पाकिस्तान के कानून एवं न्याय मंत्री आजम नजीर तरार ने भारत के साथ लंबित तमाम द्विपक्षीय विवादों को सुलझाने के लिए संवाद और कूटनीतिक रास्तों को अपनाने की जोरदार वकालत की है। वाशिंगटन में आयोजित विश्व बैंक की एक बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे तरार ने स्पष्ट किया कि सैन्य बल का इस्तेमाल या युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। सिंधु जल संधि और आतंकवाद जैसे बेहद संवेदनशील और जटिल मुद्दों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों पड़ोसी देशों के पास बातचीत की मेज पर आने के अलावा कोई बेहतर विकल्प नहीं है। दुनिया भर में कई बड़े और ऐतिहासिक विवाद केवल आपसी बातचीत और समझौतों के जरिए हल किए गए हैं, इसलिए भारत और पाकिस्तान को भी अपने मतभेद दूर करने के लिए निरंतर संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए।
सिंधु जल संधि का इतिहास और जल अधिकारों की चुनौती
वर्ष 1960 में हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि का विशेष उल्लेख करते हुए आजम नजीर तरार ने इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की एक अभूतपूर्व मिसाल करार दिया। उन्होंने याद दिलाया कि 1965 और 1971 के पूर्ण युद्धों के साथ-साथ 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान भी यह जल समझौता प्रभावी बना रहा। इतने गंभीर सैन्य तनाव और राजनीतिक कटुता के बावजूद दोनों देशों के जल आयोग आपस में नदियों के पानी से जुड़े तकनीकी आंकड़ों का नियमित आदान-प्रदान करते रहे थे। हालांकि, उन्होंने इस बात पर गहरा अफसोस जताया कि हालिया दौर में इस ऐतिहासिक संधि को लेकर स्थितियां बदल गई हैं और दोनों पक्षों के बीच गतिरोध पैदा हुआ है।
पाकिस्तानी कानून मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि पाकिस्तान नदियों के जल बंटवारे पर लगातार बातचीत की मांग करता रहा है और इस मसले को आधिकारिक रूप से विश्व बैंक के समक्ष भी उठाया गया है। उन्होंने कहा कि पानी इंसानी जीवन का मूल आधार है और अंतरराष्ट्रीय जल कानूनों के तहत निचले तटवर्ती क्षेत्रों के अधिकारों का सम्मान किया जाना अनिवार्य है। जल संसाधनों जैसे संवेदनशील विषय को राजनीतिक टकराव का जरिया बनाने के बजाय दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व को साथ बैठकर एक स्थायी, पारदर्शी और न्यायसंगत समाधान की दिशा में काम करना चाहिए।
जनसांख्यिकीय दबाव, परमाणु क्षमता और साझा विरासत
उपमहाद्वीप में शांति की तात्कालिक आवश्यकता पर बल देते हुए तरार ने क्षेत्रीय जनसांख्यिकी और सामरिक वास्तविकताओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान की संयुक्त आबादी 170 करोड़ से अधिक है, और दोनों ही देश घोषित रूप से परमाणु हथियारों से संपन्न हैं। इतनी विशाल आबादी के जीवन और सुरक्षा को देखते हुए युद्ध की बात करना आत्मघाती है, इसलिए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व ही दोनों देशों के लिए एकमात्र व्यावहारिक और तार्किक मार्ग है।
द्विपक्षीय संबंधों के मानवीय और सांस्कृतिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के आम लोगों के बीच गहरे सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों और पाकिस्तान के लोगों के बीच खानपान, पहनावे, भाषा और सामाजिक रीति-रिवाजों में अद्भुत समानताएं पाई जाती हैं। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि कश्मीर जैसे अनसुलझे राजनीतिक मुद्दे और लंबे समय से चला आ रहा सीमा पार का तनाव इन जन-संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। यूरोपीय इतिहास का उदाहरण देते हुए तरार ने कहा कि सदियों तक खूनी संघर्ष और भयानक युद्ध झेलने वाले यूरोपीय देशों ने आखिरकार शांति और सहयोग की राह चुनी। भारत और पाकिस्तान को भी इस इतिहास से सबक लेते हुए अपनी आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित और समृद्ध भविष्य के लिए कठोर उग्रवादी रुख को छोड़ना होगा।
आतंकवाद से निपटने की रणनीति और क्षेत्रीय कूटनीति
सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर बोलते हुए तरार ने कहा कि पाकिस्तान स्वयं कई दशकों से आतंकवाद का संताप झेल रहा है। उनका मानना था कि एक-दूसरे पर केवल आरोप-प्रत्यारोप लगाने से किसी भी देश को सकारात्मक परिणाम नहीं मिल सकते। इसके बजाय, दोनों देशों के सुरक्षा अधिकारियों को एक साथ बैठकर आतंकी खतरों की सटीक पहचान करनी चाहिए और साझी रणनीति तैयार करनी चाहिए। उन्होंने बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे पाकिस्तानी प्रांतों में हाल के समय में बढ़ी हिंसा का जिक्र किया और कहा कि अत्यधिक कठोर रुख अपनाने से समस्याएं सुलझने के बजाय और जटिल हो जाती हैं।
पाकिस्तान की वैश्विक कूटनीतिक गतिविधियों का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि इस्लामाबाद ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी कूटनीतिक तनाव को कम करने में मध्यस्थता की कोशिशें की हैं। उन्होंने कहा कि उनका मुल्क केवल दक्षिण एशिया में ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भी शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनने की इच्छा रखता है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि दोनों देशों के आम नागरिकों को विकास, बेहतर जीवन स्तर और सुरक्षित माहौल का मौलिक अधिकार है, और सरकारों को संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर भावी पीढ़ियों के कल्याण के लिए साहसिक फैसले लेने चाहिए।



















