पाकिस्तान के रक्षा और विदेश नीति से जुड़े फैसलों पर सेना की पकड़ इस कदर मजबूत हो चुकी है कि अब मुल्क की संसद को भी विश्वास में लेने की जरूरत महसूस नहीं की जा रही है। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के नेतृत्व में सेना ने सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को भेजने का निर्णय लिया है। संसद में किसी भी बहस या मतदान के बिना उठाया गया यह कदम साफ दर्शाता है कि पाकिस्तान की चुनी हुई व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं के मुकाबले सेना का प्रभाव किस स्तर तक बढ़ चुका है। मक्का रक्षा समझौते के तहत उठाए जा रहे इस कदम से पाकिस्तान के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।
मक्का रक्षा समझौता और सेना की सीधी तैनाती
सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच अगस्त के महीने में ‘मक्का रक्षा समझौता’ हुआ था, जिसे अब औपचारिक तौर पर अमल में लाया जा रहा है। यमन में सक्रिय और ईरान का समर्थन पाने वाले हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के ठिकानों पर लगातार किए जा रहे हमलों के मद्देनजर यह समझौता जमीन पर उतारा जा रहा है। हालात की समीक्षा के लिए रियाध में बुलाई गई एक आपातकालीन बैठक में खुद आसिम मुनीर शामिल हुए थे।
इस उच्चस्तरीय बैठक के बाद तीनों मुल्कों ने संयुक्त रूप से ऐलान किया कि समझौते की प्रतिबद्धताओं के तहत निर्धारित सैन्य टुकड़ियों को तत्काल प्रभाव से तैनात किया जाएगा। इस बड़े अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मिशन में पाकिस्तान की संसद या निर्वाचित सरकार की भूमिका न के बराबर नजर आई है। सारा फैसला सेना के शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर ही ले लिया गया।
2015 की नजीर और 2026 की हकीकत
पाकिस्तानी हुकूमत के इस रुख की तुलना ठीक ग्यारह साल पहले के घटनाक्रम से की जा रही है। साल 2015 में जब सऊदी अरब ने यमन के हूती संकट के दौरान पाकिस्तान से सैन्य टुकड़ियों की मांग की थी, तब तत्कालीन नवाज शरीफ सरकार ने मामले को संसद के सामने रखा था। उस समय पाकिस्तानी संसद में गंभीर चर्चा हुई, मतदान कराया गया और सांसदों ने सर्वसम्मति से फैसला लिया कि पाकिस्तान इस जंग में तटस्थ रहेगा।
दक्षिण एशिया मामलों के विश्लेषक माइकल कुगेलमैन के अनुसार, एक दौर वह भी था जब संसद फौज न भेजने का फैसला करती थी और सेना उस फैसले को स्वीकार करती थी। आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। संसद में न कोई प्रस्ताव पेश किया गया और न ही जनप्रतिनिधियों से कोई राय ली गई। जब पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय से यह सवाल किया गया कि क्या इस तैनाती के लिए कैबिनेट या संसद की मंजूरी ली गई, तो मंत्रालय ने ब्योरे को ऑपरेशनल गोपनीयता का हवाला देकर टाल दिया और केवल इतना कहा कि सभी जरूरी सरकारी प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई हैं।
संवैधानिक प्रावधान और मुनीर को मिली असीमित ताकत
संसद की अनदेखी पर उठ रहे सवालों के बीच अगर कानूनी ढांचे पर नजर डालें तो स्थिति काफी अलग दिखाई देती है। पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत सशस्त्र बलों की कमान और नियंत्रण संघीय सरकार के पास होता है, जहां राष्ट्रपति केवल औपचारिक प्रमुख की भूमिका में होते हैं। संविधान में ऐसा कोई स्पष्ट नियम नहीं है कि विदेशों में सैनिक भेजने या रक्षा समझौतों को लागू करने के लिए हर बार संसद से वोटिंग कराना अनिवार्य हो।
वर्ष 2015 में संसद के जरिए फैसला लेना एक राजनीतिक परंपरा और आपसी सहमति का हिस्सा था, न कि कोई संवैधानिक मजबूरी। बीते साल हुए संवैधानिक संशोधनों के बाद आसिम मुनीर की स्थिति बेहद मजबूत हो चुकी है। इन संशोधनों के जरिए उन्हें 2030 तक तीनों सेनाओं का सुप्रीम कमांडर नियुक्त किया गया है, फील्ड मार्शल की आजीवन रैंक दी गई है और किसी भी प्रकार के आपराधिक मुकदमे से पूर्ण छूट प्रदान की गई है। ऐसे में सेना और मौजूदा सरकार के बीच ऐसा तालमेल है जहां कैबिनेट की औपचारिक मुहर को ही पर्याप्त मानकर संसद को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है।
घरेलू राजनीतिक संकट और सेना का बढ़ता दायरा
सऊदी अरब में फौज उतारने का यह फैसला ऐसे वक्त में सामने आया है जब पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति में भारी तनाव है। जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ इस्लामाबाद की ओर एक बड़ा मार्च निकाल रही है। पार्टी का सीधा आरोप है कि सेना देश के लोकतंत्र और राजनीतिक ढांचे को कमजोर कर अपनी सत्ता चला रही है। इस संवेदनशील मुद्दे पर मौजूदा प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने चुप्पी साध रखी है, जबकि पीटीआई प्रवक्ता जुल्फी बुखारी ने संसद में बिना किसी राजनीतिक सहमति के इतने बड़े फैसले पर ऐतराज जताया है।
किंग्स कॉलेज लंदन के एसोसिएट प्रोफेसर एंड्रियास क्रैग का मानना है कि विदेशी ताकतें पाकिस्तान की सेना को ही असल शक्ति मानकर सीधे संवाद कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय साझेदार सेना को अनिवार्य ताकत के रूप में देख रहे हैं, जिससे मुल्क के भीतर सेना का दावा और मजबूत होता जा रहा है। उन्होंने सचेत किया कि बिना संवैधानिक नियंत्रण वाली व्यवस्था ऐसे अंतरराष्ट्रीय समझौते करने में तो जल्दबाजी दिखाती है, लेकिन जब उन फैसलों की भारी कीमत चुकानी पड़ती है, तब स्थिति को सुधारना बेहद मुश्किल हो जाता है।
ईरान के साथ रिश्तों में दरार और हूती विद्रोहियों का खतरा
पाकिस्तानी सेना के इस कदम से सबसे बड़ा खतरा विदेश नीति के मोर्चे पर खड़ा हो सकता है। हूती विद्रोहियों को ईरान का खुला समर्थन हासिल है, जबकि पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनने का दावा करता रहा है। यदि पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब में तैनात होकर हूती विद्रोहियों के खिलाफ किसी सीधी कार्रवाई में उलझते हैं, तो तेहरान और इस्लामाबाद के संबंध बिगड़ सकते हैं।
हूती लड़ाकों ने जुलाई के महीने से सऊदी जहाजों और तेल प्रतिष्ठानों पर हमले तेज कर रखे हैं। हाल ही में मदीना में पैगंबर की मस्जिद को बिजली पहुंचाने वाले पावर स्टेशन पर भी हमला करने का आरोप लगा है। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में पाकिस्तानी सैनिकों की सीधी मौजूदगी उन्हें ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों के निशाने पर ला सकती है, जिससे पाकिस्तान एक नए अंतरराष्ट्रीय टकराव के दलदल में फंस सकता है।


















