडेय ने कहा कि पुलिस जिन लोगों को एक गैंग का सदस्य बता रही है, वे असल में कट्टर दुश्मन और विरोधी गुटों के सदस्य हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp