पाकिस्तान और ईरान के बीच राजनयिक और व्यावसायिक रिश्तों में तनाव लगातार गहराता जा रहा है। एक तरफ अमेरिकी दबाव और दूसरी तरफ सीमा पर बढ़ती सुरक्षा संबंधी चिंताओं के बीच दोनों देशों के आपसी समीकरण पूरी तरह से बिगड़ चुके हैं। कुछ समय पहले तक जो देश पश्चिम एशिया के मुद्दों पर मध्यस्थता की भूमिका निभाने का दावा कर रहा था, वह आज खुद गंभीर आर्थिक और कूटनीतिक संकट में फंस चुका है। सऊदी अरब के साथ अपनी नजदीकियों को प्राथमिकता देने के फेर में पाकिस्तान ने ईरान के साथ लगने वाली अपनी सीमाओं पर आवाजाही बाधित कर दी, जिसका सीधा खामियाजा वहां के आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।
रसोई गैस की सप्लाई पर लगी रोक
सीमा बंद होने के इस फैसले का सबसे बुरा असर ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ा है। ईरान की तरफ से रसोई गैस यानी एलपीजी की सप्लाई रोके जाने के बाद से पाकिस्तानी बाजारों में हड़कंप मच गया है। हालात यह हो चुके हैं कि जो सिलेंडर पहले से ही भारी कीमतों पर बिक रहे थे, उनके दाम में अचानक जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया है। महज कुछ ही दिनों के भीतर बारह किलो वाले एलपीजी सिलेंडर की कीमत साढ़े चार हजार पाकिस्तानी रुपये से बढ़कर सीधे सात हजार पाकिस्तानी रुपये के करीब पहुंच चुकी है। बाजार के जानकारों और कारोबारियों का मानना है कि यदि यह आपूर्ति जल्द बहाल नहीं की जाती है, तो आने वाले दिनों में स्थिति और अधिक भयावह हो सकती है।
सीमा पर फंसे सैकड़ों ट्रक और कंटेनर
पाकिस्तान के लिए ईरान से होने वाला एलपीजी आयात बेहद महत्वपूर्ण रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान रोजाना ईरान से लगभग सात हजार टन एलपीजी का आयात करता था। लेकिन सीमा सील होने के कारण एलपीजी से भरे सैकड़ों ट्रक रास्ते में ही फंस गए हैं, जिससे घरेलू बाजार में गैस की भारी किल्लत पैदा हो गई है। सिर्फ गैस ही नहीं, बल्कि कृषि उत्पादों पर भी इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। पाकिस्तान के आलू, केले और चावल से भरे एक हजार से ज्यादा कंटेनर भी सीमा पर ही अटके हुए हैं, जिससे किसानों और निर्यातकों को भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि बाद में गबद-रिमदान मार्ग पर कुछ खराब होने वाली वस्तुओं के निर्यात को दोबारा अनुमति दे दी गई, लेकिन गैस का आयात अब भी पूरी तरह बाधित है।
अक्टूबर में उठाए गए थे कड़े कदम
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत सत्रह अक्टूबर को हुई थी, जब पाकिस्तान ने ईरान के साथ अपनी महत्वपूर्ण गबद-रिमदान और तफ्तान सीमा चौकियों से व्यापारिक गतिविधियों पर रोक लगा दी थी। पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस कदम के पीछे सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने, अवैध तस्करी को रोकने और सीमा प्रबंधन में सुधार लाने का हवाला दिया था। वहीं दूसरी तरफ, ईरान ने भी सीमा पर तकनीकी अड़चनों और एहतियाती उपायों का जिक्र किया था। दोनों पक्षों के बयानों में अंतर होने के कारण इस अचानक उठाए गए कदम को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं और कूटनीतिक गलियारों में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं।
अमेरिकी दबाव और कूटनीतिक उलझन
इस पूरे भू-राजनीतिक ड्रामे के पीछे अमेरिकी प्रभाव की चर्चा भी जोरों पर है। वॉशिंगटन लंबे समय से ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उस पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। ऐसे में इस्लामाबाद के सामने एक बहुत बड़ी दुविधा यह है कि वह अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को कैसे बचाए रखे और साथ ही अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए ईरान के साथ होने वाले व्यापार को भी कैसे सुचारू रखे। तेईस अक्टूबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर यह जरूर कहा कि देश सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का पूरी तरह पालन करता है, लेकिन उसने खुलकर कभी यह स्वीकार नहीं किया कि सीमा बंद करने का यह फैसला अमेरिकी दबाव के चलते लिया गया था।



















