बिहार के पूर्णिया स्थित राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज के तकनीकी छात्रों ने कम लागत में अत्याधुनिक तकनीक विकसित कर एक शानदार उपलब्धि हासिल की है। संस्थान में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग संकाय के पांचवें सेमेस्टर की पढ़ाई कर रहे चार युवा विद्यार्थियों ने मिलकर एक बेहद किफायती और उपयोगी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सर्विंग रोबोट तैयार किया है। इस रोबोट का नाम 'नोवा' रखा गया है। लगभग चार फीट ऊंचे इस रोबोट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह इंसानों से हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में सहजता से संवाद कर सकता है। पूछे जाने वाले विभिन्न सवालों का सटीक उत्तर जुटाने के लिए यह आधुनिक एआई असिस्टेंट प्रणाली का सहारा लेता है।
चार विद्यार्थियों की टीम ने एक माह में किया निर्माण
इस अनूठी तकनीकी परियोजना को राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज पूर्णिया के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग 5वें सेमेस्टर के चार होनहार छात्रों आर्यन कुमार, आनंद कुमार, राजीव कुमार पंडित और शंकर कुमार ने संयुक्त प्रयास से पूरा किया है। विद्यार्थियों ने इस पूरे ढांचे और प्रोग्रामिंग को तैयार करने में करीब एक महीने तक लगातार मेहनत की। छात्रों का मुख्य ध्यान एक ऐसा यंत्र बनाने पर था जो शुरुआत में बातचीत करने और आवश्यक जानकारियां साझा करने में सक्षम हो, और आगे चलकर विभिन्न दैनिक कामकाज में इंसानों का हाथ बंटा सके।
दैनिक सवालों के जवाब और मौसम का हाल बताने में सक्षम
निर्माता छात्रों के अनुसार, नोवा रोबोट से जब मौसम से जुड़ा कोई प्रश्न पूछा जाता है तो वह तुरंत उस इलाके के मौसम की स्थिति बता देता है। इसके अतिरिक्त यह आम ज्ञान से जुड़े सामान्य सवालों के जवाब देने, संगीत या गाने सुनाने और अन्य जरूरी सूचनाएं उपलब्ध कराने जैसे कार्य आसानी से कर लेता है। छात्रों की योजना इसे आगे चलकर बहुउद्देशीय यानी मल्टी-फंक्शनल मशीन के रूप में ढालने की है। आने वाले समय में आवश्यक प्रोग्रामिंग और हार्डवेयर जोड़कर इसे सामान अथवा पार्सल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ढोने जैसे श्रमसाध्य कार्यों के योग्य भी बनाया जाएगा।
सस्ते घटकों और ईएसपी32 से कम खर्च में साधा कमाल
इस रोबोट के निर्माण में प्रयुक्त तकनीकी घटकों की जानकारी देते हुए छात्रों ने बताया कि इसमें ड्राइविंग सिस्टम, सेंसर्स, ब्लूटूथ और वाई-फाई मॉड्यूल लगाए गए हैं। इसके मस्तिष्क और नियंत्रण के लिए मुख्य प्रोसेसर, ईएसपी32 बोर्ड, उच्च क्षमता की बैटरी, माइक्रोफोन और एआई असिस्टेंट जैसी आवश्यक प्रणालियों का संयोजन किया गया है। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इन सभी इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों और हार्डवेयर को बेहद संतुलित तरीके से जोड़कर पूरी संरचना महज ₹5500 के कुल खर्च में खड़ी कर दी गई। छात्रों का दावा है कि सीमित लागत के बावजूद नोवा उपयोगकर्ता द्वारा पूछी गई अनगिनत जानकारियों को प्रोसेस कर जवाब देने की पूरी क्षमता रखता है।
शिक्षक के मार्गदर्शन से शुरू हुआ सफर
परियोजना की शुरुआत के संदर्भ में छात्रों ने बताया कि कॉलेज के फैकल्टी शिक्षक प्रोफेसर अमन कुमार ने उन्हें नवाचार के तहत एक उपयोगी रोबोटिक मॉडल तैयार करने की सलाह दी थी। अपने प्राध्यापक के इसी सुझाव को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए चारों साथियों ने मिलकर योजना बनाई और दिन-रात एक करके करीब तीस दिनों में इसे साकार रूप दे दिया। निर्माण पूरा होने के बाद से यह रोबोट कॉलेज परिसर में शिक्षकों और अन्य विद्यार्थियों के बीच भारी कौतूहल और चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
अस्पतालों, स्टेशनों और दफ्तरों में तैनाती की भावी योजनाएं
तकनीकी टीम का मानना है कि यदि उन्हें शासन अथवा उद्योग जगत से तकनीकी और वित्तीय संसाधन प्राप्त होते हैं, तो नोवा को बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक स्तर पर विकसित किया जा सकता है। छात्रों की परिकल्पना के अनुसार, इस रोबोट का उपयोग भविष्य में रेलवे स्टेशनों, बड़े अस्पतालों, शॉपिंग मॉल, कॉरपोरेट दफ्तरों, रेस्तरां और पार्सल डिलीवरी जैसी सार्वजनिक और व्यावसायिक जगहों पर सहजता से किया जा सकता है। छात्रों का अंतिम लक्ष्य एक ऐसा मजबूत तकनीकी तंत्र तैयार करना है, जो आम जनता की सेवा करने के साथ-साथ संचार और सहायता से जुड़ी रोजमर्रा की जरूरतों को सुगमता से पूरा कर सके।
महाविद्यालय के प्राचार्य ने की सराहना, पेटेंट कराने की उठाई मांग
संस्थान के प्राचार्य डॉ. प्रोफेसर मोहम्मद लतीफ ने छात्रों की इस असाधारण तकनीकी पहल की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज पूर्णिया हमेशा से युवा तकनीकी प्रतिभाओं को निखारने का एक सशक्त मंच रहा है और यहां के छात्र लगातार नए-नए व्यवहारिक प्रोजेक्ट विकसित करते रहते हैं। प्राचार्य ने रेखांकित किया कि चार छात्रों की इस टोली ने अत्यंत सीमित बजट में एक द्विभाषी कार्यक्षम रोबोट बनाकर अपनी योग्यता सिद्ध की है। छात्रों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उन्होंने इस नवाचार को आगे बढ़ाने पर बल दिया और साथ ही सरकार से मांग की कि छात्रों के इस मूल आविष्कार को पेटेंट कराने में जरूरी प्रशासनिक और आर्थिक सहयोग दिया जाए।



















