पाकिस्तान में दशकों से पनप रहे धार्मिक कट्टरपंथ और उग्रवादी संगठनों पर वहां की सेना ने अप्रत्याशित रूप से कार्रवाई तेज कर दी है। सैन्य प्रतिष्ठान की लंबे समय से यह रणनीति रही थी कि वह अपने राजनीतिक और रणनीतिक हितों को साधने के लिए कट्टरपंथी गुटों को प्रश्रय देता था। हालांकि, बदलते वैश्विक हालात और देश की जर्जर आर्थिक स्थिति के बीच सैन्य प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने इन संगठनों के खिलाफ शून्य सहनशीलता की नीति लागू की है। इस रणनीतिक बदलाव का मुख्य उद्देश्य पश्चिमी शक्तियों के साथ रिश्ते सुधारना, अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित करना और देश की वैश्विक छवि को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित करना है।
कराची की घटना: तंग गली में बची ईसाई परिवार की जान
पाकिस्तान में सेना द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान का असर सड़कों पर साफ दिखाई देने लगा है। पिछले महीने देश के सबसे बड़े औद्योगिक शहर कराची की एक तंग गली में एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया। वहां एक ईसाई परिवार पर ईशनिंदा का आरोप लगा, जिसके बाद देखते ही देखते सैकड़ों लोगों की उग्र भीड़ इकट्ठा हो गई। भीड़ में शामिल लोग परिवार के सदस्यों की जान लेने की मांग कर रहे थे। उस समय घर के भीतर चार महिलाएं और एक बच्चा फंसे हुए थे, और वहां पहुंचे पुलिस अधिकारियों के पास उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कुछ ही मिनटों का समय बचा था।
साल 1990 के बाद से पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोपों में मॉब लिंचिंग के दौरान लगभग 90 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। ऐसे अधिकांश मामलों की शुरुआत इसी तरह की उग्र भीड़ एकत्र होने से होती रही है। हालांकि, कराची में जब पुलिस अधिकारी संघार अली मलिक अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि हालात पिछले सालों जैसे नहीं थे। भीड़ मौजूद तो थी, लेकिन इस तरह की हिंसा को भड़काने वाले प्रमुख धार्मिक और कट्टरपंथी संगठनों के उकसाने वाले चेहरे गायब थे।
पुलिस अधिकारी संघार अली मलिक ने संयम का परिचय देते हुए भीड़ से कहा कि कोई भी धर्म किसी व्यक्ति को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं देता है। इसके बाद उन्होंने पवित्र ग्रंथ कुरान की आयतें पढ़कर सुनाईं। मुख्य भड़काऊ नेताओं की गैरमौजूदगी और पुलिस द्वारा निष्पक्ष कानूनी जांच का आश्वासन मिलने पर भीड़ धीरे-धीरे शांत होकर तितर-बितर हो गई। इसके बाद पुलिस टीम उस ईसाई परिवार के सभी पांचों सदस्यों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने में सफल रही। प्रारंभिक जांच में परिवार पर लगाए गए आरोप निराधार पाए गए।
पश्चिमी देशों से रणनीतिक नजदीकी और कूटनीतिक मजबूरी
विश्लेषकों का मानना है कि उग्रवादी संगठनों के खिलाफ यह सख्ती अचानक शुरू नहीं हुई है, बल्कि इसके पीछे गहरा कूटनीतिक और आर्थिक गणित है। पाकिस्तान की ताकतवर सेना लंबे समय तक इन संगठनों का इस्तेमाल नागरिक सरकारों पर दबाव बनाए रखने और पड़ोसी देशों के साथ तनाव नियंत्रित करने के लिए करती रही थी। लेकिन अब चार अलग-अलग सुरक्षा और सरकारी स्रोतों के अनुसार, फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के सीधे निर्देशों पर इन समूहों को पूरी तरह पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया गया है।
सेना प्रमुख आसिम मुनीर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ व्यक्तिगत कूटनीतिक संबंधों को प्रगाढ़ करने में लगे हुए हैं। यह नया दृष्टिकोण ऐसे समय में सामने आया है जब इस्लामाबाद के संबंध अफगान तालिबान के साथ बेहद तनावपूर्ण हो चुके हैं। अफगान तालिबान, जो कभी पाकिस्तान के प्रमुख सहयोगी माने जाते थे, खुद ईशनिंदा जैसे मामलों में कठोरतम सजा लागू करते हैं। ऐसे में पाकिस्तान खुद को तालिबानी विचारधारा से अलग दिखाकर पश्चिमी देशों के समक्ष एक तरक्कीपसंद और आधुनिक राष्ट्र के रूप में पेश करना चाहता है।
सैन्य नेतृत्व के करीबी सूत्रों का कहना है कि मुनीर इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट हैं कि एक तरफ उग्रवादी धार्मिक संगठन और दूसरी तरफ एक प्रगतिशील पाकिस्तान, दोनों साथ नहीं चल सकते। परमाणु हथियार संपन्न देश की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छ रखना अब सैन्य कमान की सर्वोच्च प्राथमिकता बन चुका है।
आर्थिक चुनौतियां, विदेशी निवेश और आंतरिक विद्रोह
आसिम मुनीर खुद एक इमाम के बेटे हैं और निजी जीवन में बेहद रूढ़िवादी मुस्लिम माने जाते हैं। पाकिस्तान के शासनतंत्र में धर्म की भूमिका ऐतिहासिक रूप से काफी गहरी रही है। इसके बावजूद, देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए मुनीर अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने की कोशिशों में जुटे हैं। वह क्रिप्टो करेंसी सौदों, विदेशी वित्तीय सहायता, अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश, तथा सऊदी अरब के साथ रणनीतिक रक्षा समझौतों के जरिए वैश्विक वित्तीय तंत्र में पाकिस्तान की पैठ मजबूत करना चाहते हैं।
दूसरी ओर, देश के भीतर बढ़ते आंतरिक असंतोष और विद्रोहों ने भी सेना पर दबाव बढ़ा दिया है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के प्राकृतिक संसाधनों एवं खनिजों से समृद्ध इलाकों में सशस्त्र विद्रोह तेज हुआ है। पिछले साल मुनीर ने अमेरिकी सरकार और विदेशी कंपनियों के सामने इन खनिज समृद्ध क्षेत्रों में निवेश के बड़े प्रस्ताव रखे थे। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को सुरक्षा की गारंटी देने के लिए यह जरूरी हो गया था कि देश के भीतर सक्रिय कट्टरपंथी गुटों को मिलने वाला सरकारी और संस्थागत संरक्षण पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए।
कानूनी मामलों और हिंसक घटनाओं में आई भारी गिरावट
सैन्य अभियानों के इस कड़े रुख का असर आंकड़ों में भी स्पष्ट तौर पर दर्ज किया गया है। मानवाधिकार मामलों पर नजर रखने वाली स्वतंत्र संस्था 'ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान' के आंकड़ों के अनुसार, इस साल अब तक देश भर में ईशनिंदा के दर्ज मामलों की संख्या घटकर मात्र 13 रह गई है। यह आंकड़ा पिछले वर्षों के वार्षिक औसत की तुलना में लगभग दो-तिहाई कम है।
इसी तरह, हिंसक झड़पों और संघर्षों का अध्ययन करने वाली संस्था 'ACLED' के जारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2021 से 2024 के दौरान पाकिस्तान में हर साल ईशनिंदा से जुड़े औसतन सात से अधिक दंगे या उग्र हमले दर्ज किए जाते थे। इसके विपरीत, बीते 12 महीनों में पूरे देश के भीतर इस तरह की केवल एक हिंसक घटना सामने आई है। ये आंकड़े यह दर्शाते हैं कि सड़कों पर भीड़ को उकसाने वाले नेटवर्क पर सरकारी मशीनरी ने कड़ा पहरा लगा दिया है।
इस पूरे मामले पर देश के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी का कहना है कि राज्य ने अपने अतीत के कड़वे अनुभवों से महत्वपूर्ण सबक सीखे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान एक ही नीति पर काम कर रहे हैं। तलाल चौधरी ने कहा कि इसका मुख्य लक्ष्य किसी भी ऐसे चरमपंथी समूह को पूरी तरह से कुचलना है जो देश, सरकार या आम जनता को अपनी शर्तों पर बंधक बनाने का प्रयास करता है।



















