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ओडिशा की 17 महीने की बच्ची स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से जूझ रही, 16 करोड़ के इंजेक्शन के लिए पुरी में गुहारओडिशा
19 सित॰ 2026, 6:30 pm (1 घंटे पहले)· 0

ओडिशा की 17 महीने की बच्ची स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से जूझ रही, 16 करोड़ के इंजेक्शन के लिए पुरी में गुहार

ओडिशा के जाजपुर की 17 महीने की त्रिशिका दुर्लभ बीमारी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से पीड़ित है। उसके जीवन रक्षक इंजेक्शन की कीमत लगभग 16 करोड़ रुपये बताई गई है, जिसे जुटाने के लिए परिवार ने जनता और सरकार से मदद मांगी है।

ओडिशा के जाजपुर जिले से एक मार्मिक मामला सामने आया है, जहां महज 17 महीने की बच्ची त्रिशिका जिंदगी की बेहद नाजुक लड़ाई लड़ रही है। नन्ही त्रिशिका एक अत्यंत दुर्लभ और गंभीर जेनेटिक बीमारी की गिरफ्त में है। चिकित्सकों के अनुसार इस जानलेवा बीमारी से बच्ची को बचाने के लिए जो विशेष इंजेक्शन चाहिए, उसकी कीमत करीब 16 करोड़ रुपये आंकी गई है। इतनी भारी भरकम रकम जुटाना एक साधारण परिवार के लिए संभव नहीं है, जिसके चलते परिजन अब हर संभव सहारे की तलाश कर रहे हैं।

स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी के लक्षण और स्वास्थ्य चुनौतियां

चिकित्सकों ने पुष्टि की है कि त्रिशिका स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से ग्रस्त है, जिसे संक्षेप में SMA भी कहा जाता है। यह एक गंभीर आनुवंशिक विकार है, जिसके संकेत अमूमन शिशुओं में 6 महीने से 18 महीने की उम्र के बीच उभरने लगते हैं। यह विकार बच्चे की मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र को कमजोर करने लगता है, जिससे शारीरिक क्षमताएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं।

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इस बीमारी से जूझने वाले बच्चों की शारीरिक स्थिति तेजी से बिगड़ती है, जिसमें कई प्रकार की दैनिक परेशानियां शामिल हैं

  • मांसपेशियों की अत्यधिक कमजोरी: इस सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे सहारे से बैठ तो सकते हैं, लेकिन वे खुद से अपने पैरों पर खड़े होने या चलने में पूरी तरह लाचार हो जाते हैं।
  • श्वसन और हड्डियों से जुड़े गंभीर लक्षण: बीमारी के प्रभाव से बच्चों के हाथ और पैर कांपने लगते हैं। इसके साथ ही सांस लेने में भारी तकलीफ, लगातार सर्दी और जुकाम की शिकायत रहना तथा हड्डियों में विकृति आ जाना इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं।

इलाज में जमा-पूंजी समाप्त, 16 करोड़ के इंजेक्शन की दरकार

त्रिशिका के माता-पिता ने अपनी बेटी को बचाने के लिए पिछले कुछ महीनों में कोई कसर नहीं छोड़ी। परिवार ने अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी लगाते हुए अब तक लगभग 20 से 25 लाख रुपये शुरुआती जांच और उपचार में खर्च कर दिए हैं। हालांकि, बीमारी की गंभीरता को देखते हुए चिकित्सकों का कहना है कि रोग की प्रगति रोकने और बच्ची का जीवन बचाने के लिए एक खास इंजेक्शन की सख्त जरूरत है।

समस्या यह है कि इस एकमात्र इंजेक्शन की लागत लगभग 16 करोड़ रुपये है। किसी भी सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के लिए इतने कम समय में इतनी बड़ी रकम जुटा पाना नामुमकिन जैसा कार्य है। लगातार बढ़ती लाचारी के बावजूद माता-पिता ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। उन्होंने देश भर के नागरिकों और ओडिशा सरकार से आगे आकर वित्तीय सहायता प्रदान करने की गुहार लगाई है।

श्री जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार पर लगाई अंतिम गुहार

जब चिकित्सीय खर्च जुटाने के तमाम रास्ते बंद होते दिखे, तो माता-पिता अपनी नन्ही बच्ची को लेकर सीधे पुरी पहुंचे। वहां उन्होंने श्री जगन्नाथ मंदिर के प्रसिद्ध सिंहद्वार के सामने पहुंचकर अपनी लाड़ली को महाप्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया।

बच्ची के पिता का कहना है कि आम जनता से आर्थिक मदद मांगने से पहले वे अपनी बेटी को मंदिर की 22 सीढ़ियों यानी बयासी पाहाचा पर ले गए और उसे भगवान जगन्नाथ को सौंप दिया। उनका पूरा भरोसा अब किसी दैवीय चमत्कार, ओडिशा सरकार के सहयोग और समाज की उदारता पर टिका है। सोशल मीडिया और क्राउडफंडिंग के जरिए इस विशाल राशि को जुटाने के प्रयास शुरू हो गए हैं, ताकि नन्ही त्रिशिका को समय पर जरूरी उपचार मिल सके।

सवाल-जवाब

त्रिशिका की उम्र कितनी है और वह कहां की रहने वाली है?
त्रिशिका 17 महीने की बच्ची है और उसका परिवार ओडिशा के जाजपुर जिले का रहने वाला है।
बच्ची को कौन सी बीमारी हुई है?
चिकित्सकों के अनुसार त्रिशिका स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) नाम की एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित है।
इलाज के लिए आवश्यक इंजेक्शन की कीमत कितनी है?
इस बीमारी से निपटने के लिए जरूरी इंजेक्शन की अनुमानित लागत लगभग 16 करोड़ रुपये है।
परिवार ने अब तक बच्ची के इलाज पर कितना खर्च किया है?
शुरुआती जांच और प्राथमिक उपचार में परिवार अपनी जमा-पूंजी से लगभग 20 से 25 लाख रुपये खर्च कर चुका है।
माता-पिता ने पुरी जाकर क्या कदम उठाया?
माता-पिता ने पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर पहुंचकर सिंहद्वार और 22 सीढ़ियों (बयासी पाहाचा) पर अपनी बच्ची को भगवान को समर्पित किया और चमत्कार की प्रार्थना की।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·18 मिनट पहले

यह मामला स्वास्थ्य नीति और दुर्लभ बीमारियों के प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। राष्ट्रीय दुर्लभ रोग नीति के तहत वित्तीय सहायता की प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल है, जिससे आपातकालीन मामलों में समय पर मदद नहीं मिल पाती। सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालयों को चाहिए कि वे ऐसे मामलों में त्वरित राहत कोष की व्यवस्था करें ताकि किसी बच्चे की जान केवल प्रशासनिक देरी या धन के अभाव में न जाए।

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·18 मिनट पहले

यह संकट केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य कूटनीति और जैव-फार्मास्यूटिकल बाजार की विफलता है। 16 करोड़ रुपये जैसी भारी कीमत वाली दवाएं अनुसंधान और पेटेंट कानूनों के कारण आम पहुंच से बाहर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे दुर्लभ विकारों के इलाज के लिए वैश्विक फंड और मूल्य नियंत्रण तंत्र की सख्त आवश्यकता है, अन्यथा जीवन रक्षक तकनीकें केवल एक विशेषाधिकार बनकर रह जाएंगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·39 मिनट पहले

स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी जैसे दुर्लभ जेनेटिक विकारों के मामलों में 16 करोड़ रुपये के इंजेक्शन की यह मजबूरी हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे और सरकारी अनुदान नीतियों की एक बड़ी सीमा को उजागर करती है। जब कोई मध्यमवर्गीय परिवार अपनी जीवन-पूंजी गंवाकर धार्मिक स्थलों पर गुहार लगाने को मजबूर हो जाए, तो यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य नीति और मेडिसिन टैक्सेशन के स्तर पर एक गंभीर कानूनी व सामाजिक समीक्षा की मांग करता है। इस तरह की दुर्लभ बीमारियों के उपचार और आयात शुल्क पर राज्य एवं केंद्र स्तर पर विशेष राहत कोष या कानूनी प्रावधानों की तत्काल आवश्यकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·39 मिनट पहले

यह मामला केवल एक मानवीय संकट नहीं, बल्कि दुर्लभ बीमारियों की थेरेपी पर लगने वाले भारी आयात शुल्क और टैक्स ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसे लाइफ-सेविंग ड्रग्स पर लगने वाले जी-एस-टी और कस्टम ड्यूटी को माफ करने के लिए नीतिगत स्तर पर तत्काल संशोधन की आवश्यकता है, ताकि कॉर्पोरेट सीएसआर फंड्स और विशेष चिकित्सा अनुदानों को जोड़कर एक स्थायी नेशनल रेयर डिजीज फंड को प्रभावी बनाया जा सके।

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