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पाकिस्तान में संसदीय ढांचा खत्म करने की तैयारी, जनरल आसिम मुनीर का 10 साल का रोडमैप आया सामनेपाकिस्तान
19 अग॰ 2026, 4:22 pm (1 घंटे पहले)· 2

पाकिस्तान में संसदीय ढांचा खत्म करने की तैयारी, जनरल आसिम मुनीर का 10 साल का रोडमैप आया सामने

पाकिस्तान के सैन्य मुख्यालय रावलपिंडी में एक 10 साल का मास्टर प्लान तैयार किया जा रहा है, जिसके तहत मौजूदा संसदीय व्यवस्था को हटाकर राष्ट्रपति शासन लागू करने और संविधान में बड़े बदलावों की योजना है।

पाकिस्तान इस समय गंभीर आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और गिरते विदेशी मुद्रा भंडार से जूझ रहा है। बलूचिस्तान और अफगान सीमावर्ती इलाकों में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति के बीच देश के प्रशासनिक ढांचे को नए सिरे से ढालने की कवायद शुरू हो गई है। रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय में एक व्यापक 10 साल की कार्ययोजना पर गंभीर विचार-विमर्श किया जा रहा है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान की पारंपरिक संसदीय प्रणाली को समाप्त कर एक मजबूत प्रेसिडेंशियल शासन मॉडल स्थापित करना है, ताकि केंद्रित शक्ति के माध्यम से प्रमुख राष्ट्रीय फैसले लिए जा सकें।

संसदीय व्यवस्था की जगह प्रेसिडेंशियल मॉडल लाने की तैयारी

प्रस्तावित 10 साल के इस ढांचे के तहत पाकिस्तान में प्रधानमंत्री और संसद पर आधारित मौजूदा शासन व्यवस्था को बदलकर राष्ट्रपति के हाथों में प्रमुख कार्यकारी शक्तियां सौंपने की बात कही गई है। इस बदलाव का उद्देश्य नीतियों में बार-बार होने वाले बदलावों को रोकना है। सैन्य नेतृत्व का मानना है कि नागरिक सरकारों के बदलने से आर्थिक और रणनीतिक नीतियां अस्थिर हो जाती हैं। एक मजबूत राष्ट्रपति पद के गठन से देश की विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा निर्णयों में निरंतरता बनी रहेगी, जिससे अमेरिका, चीन और खाड़ी देशों जैसे प्रमुख वैश्विक साझेदारों के साथ द्विपक्षीय बातचीत में अधिक मजबूती से अपनी शर्तें रखी जा सकेंगी।

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राजनीतिक घरानों की नाकामी और सेना का तर्क

प्रशासकीय बदलाव के इस प्रस्ताव के पीछे मुख्य तर्क नागरिक राजनीतिक व्यवस्था की विफलता को बनाया गया है। शरीफ परिवार और भुट्टो-ज़रदारी परिवार जैसे पारंपरिक राजनीतिक घरानों पर दशकों से सत्ता के केंद्रीकरण, राजनीतिक खींचतान और वित्तीय कुप्रबंधन के आरोप लगते रहे हैं। वर्तमान शहबाज़ शरीफ सरकार और उससे पहले की शासन व्यवस्थाओं के दौरान देश भारी विदेशी कर्ज और मुद्रास्फीति की चपेट में आया है। इस तर्क के आधार पर यह बात रेखांकित की जा रही है कि दलीय राजनीति ने देश के प्रशासनिक तंत्र को कमजोर किया है, इसलिए प्रशासनिक स्थिरता के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया को एक केंद्रीय पद के तहत लाना आवश्यक है।

तुर्की और मिस्र के शासन मॉडल से ली जा रही प्रेरणा

पाकिस्तान में प्रस्तावित नया प्रशासनिक ढांचा तुर्की और मिस्र के मौजूदा राजनीतिक मॉडलों से प्रेरित बताया जा रहा है। तुर्की में राष्ट्रपति एर्दोगन और मिस्र में राष्ट्रपति अल-सीसी की अगुआई में जिस प्रकार राष्ट्रपति पद के पास व्यापक शक्तियां केंद्रित हैं, उसी तर्ज पर पाकिस्तान में भी राष्ट्रपति को सर्वोच्च अधिकार देने की रूपरेखा बनाई जा रही है। इन मॉडलों में विधायिका की भूमिका मुख्य रूप से बजटीय और विधायी स्वीकृति तक सीमित रहती है, जबकि मुख्य रणनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक फैसले सीधे राष्ट्रपति कार्यालय से संचालित होते हैं।

28वां संविधान संशोधन और नए प्रांतों का गठन

इस नई व्यवस्था को कानूनी ढांचा प्रदान करने के लिए 28वें संविधान संशोधन का मसौदा तैयार करने की दिशा में काम चल रहा है। इस प्रस्तावित संशोधन में न केवल शासन प्रणाली बदलने का प्रावधान शामिल है, बल्कि देश के बड़े सूबों का प्रशासनिक पुनर्गठन भी शामिल है। पंजाब और सिंध जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से प्रभावकारी प्रांतों को विभाजित कर नए और छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनाने का विचार है। प्रांतीय शक्तियों को विभाजित करने का उद्देश्य केंद्रीय नियंत्रण को मजबूत करना और प्रांतीय सरकारों के वित्तीय अधिकारों को पुनर्परिभाषित करना है, जिससे राष्ट्रीय बजट का बड़ा हिस्सा रक्षा और केंद्रीय योजनाओं के लिए आवंटित किया जा सके।

एसआईएफसी और अर्थव्यवस्था पर बढ़ता फौजी प्रभाव

राजनैतिक बदलावों के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे पर भी दीर्घकालिक नियंत्रण की रणनीति बनाई गई है। 'स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल' (SIFC) के माध्यम से 10 साल का आर्थिक रोडमैप तैयार किया गया है। इस परिषद में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की प्रत्यक्ष भागीदारी रखी गई है। इसका मुख्य ध्यान विदेश प्रत्यक्ष निवेश (FDI), खनन, कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर है। इस संस्थागत व्यवस्था के जरिए आर्थिक फैसलों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने और बड़े निवेश प्रोजेक्ट्स को सीधे सैन्य निगरानी में संचालित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

इतिहास के तानाशाही दौर और वर्तमान चुनौतियां

पाकिस्तान का इतिहास पहले भी अयूब खान, याह्या खान, ज़िया-उल-हक़ और परवेज़ मुशर्रफ जैसे सैन्य जनरलों के शासनकाल का साक्षी रहा है। अतीत में प्रत्यक्ष सैन्य शासन या तख्तापलट के माध्यम से सत्ता संभाली जाती थी, जबकि वर्तमान 10 साल का मास्टर प्लान संवैधानिक संशोधनों और संस्थागत पुनर्गठन के जरिए इस भूमिका को स्थायी और कानूनी मान्यता देने का प्रयास करता है। बलूचिस्तान में स्वतंत्रता समर्थक आंदोलनों और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के लगातार बढ़ते हमलों के बीच इस नए प्रशासनिक खाके का क्रियान्वयन पाकिस्तान की भविष्य की राजनीतिक दिशा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अत्यंत निर्णायक माना जा रहा है।

सवाल-जवाब

पाकिस्तान के 10 साल के मास्टर प्लान का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस प्लान का मुख्य उद्देश्य मौजूदा संसदीय व्यवस्था को बदलकर राष्ट्रपति शासन लागू करना और 28वें संविधान संशोधन के जरिए प्रशासनिक शक्तियों को केंद्रित करना है।
प्रस्तावित 28वें संविधान संशोधन में क्या बदलाव शामिल हैं?
इसके तहत राष्ट्रपति पद को अधिक शक्तियां देने, पंजाब और सिंध जैसे बड़े प्रांतों को छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों में विभाजित करने और प्रांतीय बजटीय आवंटन पुनर्गठित करने के प्रावधान हैं।
पाकिस्तान में नए मॉडल के लिए किन देशों का उदाहरण दिया जा रहा है?
इस योजना के लिए तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन और मिस्र के राष्ट्रपति अल-सीसी के राष्ट्रपति शासन मॉडल से प्रेरणा ली जा रही है।
एसआईएफसी (SIFC) की क्या भूमिका है?
स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल के जरिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, खनन और प्राकृतिक संसाधनों पर 10 साल का आर्थिक रोडमैप तैयार कर सैन्य और केंद्रीय निगरानी में फैसलों को लागू करना है।
पाकिस्तान का इतिहास सैन्य शासन के मामले में कैसा रहा है?
पाकिस्तान में पूर्व में अयूब खान, याह्या खान, ज़िया-उल-हक़ और परवेज़ मुशर्रफ जैसे जनरलों का शासन रह चुका है, लेकिन नया प्लान इसे संवैधानिक रूप से लागू करने पर केंद्रित है।
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