पाकिस्तान में इंटरनेट और सोशल मीडिया मंचों पर सक्रिय महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंताएं एक बार फिर चरम पर पहुंच गई हैं। बीते कुछ समय में महिला टिकटॉकर्स और डिजिटल क्रिएटर्स को निशाना बनाकर की गई हिंसक वारदातों ने देश के सामाजिक ताने-बाने और डिजिटल आजादी पर बड़े सवाल खड़े किए हैं। हाल ही में 14 अगस्त को 28 वर्षीय टिकटॉक क्रिएटर शामसो बीबी, जिन्हें उनके डिजिटल मंचों पर आयशा गिलमाना के नाम से जाना जाता था, की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि ऑनलाइन दुनिया में पहचान बनाने वाली महिलाओं के लिए जमीनी स्तर पर खतरा किस कदर बना हुआ है।
हालिया हत्याएं और बढ़ती असुरक्षा का माहौल
शामसो बीबी की निर्मम हत्या कोई छिटपुट या अकेली घटना नहीं है। इससे पहले बाइकर कोमल जान को भी ठीक इसी अंदाज में गोलियों का शिकार बनाया गया था। लगातार होती इन हिंसक वारदातों ने पूरे देश में डिजिटल माध्यमों से जुड़ी महिलाओं के बीच डर का माहौल पैदा कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि सोशल मीडिया पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने वाली महिलाएं कुछ कट्टरपंथी और पुरुष प्रधान सोच रखने वाले तत्वों की आंखों में खटक रही हैं।
शामसो बीबी से पहले, इसी साल जून के महीने में 17 साल की बेहद लोकप्रिय टिकटॉक क्रिएटर सना यूसुफ की उनके इस्लामाबाद स्थित घर में घुसकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उमर हयात नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया था। जांच के दौरान यह बात सामने आई कि आरोपी लगातार सना से संपर्क साधने और बातचीत करने का दबाव बना रहा था। जब सना ने उसके संदेशों का कोई जवाब नहीं दिया, तो उसने रंजिश में आकर इस वारदात को अंजाम दे दिया। हैरान करने वाली बात यह भी रही कि सना की मौत के बाद सोशल मीडिया पर एक वर्ग ने पीड़िता की ही आलोचना शुरू कर दी और आरोपी के कृत्य को सही ठहराने के कुतर्क दिए।
पारिवारिक हिंसा और कथित इज्जत के नाम पर अपराध
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय महिलाओं के खिलाफ हिंसा की यह जड़ें केवल अज्ञात अपराधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कई मामलों में खुद परिवार के सदस्य ही जानलेवा हमलावर बन रहे हैं। जनवरी 2025 में क्वेटा शहर से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया था, जहां एक पिता ने अपनी ही सगी बेटी को गोलियों से भून दिया। पिता का गुस्सा सिर्फ इस बात पर था कि बेटी ने अपना टिकटॉक अकाउंट डिलीट करने के आदेश को मानने से मना कर दिया था।
इसी तरह पिछले वर्ष कराची में पुलिस ने एक ऐसे व्यक्ति को सलाखों के पीछे भेजा था, जिस पर अपनी ही चार महिला रिश्तेदारों की हत्या का संगीन आरोप था। पूछताछ और जांच में पता चला कि आरोपी उन महिलाओं द्वारा बनाए जाने वाले टिकटॉक वीडियो को कथित रूप से अश्लील मानता था और इसी संकीर्ण सोच के तहत उसने चारों की जान ले ली। इन घटनाओं ने साफ कर दिया है कि घर की चारदीवारी के भीतर भी महिलाओं की डिजिटल आजादी को बेहद हिंसक तरीकों से कुचला जा रहा है।
नफरत भरा माहौल और डिजिटल राइट्स फाउंडेशन का विश्लेषण
महिला क्रिएटर्स को न केवल भौतिक दुनिया में शारीरिक हमलों का सामना करना पड़ता है, बल्कि डिजिटल स्पेस में भी वे लगातार धमकियों, अभद्र टिप्पणियों और साइबर बुलिंग से जूझती हैं। सना यूसुफ की हत्या के बाद डिजिटल राइट्स फाउंडेशन ने सोशल मीडिया पर आए कमेंट्स और प्रतिक्रियाओं का गहन विश्लेषण किया। इस अध्ययन में कई ऐसे परेशान करने वाले कमेंट सामने आए जिनमें लोगों ने खुलेआम हत्यारे की सराहना की थी। कई प्रयोक्ताओं ने सना की हत्या का कारण उनके सोशल मीडिया इस्तेमाल को बताते हुए घटना को जायज ठहराने की कोशिश की।
सामाजिक नियंत्रण और कंदील बलोच का पुराना मामला
महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली प्रमुख कार्यकर्ता फरजाना बारी का कहना है कि यह समस्या केवल टिकटॉक या किसी एक मोबाइल ऐप तक सीमित नहीं है। उनका मानना है कि जब भी कोई महिला अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने की कोशिश करती है या पुरुष प्रधान नियंत्रण से बाहर निकलकर स्वायत्तता का प्रदर्शन करती है, तो उसके खिलाफ हिंसा का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। वहीं, महिलाओं के एक बड़े ऑनलाइन समुदाय की प्रमुख कनवल अहमद ने स्पष्ट किया कि यह सिर्फ व्यक्तिगत सनक का मामला नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी सामाजिक संरचना और संस्कृति का परिणाम है जहां महिलाओं को निरंतर डर और भय के साये में जीने पर मजबूर किया जाता है।
पाकिस्तान में सोशल मीडिया सेलिब्रिटीज पर हमले का सबसे चर्चित और शुरुआती मामला साल 2016 में सामने आया था, जब प्रसिद्ध सोशल मीडिया स्टार कंदील बलोच की उनके अपने ही भाई ने हत्या कर दी थी। कंदील बलोच की हत्या के बाद पाकिस्तान सहित पूरे विश्व में महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, ऑनलाइन मौजूदगी और तथाकथित इज्जत के नाम पर होने वाले अपराधों पर एक व्यापक और अंतरराष्ट्रीय बहस छिड़ गई थी। हालांकि, बरसों बीत जाने के बाद भी स्थिति में कोई सकारात्मक बदलाव आता नहीं दिख रहा है।


















