पाकिस्तान की सियासत और न्याय प्रणाली इस समय एक बेहद संवेदनशील मोड़ से गुजर रही है। देश की हुकूमत चलाने वालों और सेना के शीर्ष नेतृत्व पर लगातार यह आरोप लग रहे हैं कि वे अदालत की स्वायत्तता को कुचलना चाहते हैं। इस बीच लाहौर हाईकोर्ट के एक प्रमुख न्यायाधीश ने पद छोड़ने का फैसला करके पूरे तंत्र को झकझोर कर रख दिया है।
संवैधानिक संशोधनों पर विवाद और वजूद की लड़ाई
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में 26वां और 27वां संवैधानिक संशोधन हैं। आलोचकों और विपक्षी दलों का मानना है कि इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य देश की अदालतों पर पूरी तरह शिकंजा कसना है। इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-ইনसाफ लंबे समय से यह मुखर विरोध करती आ रही है कि मौजूदा नेतृत्व देश में अघोषित तानाशाही थोपना चाहता है। न्यायपालिका में नियुक्तियों और तबादलों के अधिकार अपने हाथ में लेकर हुक्मरान यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके फैसलों पर कोई सवाल न उठाया जा सके।
न्यायमूर्ति कयानी का बड़ा कदम
न्यायमूर्ति मोहसिन अख्तर कयानी ने राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को सीधे अपना इस्तीफा भेजकर सरकार और सेना के दबाव के खिलाफ अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर दी है। अपने त्यागपत्र में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह बात उठाई है कि किस तरह से इन कानूनी बदलावों ने न्यायिक स्वतंत्रता की रीढ़ को कमजोर कर दिया है। जानकारों का मानना है कि इस तरह का खुला विरोध पाकिस्तान के प्रशासनिक इतिहास में एक बड़ा संदेश देता है।
अदालतों से लगातार दूरी बना रहे हैं न्यायविद
यह पहला मौका नहीं है जब किसी वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी ने इस तरह का कदम उठाया हो। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सैयद मंसूर अली शाह, न्यायमूर्ति अतहर मिनाल्लाह और लाहौर हाईकोर्ट के ही न्यायमूर्ति शम्स महमूद मिर्जा जैसे नामचीन चेहरे अपने पदों से इस्तीफा दे चुके हैं। न्याय जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि जो अधिकारी रक्षा और खुफिया तंत्र के निर्देशों के मुताबिक काम करने से इनकार करते हैं, उन्हें प्रशासनिक स्तर पर गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।



















