सिंधु जल संधि को भारत द्वारा स्थगित किए जाने के बाद से पाकिस्तान कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर निरंतर दबाव में दिख रहा है। इस्लामाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने नई दिल्ली के फैसले का विरोध किया और इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ करार देने का प्रयास किया। उन्होंने दलील दी कि यह समझौता कानूनी रूप से दोनों मुल्कों के लिए पूरी तरह बाध्यकारी है और कोई भी देश इसे अपनी इच्छा अनुसार एकतरफा रूप से समाप्त, स्थगित या परिवर्तित नहीं कर सकता। अपनी बात को वजन देने के लिए उन्होंने पाकिस्तान के 24 करोड़ नागरिकों के पानी के अधिकार की चर्चा की और कहा कि इतने बड़े जनसमूह की बुनियादी जरूरतों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
भारत के फैसले को एकतरफा बताने की कोशिश
अत्ताउल्लाह तरार ने अपने संबोधन में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मामले में ध्यान देने का आग्रह किया। उनका दावा था कि अगर दोनों मुल्कों के दरमियान कोई भी आपसी विवाद या असहमति उत्पन्न होती है, तो भी दोनों पक्षों को समझौते के मूल नियमों और तय शर्तों की सीमाओं में रहकर ही समाधान खोजना होगा। उन्होंने आगाह करने वाले अंदाज में कहा कि भारत के इस कदम के वैश्विक प्रभाव सामने आ सकते हैं। पाकिस्तानी सूचना मंत्री के अनुसार, उनका मुल्क इस मुद्दे को अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाता रहेगा ताकि उनके राष्ट्रीय हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
पानी को हथियार बनाने का लगाया आरोप
कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तानी मंत्री ने कहा कि उनका देश एक शांतिप्रिय राष्ट्र है, मगर भारत को पानी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने जोर देकर कहा कि सिंधु नदी तंत्र के बहाव पर पाकिस्तान की 24 करोड़ आबादी का प्राकृतिक और बुनियादी हक है। गौरतलब है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी इससे पहले विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में इस मामले को उठा चुके हैं। इस्लामाबाद लगातार यह साबित करने की फिराक में जुटा है कि भारत का यह फैसला क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है, जबकि नई दिल्ली की नीति साफ और स्पष्ट रही है।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद बदला भारत का रुख
दोनों मुल्कों के जल संबंधों में यह बड़ा गतिरोध अप्रैल 2025 में घटित घटना के बाद पैदा हुआ था। पहलगाम के बैसरन इलाके में हुए आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान ले ली गई थी। भारत ने इस बर्बर हमले के पीछे पाकिस्तान से संचालित आतंकी ढांचों को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया। आतंकी हमले के जवाब में भारत ने निर्णायक सैन्य कदम उठाते हुए ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इस व्यापक सैन्य अभियान के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सक्रिय आतंकी ठिकानों को सटीक रूप से निशाना बनाया गया, जिसमें बड़ी संख्या में आतंकवादी मारे गए। इसी सख्त कार्रवाई की निरंतरता में भारत ने यह स्पष्ट संदेश देते हुए सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया कि आतंकवाद को बढ़ावा देने और सामान्य द्विपक्षीय रिश्ते बनाए रखने की नीति एक साथ आगे नहीं बढ़ सकती। भारत ने दोटूक कहा कि जब तक सीमा पार से जारी आतंकवाद पर विश्वसनीय और ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक संधि का निलंबन जारी रहेगा।
विश्व बैंक की मध्यस्थता और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सिंधु नदी बेसिन की छह प्रमुख नदियों के न्यायसंगत जल बंटवारे के उद्देश्य से वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि संपन्न हुई थी। इस समझौते को कराने में विश्व बैंक ने मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। संधि के मूल प्रावधानों के तहत पूर्वी नदियों का नियंत्रण और उपयोग मुख्य रूप से भारत को सौंपा गया था, जबकि पश्चिमी नदियों का अधिकांश जल पाकिस्तान के हिस्से में रखा गया था। छह दशकों से भी अधिक समय तक यह ढांचा दोनों देशों के बीच जल वितरण की बुनियादी व्यवस्था बना रहा। परंतु अप्रैल 2025 में सीमा पार से हुई घातक आतंकी वारदात के बाद भारत ने आतंकवाद और कूटनीति के विरोधाभास को खत्म करने के लिए कठोर राजनयिक निर्णय लिया।
मध्यस्थता न्यायाधिकरण के फैसलों पर भी टकराव
सिंधु जल समझौते पर दोनों मुल्कों के बीच तकरार सिर्फ संधि के निलंबन तक ही सीमित नहीं है। संधि के तहत गठित होने वाले तथाकथित मध्यस्थता न्यायाधिकरण की कार्यवाहियों को लेकर भी दोनों पक्षों में गहरा गतिरोध रहा है। भारत ने ऐसी किसी भी एकतरफा मध्यस्थता प्रक्रिया और उसके फैसलों को मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान के दावों को बेनकाब करते हुए कहा था कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलत प्रचार फैलाने और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आदी हो चुका है। रणधीर जायसवाल ने जोर देकर कहा था कि पाकिस्तान जिस फैसले को स्थायी मध्यस्थता न्यायालय का आदेश बता रहा है, वह वास्तव में उस वास्तविक निकाय का फैसला नहीं है बल्कि भारत के दृष्टिकोण से अवैध और अनुचित तरीके से गठित की गई एक संस्था का नतीजा है, जिसे भारत पहले ही सिरे से खारिज कर चुका है।



















