पश्चिम एशिया के अशांत रणनीतिक पटल पर एक बड़ा सैन्य समीकरण आकार ले रहा है, जिसके केंद्र में खाड़ी का सबसे प्रभावशाली मुल्क और उसके दो बड़े साझीदार आ गए हैं। यमन के भीतर सक्रिय हूती लड़ाकों की ओर से लगातार जारी हमलों और क्षेत्रीय तनाव के गहराने के बाद सऊदी अरब की सीमाओं की सुरक्षा मजबूत करने की कवायद तेज हो गई है। इसी कड़ी में रियाद की पुकार पर पाकिस्तान और तुर्की अपने सैन्य साजो-सामान और फौज की टुकड़ियां सऊदी धरती पर तैनात करने जा रहे हैं। इस कदम को उस त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते के व्यावहारिक क्रियान्वयन के रूप में देखा जा रहा है, जिस पर तीनों पक्षों ने कुछ ही महीने पहले औपचारिक रजामंदी जताई थी।
रियाद में आपात मंत्रणा और साझा संकल्प
सऊदी अरब की राजधानी रियाद में सोमवार के दिन तीनों देशों के शीर्ष राजनयिकों और रक्षा तंत्र के कर्ताधर्ताओं का एक उच्चस्तरीय जमावड़ा हुआ। हालात की नजाकत को देखते हुए बुलाई गई इस आपात बैठक में सीमा पार से पेश आ रहे खतरों की बारीकी से समीक्षा की गई। इस विमर्श में इस्लामाबाद की ओर से चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज व सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की सीधी मौजूदगी रही। उनके साथ पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री इशाक डार और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी चर्चा की मेज पर शामिल हुए, जबकि तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान और सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान अल सऊद ने अपने-अपने मुल्कों का प्रतिनिधित्व किया।
गहन विचार-विमर्श के उपरांत तीनों साझेदार मुल्कों ने एक कड़ा साझा पैगाम जारी किया। इस संयुक्त वक्तव्य के जरिए ऐलान किया गया कि सऊदी अरब की संप्रभुता, उसके भूभाग और क्षेत्रीय अखंडता पर आंच पहुंचाने वाले किसी भी हमले अथवा आक्रामक खतरे को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बयान में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि परस्पर हिफाजत के वादों को अब कागजों से निकालकर धरातल पर उतारा जा रहा है। इसके लिए अपेक्षित सैनिक बल, तकनीकी संसाधन और सामरिक क्षमताएं तुरंत जुटाई जाएंगी और उन्हें खाड़ी मुल्क में अत्यंत तेजी से मोर्चा संभालने के लिए रवाना किया जाएगा।
अगस्त के रक्षा करार का आधार और सैन्य संतुलन
इस बड़े सामरिक कदम की नींव अगस्त के महीने में रखी गई थी, जब सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच मक्का में एक ऐतिहासिक आपसी रक्षा समझौता मुकम्मल हुआ था। उस करार का मूल सिद्धांत सामूहिक आत्मरक्षा की अवधारणा पर टिका हुआ है, जिसके तहत यदि तीनों में से किसी एक पर भी सैन्य आघात होता है तो बाकी दोनों सहयोगी मुल्क फौरन उसकी मदद के लिए ढाल बनकर खड़े होंगे। यह त्रिपक्षीय गठबंधन वैश्विक और इस्लामी जगत के लिहाज से अप्रत्याशित शक्ति संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है।
सैन्य दृष्टि से देखें तो इस मोर्चे में तीन बेहद अलग और असरदार ताकतें एक साथ आई हैं। तुर्की नाटो गठबंधन के भीतर अमेरिकी सेना के बाद दूसरी सबसे बड़ी पारंपरिक सैन्य ताकत की कमान संभालता है, जिसकी आधुनिक हथियार प्रणाली और युद्धक क्षमताएं जानी-मानी हैं। दूसरी तरफ, पाकिस्तान मुस्लिम बहुल मुल्कों में एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जिसके पास परमाणु हथियार भंडार मौजूद हैं और उसकी थल सेना खाड़ी में प्रशिक्षण और सुरक्षा का लंबा अनुभव रखती है। इनके साथ सऊदी अरब खाड़ी का आर्थिक केंद्र और सबसे गहरा प्रभाव रखने वाला देश है, जो अपनी सुरक्षा व्यवस्था को क्षेत्रीय खतरों से अभेद्य बनाना चाहता है।
सैनिकों की गिनती और मोर्चे पर तैनाती का स्वरूप
हालांकि इस घोषणा से यह तो तय हो गया है कि दोनों सहयोगी देश सऊदी अरब की हिफाजत में अपने कदम आगे बढ़ाएंगे, मगर अभी तक सैनिकों की असल तादाद का ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। दोनों देशों की कितनी बटालियनें या विशेषज्ञ दस्ते सऊदी अरब की जमीन पर उतरेंगे, इस बारे में अभी स्थिति स्पष्ट की जानी बाकी है। इसी तरह यह विवरण भी सामने आना शेष है कि तैनात होने वाले सैनिकों को अग्रिम मोर्चे पर सीधी लड़ाई का जिम्मा मिलेगा अथवा वे प्रमुख तेल प्रतिष्ठानों, रणनीतिक ठिकानों और हवाई सीमाओं की निगरानी तक सीमित रहेंगे। बहरहाल, साझा बयान में इस बात को रेखांकित किया गया है कि जरूरी क्षमताओं का संयोजन करके बहुत जल्द जमीनी तैनाती पूरी कर ली जाएगी।
यमन में पलटवार और तेल ठिकानों पर खतरे की पृष्ठभूमि
यह अप्रत्याशित लामबंदी ऐसे नाज़ुक मोड़ पर हो रही है जब सऊदी हुकूमत को यमन के हूती लड़ाकों की ओर से गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। हूती विद्रोही समय-समय पर सऊदी अरब के रिहाइशी कस्बों, तेल के कुओं, रिफाइनरियों और लाल सागर के समुद्री व्यापारिक जलमार्गों को निशाना बनाते रहे हैं। यमन के अंदरूनी संघर्ष के फिर से भड़कने के बाद इन हमलों की गति और तीव्रता में भारी इजाफा देखा गया है।
बीते कुछ महीनों के दौरान यमन के युद्धक्षेत्र में तेजी से सत्ता समीकरण बदले हैं। सितंबर के महीने में हूतियों ने एक व्यापक सैन्य अभियान चलाकर सऊदी समर्थित यमनी हुकूमत के नियंत्रण वाले कई अहम इलाकों को अपने कब्जे में ले लिया था। इस आक्रामक विस्तार को रोकने के लिए सोमवार को सऊदी अरब समर्थित सुरक्षा बलों ने जवाबी सैन्य कार्रवाई की शुरुआत की। इस पलटवार का सीधा मकसद हूतियों द्वारा छीने गए इलाकों पर दोबारा सरकारी प्रभुत्व बहाल करना है, जिसमें वे इलाके भी शामिल हैं जिन पर विद्रोही गुट पिछले दस से अधिक वर्षों से काबिज रहा है।



















