गांधी जयंती के राष्ट्रीय पर्व पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके शाश्वत दर्शन को फिर से याद किया गया है। पूरे देश में दो अक्टूबर के अवसर पर आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों के बीच बापू के स्थापित मानवीय मूल्यों की प्रासंगिकता पर विशेष बल दिया जा रहा है। सत्य, करुणा और निस्वार्थ भाव से समाज सेवा करने की गांधीवादी विचारधारा को आज के दौर में भी समाज को दिशा दिखाने वाला मजबूत आधार माना गया है।
प्रधानमंत्री का प्रेरणादायी संदेश और श्लोक
इस राष्ट्रीय अवसर पर सोशल मीडिया मंच X पर साझा किए गए अपने संदेश में नरेंद्र मोदी ने बापू के संपूर्ण जीवन दर्शन को याद किया। उन्होंने रेखांकित किया कि बापू का पूरा जीवन सत्य, अहिंसा, करुणा और जनसेवा का एक ऐसा उज्ज्वल प्रकाशस्तंभ रहा है, जो प्रत्येक युग में पूरी मानव जाति को सही दिशा दिखाता रहेगा।
अपने विचार व्यक्त करने के साथ ही उन्होंने एक प्राचीन श्लोक भी साझा किया, जो सभी प्राणियों के प्रति विद्वेष से मुक्ति, करुणा, ममता के त्याग, अहंकार रहित जीवन और सुख-दुख में समान भाव रखने की शिक्षा देता है। यह संदेश इस बात को पुष्ट करता है कि वास्तविक सामाजिक शक्ति और श्रेष्ठता भीतर के समभाव और क्षमाशीलता से ही संभव है।
सत्य और अहिंसा के मार्ग की समकालीन प्रासंगिकता
देशभर में इस दिन को केवल एक औपचारिक स्मरणोत्सव के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और नैतिक संकल्प के रूप में देखा जा रहा है। भभुआ सहित विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित सम्मेलनों और गोष्ठियों में नागरिकों ने सत्य, अहिंसा और मानवीय गरिमा के पथ पर निरंतर अग्रसर रहने की शपथ ली है। बापू के शांतिपूर्ण प्रतिरोध और आपसी सद्भाव के सिद्धांतों ने न केवल स्वाधीनता संग्राम की नींव रखी थी, बल्कि आज के विभाजित विश्व में भी वे संवाद और समाधान का सबसे भरोसेमंद माध्यम बने हुए हैं।
विशेषज्ञों और विचारकों का मानना है कि आधुनिक समस्याओं से निपटने के लिए गांधीवादी दृष्टिकोण अनिवार्य है। जब समाज वैचारिक मतभेदों और टकरावों से जूझ रहा हो, तब मैत्री, करुणा और दूसरों के दुख को समझने की भावना ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकती है। निरहंकार भाव से जनसामान्य के कल्याण के लिए काम करना ही वास्तविक नेतृत्व का परिचायक माना गया है।
जनता की प्रतिक्रिया
इस संदेश पर नागरिकों की तरफ से व्यापक और मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई प्रयोक्ताओं ने बापू के शांति और करुणा के संदेश की सराहना करते हुए इसे युवाओं के लिए मार्गदर्शक बताया, जबकि कुछ अन्य लोगों ने इतिहास के पुराने प्रसंगों और नीतियों को लेकर तीखे सवाल उठाए और राजनीतिक संदर्भों पर अपनी असहमति दर्ज कराई।


























